नैनन में आन-बान: हिंदुस्तानी संगीत की सांस्कृतिक निधि

पुस्तक समीक्षा: यतीन्द्र मिश्र की 'नैनन में आन-बान' को जो बात रोचक और पठनीय बनाती है वह है, विषयवस्तु की कसावट; हर कलावंत पर नपी-तुली और विस्तार से ज़्यादा गहराई. वैसे तो शास्त्रीय संगीत ही पुस्तक का केंद्रीय विषय है पर कुछ बातें ऐसी भी हैं जो कला-साहित्य जगत से जुड़े हर व्यक्ति को समझनी चाहिए जैसे- नवाचार के लिए परंपरा की ओर देखना ही पड़ता है या कलात्मक ऊंचाई विचार और विवेक के बिना संभव नहीं.

औरत का घर: आदिवासी स्त्रियों के संघर्ष और पहचान का सशक्त दस्तावेज़

पुस्तक समीक्षा: आदिवासी स्त्रियों के जीवन को केंद्र में रखते हुए उनके संघर्ष को सामने रखती जसिंता केरकेट्टा की किताब ‘औरत का घर’ नारीवादी दृष्टि से लिखित एक महत्वपूर्ण कहानी संग्रह है. उनकी कहानियां केवल व्यक्तिगत पीड़ा का बयान नहीं हैं, बल्कि वे आदिवासी समुदाय के व्यापक सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ, हाशियाकरण, विस्थापन और संरचनात्मक हिंसा को भी उजागर करती हैं.

क्षत-विक्षत लोकतंत्र में बुद्धिजीवियों की अप्रासंगिकता

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आज के दुर्व्‍याख्या और विस्मृति के दौर में भी कुछ बुद्धिजीवी ऐसे हैं जो प्रमाणित तथ्यों और संदर्भों के साथ दुर्व्‍याख्या को प्रश्नांकित कर रहे हैं. वे स्मृति का आग्रह कर रहे हैं. इसमें जोखिम है, देर-सबेर हो सकता है कि उन पर हमले हो जाएं. पर ये बुद्धिजीवी रक्तबीज हैं: उन्हें हटा या नष्ट या हाशिये पर भी डाल दिया जाए तो नए युवा बुद्धिजीवी पैदा होंगे जो उनके बौद्धिक सत्याग्रह को आगे ले जाएंगे.

बंगनामा: क्या शपथ ग्रहण समारोह संवैधानिक कार्य न रहकर सार्वजनिक राजनीतिक रंगमंच बन चला है?

ब्रिगेड परेड मैदान में पश्चिम बंगाल के नए सीएम का शपथ ग्रहण समारोह कर भाजपा कुछ संकेत दे रही है. प्रथम, कि वो जनता को पार्टी की विपुल सफलता के विशाल जन उत्सव में हिस्सा लेने का अवसर दे रही है. दूसरा, रवीन्द्र जयंती के अवसर पर इस आयोजन से वह सिद्ध करना चाहती है कि वह पश्चिम बंगाल की संस्कृति में ढली हुई बंगाल की ही पार्टी है, बाहर की नहीं. बंगनामा की पैंतालीसवीं क़िस्त.

अक्ष पर नचैत: संस्मरण की पीठिका पर मैथिली की विरासत

पुस्तक परिचय: केदार कानन की. 'अक्ष पर नचैत' मैथिली साहित्य के एक पूरे युग का वह 'अक्ष' है, जिस पर तत्कालीन संवेदनाएं और वैचारिक संघर्ष आज भी स्पंदित हो रहे हैं. यह कृति सिखाती है कि संवाद की लुप्त होती वर्तमान संस्कृति के बीच, पत्रों की स्याही आज भी कितनी मानवीय ऊष्मा और वैचारिक रोशनी दे सकती है.

डेविड एटनबरो: पृथ्वी के कथाकार की एक सदी की विरासत

सर डेविड एटनबरो आज अपने जीवन के सौ वर्ष पूरे कर रहे हैं. यह महज़ किसी प्रसिद्ध वृत्तचित्र निर्माता या प्रस्तोता का जन्मदिन नहीं है; यह उस व्यक्ति का शताब्दी वर्ष है जिसने करोड़ों लोगों को पहली बार यह एहसास कराया कि पृथ्वी केवल मनुष्यों की संपत्ति नहीं, बल्कि साझा विरासत है.

रघु राय ने वो हिंदुस्तान दिखाया, जो कई बार हम देख नहीं पाते

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: रघु राय ने शुरुआत तो फोटो-पत्रकार के रूप में की थी पर वे जल्दी ही फोटो-कलाकार हो गए. एक स्तर पर उन्होंने अपनी कला से भारतीय जीवन का गुणगान ही किया- उसका उत्सव मनाया, एक तरह की भारत-लीला रची. ऐसी लीला, जिसमें कोई नायक नहीं है- जीवन ही नायक है.

अबोली की डायरी: अस्तित्व के गहरे अंधेरों की एक यात्रा

पुस्तक समीक्षा: जुवि शर्मा की 'अबोली की डायरी' गद्य में लिखी एक लंबी मगर सच्ची कविता की तरह है. एक ऐसी कविता जिसमें काव्य गुण तो हैं पर यह काव्य गुण कल्पना तथा संवेदनाओं से अधिक अनुभव और यथार्थ पर आरोपित कर दिए गए हैं.

संविधान और उसके आधार-मूल्य संकट में हैं

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हमारा समय और उसमें सक्रिय आक्रामक शक्तियां संविधान और लोकतंत्र विरोधी होने के साथ-साथ सृजन और ज्ञान विरोधी भी हैं. समय आ गया है जब सारे भारत से लेखक और कलाकार, संगीतकार-रंगकर्मी-नृत्यकार, विद्वान और बुद्धिजीवी अपने को सशक्त और मुखर रूप से इन मुद्दों पर व्यक्त करें.

बंगनामा: रण हुंकार में बदलता चुनावी प्रचार

2011 के पूर्व पश्चिम बंगाल में विचारधारा की राजनीति प्रबल थी और वर्ग राजनीति, भूमि सुधार, मज़दूरों के मुद्दे ही चुनावी प्रचार विषय होते थे, मुद्दे अब भी हैं पर जिस तरह बंगाल में विचारधारा की राजनीति भावनात्मक और प्रतीकात्मक राजनीति में परिवर्तित हुई है, उसी तरह चुनावी संदेश और छवियां भी अब दिमाग और तर्कों से अधिक भावनाओं को अपील करते हैं. बंगनामा की चवालीसवीं क़िस्त.

प्रेम ही वह इकलौता माध्यम है, जिससे सामाजिक बुराइयों की दीवारें टूट सकती हैं: अनिता भारती

एक चर्चा में भाग लेते हुए कवयित्री, लेखिका और एक्टिविस्ट अनिता भारती ने कहा कि हमारे समाज में प्रेम में को बदनाम करने के लिए कई सारी बातें कहीं जाती हैं. जात-कुजात संबंधी तर्क दिए जाते हैं. लेकिन प्रेम अपने आप में इनता क्रांतिकारी होता है कि वह कोई बंधन नहीं जानता. प्रेम में तमाम तरह के पूर्वाग्रह टूट जाते हैं. यह लोगों को तमाम कुरीतियों से मुक्त कर देता है.

वॉइसेस इन द विंड: जहां भारत अनेक स्वरों में सांस लेता है

पुस्तक समीक्षा: नमिता गोखले और मालाश्री लाल द्वारा संपादित 'वॉइसेस इन द विंड' वही करती है, जो पहाड़ करते हैं. वह स्थिर दिखती है लेकिन उसके भीतर निरंतर गति है. वह कई दिशाओं से आए स्वरों को अपने भीतर समेटती है और फिर उन्हें आगे बढ़ा देती है.

साहित्य की स्वायत्तता तभी सुरक्षित रह सकती है जब वह प्रतिरोध कर सके

कभी-कभार अशोक वाजपेयी: साहित्य राजनीति की अवहेलना या उपेक्षा नहीं कर सकता. अंततः साहित्य नागरिक कर्म भी है और उसकी नागरिकता का यह नैतिक और सर्जनात्मक तकाज़ा है कि वह ऐसे समय में राजनीति के विरोध में खड़ा, मुखर और सक्रिय हो. सब तरह की राजनीति के नहीं, पर विभाजक आतंककारी राजनीति के विरुद्ध.

आंध्र प्रदेश के उपमुख्यमंत्री पर व्यंग्य के आरोप में हैदराबाद के कॉमेडियन को यूपी से हिरासत में लिया गया

आंध्र प्रदेश की पुलिस ने उपमुख्यमंत्री पवन कल्याण पर व्यंग्य करने के आरोप में एक स्टैंडअप कॉमेडियन अनुदीप कटिकला को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से हिरासत में लिया है. कॉमेडियन का एक वीडियो सामने आने के बाद जनसेना पार्टी के संयुक्त सचिव बाडे वेंकट कृष्णा ने काकीनाडा आईटाउन थाने में मामला दर्ज करवाया था.

आशा भोसले: इस पल के आगे की हर शय फ़साना है…

स्मृति शेष: आशा भोसले एक ऐसे दौर की उपज रहीं, जहां शास्त्रीयता के लिए आवाजाही थी, प्रयोगों के लिए खुला आसमान था, मैलोडी युक्त प्रणय गीतों के लिए उतनी ही सुंदर और शोख़ फिल्में बनाई जा रही थीं. उनके जाने से एक बड़ी रिक्तता तो आई है, मगर उनकी आवाज़ का वज़न हमेशा मौजूद रहेगा.

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