पुस्तक समीक्षा: जुवि शर्मा की 'अबोली की डायरी' गद्य में लिखी एक लंबी मगर सच्ची कविता की तरह है. एक ऐसी कविता जिसमें काव्य गुण तो हैं पर यह काव्य गुण कल्पना तथा संवेदनाओं से अधिक अनुभव और यथार्थ पर आरोपित कर दिए गए हैं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हमारा समय और उसमें सक्रिय आक्रामक शक्तियां संविधान और लोकतंत्र विरोधी होने के साथ-साथ सृजन और ज्ञान विरोधी भी हैं. समय आ गया है जब सारे भारत से लेखक और कलाकार, संगीतकार-रंगकर्मी-नृत्यकार, विद्वान और बुद्धिजीवी अपने को सशक्त और मुखर रूप से इन मुद्दों पर व्यक्त करें.
2011 के पूर्व पश्चिम बंगाल में विचारधारा की राजनीति प्रबल थी और वर्ग राजनीति, भूमि सुधार, मज़दूरों के मुद्दे ही चुनावी प्रचार विषय होते थे, मुद्दे अब भी हैं पर जिस तरह बंगाल में विचारधारा की राजनीति भावनात्मक और प्रतीकात्मक राजनीति में परिवर्तित हुई है, उसी तरह चुनावी संदेश और छवियां भी अब दिमाग और तर्कों से अधिक भावनाओं को अपील करते हैं. बंगनामा की चवालीसवीं क़िस्त.
एक चर्चा में भाग लेते हुए कवयित्री, लेखिका और एक्टिविस्ट अनिता भारती ने कहा कि हमारे समाज में प्रेम में को बदनाम करने के लिए कई सारी बातें कहीं जाती हैं. जात-कुजात संबंधी तर्क दिए जाते हैं. लेकिन प्रेम अपने आप में इनता क्रांतिकारी होता है कि वह कोई बंधन नहीं जानता. प्रेम में तमाम तरह के पूर्वाग्रह टूट जाते हैं. यह लोगों को तमाम कुरीतियों से मुक्त कर देता है.
पुस्तक समीक्षा: नमिता गोखले और मालाश्री लाल द्वारा संपादित 'वॉइसेस इन द विंड' वही करती है, जो पहाड़ करते हैं. वह स्थिर दिखती है लेकिन उसके भीतर निरंतर गति है. वह कई दिशाओं से आए स्वरों को अपने भीतर समेटती है और फिर उन्हें आगे बढ़ा देती है.
कभी-कभार अशोक वाजपेयी: साहित्य राजनीति की अवहेलना या उपेक्षा नहीं कर सकता. अंततः साहित्य नागरिक कर्म भी है और उसकी नागरिकता का यह नैतिक और सर्जनात्मक तकाज़ा है कि वह ऐसे समय में राजनीति के विरोध में खड़ा, मुखर और सक्रिय हो. सब तरह की राजनीति के नहीं, पर विभाजक आतंककारी राजनीति के विरुद्ध.
आंध्र प्रदेश की पुलिस ने उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण पर व्यंग्य करने के आरोप में एक स्टैंडअप कॉमेडियन अनुदीप कटिकला को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से हिरासत में लिया है. कॉमेडियन का एक वीडियो सामने आने के बाद जनसेना पार्टी के संयुक्त सचिव बाडे वेंकट कृष्णा ने काकीनाडा आईटाउन थाने में मामला दर्ज करवाया था.
स्मृति शेष: आशा भोसले एक ऐसे दौर की उपज रहीं, जहां शास्त्रीयता के लिए आवाजाही थी, प्रयोगों के लिए खुला आसमान था, मैलोडी युक्त प्रणय गीतों के लिए उतनी ही सुंदर और शोख़ फिल्में बनाई जा रही थीं. उनके जाने से एक बड़ी रिक्तता तो आई है, मगर उनकी आवाज़ का वज़न हमेशा मौजूद रहेगा.
भारतीय संगीत जगत की लीजेंड आशा भोसले का रविवार को मुंबई के एक अस्पताल में निधन हो गया. वे 92 वर्ष की थीं. कच्ची उम्र में गायन की शुरुआत करने वाली आशा जी अपनी प्रयोगधर्मी प्रतिभा और शोख़ आवाज़ से कई दशकों तक सुनने वालों की प्रिय बनी रहीं. वो भले देह से दुनिया में न रही हों, पर उनके गीत अमर रहेंगे.
पुस्तक समीक्षा: पत्रकार नेहा दीक्षित की 'द मैनी लाइव्स ऑफ सईदा एक्स' का हिंदी अनुवाद असल में सईदा के क़रीब की भाषा में किताब का फिर से लौटना है. दीक्षित सईदा के जीवन के ज़रिये मेहनत की लूट से चल रहे वैश्विक बाज़ार के दूसरे ध्रुव की कहानी कहती हैं. तमाम दुखों के बाद भी लोग कैसे ख़ुद को जीवित रखते हैं, सब खो देने के बाद कैसे जीवन शुरू करते हैं, और कई बार व्यवस्था के ख़िलाफ़ साझा संघर्ष
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आम तौर पर किसी थाने के दारोगा के साहित्यप्रेमी होने की न तो अपेक्षा होती है, न ही संदेह. अगर शिकायत करने वाला अपनी जाति/उपजाति का हो या फिर शिकायत मुस्लिम के विरुद्ध हो तो फ़ौरन दर्ज कर ली जाती है. इस नए मामले का एक दुष्परिणाम तो यह होने जा रहा है कि अब कई कवि अपनी कोई तीख़े प्रश्न पूछने वाली कविता सोशल मीडिया पर डालने से संकोच करेंगे कि कहीं थाने तलब न कर
पुस्तक समीक्षा: बुकर पुरस्कार से सम्मानित डेविड सॉल्लॉय का 'फ्लेश' पुरुष मन के भीतर पैठकर पुरुष के निर्णयों और उसके विचारों का एक अनोखा विश्लेषण है, जो साधारण-सी कथा के बावजूद कुछ अधिक सार्थक बिंदुओं पर विचार करने के लिए छोड़ देता है.
चुनाव की ऋतु में दीवार लेखन जनता को पार्टियों का संवाद है, उस क्षेत्र में उनके उम्मीदवारों का परिचय है. पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रचार से जुड़ा यह लेख करीब साढ़े तीन दशक पहले वहां राजनीतिक दलों द्वारा जनता तक पहुंच के तरीके से लेकर आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया और स्मार्टफोन तक उनके बदलते स्वरूप का वर्णन करता है.
इज़रायली और भारतीय, फिल्मकार, पत्रकार, अकादमिक और कार्यकर्ताओं ने एक पत्र में भारत के केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड द्वारा फिल्म 'द वॉयस ऑफ हिंद रजब' पर प्रतिबंध को उचित ठहराने के लिए भारत-इज़रायल संबंधों का हवाला दिए जाने की कड़ी निंदा की है. पत्र में भारत और इज़रायल में बहुलवाद, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाए रखने की अपील भी की गई है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आज के समय में सत्तारूढ़ राजनीतिक शक्तियां मूल्यभाषा का दम तो भरती हैं और उनके प्रति अपनी प्रतिबद्धता का सार्वजनिक उद्घोष तो करती हैं पर आचरण उससे बिल्कुल उलट करती हैं. कथनी-करनी में यह फांक, यह पाखंड हमारे लोकतंत्र के इतिहास में इससे पहले इतने व्यापक कभी नहीं हुए.