पुस्तक समीक्षा: महमूद फ़ारूक़ी की ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ में गुरुदत्त के द्वंद्व को समझने की कोशिश है. दास्तानगो मानो अपने रोल मॉडल के जीवन के कतरनें बटोरकर उससे बनी एक तस्वीर लोगों के सामने पेश करने की कवायद कर रहा है. और इसलिए अगर इस तस्वीर में उज्ज्वल पक्ष निखरकर सामने आया है तो कुछ स्याह पहलू भी. मगर आख़िर में गुरुदत्त को फ़क़ीर के आसन पर बिठा ही दिया गया है.
कभी कभार | अशोक वाजपेयी: हमारे यहां हुए विउपनिवेशीकरण के अध्ययन में उपनिवेशवाद के भाषाई साम्राज्य का विश्लेषण बहुत कम है. सारी उत्तर-आधुनिकता के बावजूद पश्चिम अपने विचारों को सारे संसार में मनवाने में सफल हुआ है. विडंबना यह है कि हिंदुत्व के नाम पर जो राजनीतिक विचारधारा आज परंपरा के पुनर्वास और भारतीय आत्मबोध के नवजागरण का दावा कर रही है वह अपनी समझ में पूरी तरह औपनिवेशिक है.
'तमलुक आने के कुछ दिनों बाद मैंने पाया कि मेरा हर सोमवार और शुक्रवार कलकत्ता उच्च न्यायालय में बीत रहा है. ऐसा लगने लगा था कि हरेक मामले में ही ज़िला भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी, तमलुक ने न्यायालय की अवमानना की है.' बंगनामा की इस क़िस्त में एक पुराना विभागीय क़िस्सा.
स्मृति शेष: बशीर साहब मानते थे कि कविता का जीवन उसके लिखे जाने के साथ समाप्त नहीं हो जाता, बल्कि वह तो शुरू ही तब होता है जब वह पाठकों तक पहुंचती है. एक बार रचना, अस्तित्व में आ जाए तो उसके अर्थ, उसकी ग्राह्यता केवल लेखक के अधिकार में नहीं रहते. हर पाठक उसे अपने अनुभवों, स्मृतियों, संवेदनाओं और जीवन-दृष्टि के आलोक में पढ़ता है.
पुस्तक समीक्षा: मैथिली के वरिष्ठ कवि एवं सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक उदय नारायण सिंह नचिकेता के काव्य संग्रह 'छाया' में कविताओं की कई परतें हैं. इनमें पौराणिक आख्यानों, लोकसंस्कृति की लय, समकालीन जीवन की धड़कन और वैश्विक परिघटनाओं की अनुगूंज समाहित है, जो इस कविता संग्रह को भारतीय काव्य-साहित्य की परंपरा में एक अनुपम कृति का दर्जा दिलाती है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आज की भारतीय सत्ता को कविता की कोई ख़बर ही नहीं है. शायद उसे पता है कि आज की अधिकांश कविता इस सत्ता द्वारा फैलाए जा रहे झूठों-घृणा-हिंसा आदि से सहमत नहीं और ज़्यादातर उसके विरोध में है. कवि अल्पसंख्यक भी हैं. इसलिए उनकी उपेक्षा इस सत्ता के अल्पसंख्यक विरोधी रुख़ का भी नतीजा है.
बशीर बद्र के गुज़रने के बाद उनके जन्मस्थान के तौर पर कहीं अयोध्या तो कहीं कानपुर का नाम दर्ज हो रहा है, मगर उनके पैतृक गांव बुकिया (ज़िला अंबेडकर नगर) से दुनिया अनजान ही है. बात यह भी है कि देश-दुनिया में बशीर बद्र और उनकी शायरी को कितनी भी शोहरत हासिल क्यों न हुई हो, अपने गांव के लिए वे कई मायनों में जीवन भर अजनबी से ही बने रहे.
मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र का गुरुवार (28 मई) दोपहर करीब साढ़े बारह बजे भोपाल में निधन हो गया. प्रेम, विस्थापन और इंसानी रिश्तों को सरल लेकिन असरदार भाषा में कहने वाले बद्र के शेर संसद से लेकर आंदोलनों तक गूंजते रहे.
पुस्तक अंश: 'दुनिया में जितना अनाज सड़ता है या जितना भोजन रोज़ फेंक दिया जाता है, उसको सही से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो समस्या काफ़ी हद तक हल हो जाएगी, मगर ऐसा होता नहीं है. सत्ता ख़ुद को पक्ष विपक्ष में बांट लेती है और सत्ता की भूख पेट भरने से नहीं सामने वाले पक्ष को भूखा रखने से मिटती है.' पढ़िए अनिमेष मुखर्जी की 'इतिहास की थाली' का यह हिस्सा.
पुस्तक समीक्षा: अशोक पांडे द्वारा अनूदित इरविंग स्टोन की ‘लस्ट फॉर लाइफ’ महज विन्सेंट वॉन गॉग की जीवनी नहीं, बल्कि एक कलाकार के भीतर टूटते, जलते और सृजन में ख़ुद को खपा देने वाले मनुष्य की कथा है. यह किताब बताती है कि महान कला के पीछे कई बार गहरा अकेलापन, अस्वीकार का दर्द और आत्मक्षय की लंबी यातना छिपी होती है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: विचारधारा से प्रेरित आलोचक अक्सर कृति या लेखक पर धारा का ऐसा आच्छादन तान देते हैं कि हमें धारा का पता तो चलता है, कृति या लेखक की विशिष्टता या अद्वितीयता का बहुत कम. नंदकिशोर नवल इसका अपवाद हैं. हमारा समय धर्माक्रांत समय हो गया है. उसमें मुक्तिबोध की नवल-व्याख्या में यह जानना-समझना सम्यकता की ओर बढ़ने जैसा है.
1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद राइटर्स बिल्डिंग पश्चिम बंगाल सरकार का सचिवालय बन गया. यह परिवर्तन उल्लेखनीय था क्योंकि वही भवन, जो कभी अंग्रेज़ अधिकारियों का मुख्यालय था, अब पश्चिम बंगाल के मंत्रियों और ‘नौकरशाहों’ का कार्यालय बन गया. इन दिनों राइटर्स फिर चर्चा में है क्योंकि पश्चिम बंगाल में बनी भाजपा की नई सरकार ने एक बार फिर इसी भवन को अपना महाकरण (मुख्य सचिवालय) बनाने का निर्णय लिया है.
पुस्तक समीक्षा: दामिनी यादव के कविता संग्रह 'रफ़ कॉपी' में क्रोध जगह-जगह बिखरा है. क्रोध के कई रूप हैं; कई बार वह करुणा में ढलता है. कई बार व्यंग्य की भाषा ग्रहण करता है. तो कई बार आत्मनिरीक्षण तक जाता है. पर इस क्रोध के केंद्र में क्या है? संग्रह की ज़्यादातर कविताएं इस एहसास की अभिव्यक्ति हैं कि इस दुनिया में- और हमारे समाज में- स्त्रियां लगातार दमन और उत्पीड़न की शिकार हैं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: भारत में सार्वजनिक बुद्धिजीवी बहुत कम हैं. जो हैं उन्हें भी अक्सर दूसरे बद्धिजीवियों का समर्थन कम ही मिलता है. इस बीच शिक्षा-व्यवस्था में मुक्त विचार-विनिमय, असहमति, संवाद को बाधित किया जा रहा है. स्वयं शिक्षक-समुदाय में हिंदुत्ववादियों की इतनी विस्तृत और भयावह घुसपैठ हो चुकी है कि आगे जाकर ये आज्ञापलक शिक्षक और आज्ञापालक समाज बनाने में जी-जान और अपार उत्साह से लग जाएंगे.
पुस्तक समीक्षा: यतीन्द्र मिश्र की 'नैनन में आन-बान' को जो बात रोचक और पठनीय बनाती है वह है, विषयवस्तु की कसावट; हर कलावंत पर नपी-तुली और विस्तार से ज़्यादा गहराई. वैसे तो शास्त्रीय संगीत ही पुस्तक का केंद्रीय विषय है पर कुछ बातें ऐसी भी हैं जो कला-साहित्य जगत से जुड़े हर व्यक्ति को समझनी चाहिए जैसे- नवाचार के लिए परंपरा की ओर देखना ही पड़ता है या कलात्मक ऊंचाई विचार और विवेक के बिना संभव नहीं.