साक्षात्कार: 'सतलुज' फिल्म को ओटीटी से हटाए जाने के बाद पहली बार बात करते हुए फिल्मकार हनी त्रेहन ने कहा कि 'सतलुज' पर रोक लग सकती है पर जसवंत सिंह खालरा को ख़त्म नहीं किया जा सकता. त्रेहन जोड़ते हैं कि 'सतलुज' पंजाब के ज़ख्मों पर मलहम की तरह है, लेकिन इसे बैन किया गया क्योंकि यह फूट डालो और राज करो की राजनीति को बढ़ावा नहीं देती.
साक्षात्कार: फिल्मकार-लेखक और पॉडकास्टर की पहचान रखने वाले आशीष साहनी मशहूर कहानीकार इस्मत चुगताई के नाती हैं. कुछ बरस पहले आशीष ने ट्रांसजेंडर और सिस जेंडर महिला फिल्मकारों को प्रोत्साहन तथा समर्थन देने के लिए इस्मत चुगताई पुरस्कार की स्थापना की थी. उनकी नई फिल्म, इस्मत आपा पर उनकी नई किताब और भारत की समकालीन क्वीर राजनीति जैसे विषयों पर उनसे बातचीत.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: तीजन बाई की कला उस सर्जनात्मकता का साक्ष्य थी कि एक सजग स्त्री महाकाव्य के परिसर में और लोकव्यवहार के आयाम में कितना कुछ अप्रत्याशित तात्कालिकता और सुघर संयम से कर सकती थी. वे शास्त्र और लोक की लगभग रूढ़ हो गई दूरी और द्वैत को रौंद देती थीं.
मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्मकार हनी त्रेहन की फिल्म 'सतलुज' को ओटीटी पर रिलीज़ किए जाने के दो दिन के भीतर ही हटा दिया गया था. एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अब केंद्र सरकार आईटी एक्ट में संशोधन पर विचार कर रही है, जिसके तहत सीधे ओटीटी पर रिलीज़ होने वाली फिल्मों के लिए भी प्रमाणन अनिवार्य बनाया जा सकता है.
पश्चिम बंगाल में पान चबाना आम, स्वीकृत शग़ल है. पूर्व मेदिनीपुर ज़िला पश्चिम बंगाल में पान उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र है. यहां बांग्ला, मीठा, सांची, काली बांग्ला तथा सिमुराली बांग्ला जैसी अनेक लोकप्रिय किस्मों की खेती की जाती है. चार दशकों में पान की खेती में व्यापक परिवर्तन हुआ है मगर तामलुक के किसानों ने पान के बरज की मूल संरचना को नहीं त्यागा है.
पुस्तक समीक्षा: मैथिली में भले ही कम फिल्में बनी हों, गुणवत्ता के लिहाज़ से उनमें उत्तरोत्तर सुधार हो रहा है और कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में मैथिली फिल्मों को सराहना और पुरस्कार भी मिले हैं. हालांकि, किसी भी तरह के दस्तावेज़ीकरण के अभाव में इन फिल्मों से संबंधित जानकारी करना मुश्किल था. किसलय कृष्ण की पुस्तक 'मैथिली सिनेमाक इतिहास' इस रिक्तता को भरती है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: मोहन भागवत ने राम मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा वाले दिन को भारत का असली स्वतंत्रता दिवस बताया था. तब समझ में नहीं आया, पर अब आ रहा है कि उनका आशय प्रबंधक-चौकीदार रामभक्तों को चोरी आदि करने की स्वतंत्रता से था. ज़ाहिर है यह स्वतंत्रता की अधिक समावेशी अवधारणा है: जिस स्वतंत्रता में चोरी करने की स्वतंत्रता शामिल न हो वह अधूरी स्वतंत्रता ही मानी जाएगी!
अभिनेता अजय देवगन की नई फिल्म 'चौहान' के ट्रेलर में पैलेट गन को सीमित नुकसान वाला बताया गया है, जिसे लेकर इसकी आलोचना हो रही है. कश्मीर में पैलेट गन पीड़ितों का कहना है कि उन्होंने राज्य की हिंसा झेली है और अब बॉलीवुड उनके दर्द का मज़ाक उड़ा रहा है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2010-16 के बीच जम्मू-कश्मीर में लगभग 10,000 लोग पैलेट गन से घायल हुए, कई अपाहिज और कई ने आंखों की रोशनी गंवा दी.
पुस्तक समीक्षा: पुरुषोत्तम अग्रवाल की 'मजबूती का नाम महात्मा गांधी' गांधी को देवता नहीं बनाती, न ही उन्हें गिराकर खड़ा होना चाहती है. वह पाठक को एक मुश्किल जगह पर छोड़ देती है, जहां गांधी पूरी तरह सही भी नहीं हैं, पूरी तरह ग़लत भी नहीं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अगर आप संविधान सभा की याद करें, तो स्पष्ट है कि उसमें सबसे अधिक सदस्य हिंदू थे. हिंदू समाज ने ही मुख्यतः लोकतंत्र को स्वीकार और भारत की धार्मिक-सांस्कृतिक-भाषायी बहुलता का एहतराम किया था. क्या अब उसका हिंदुत्व से प्रेरित-प्रभावित बड़ा हिस्सा लोकतंत्र को तजकर भारतीय राष्ट्र को हिंदू राष्ट्र में बदलना चाह रहा है?
मिदनापुर ज़िले का तामलुक पहली नज़र में बंगाल के किसी भी अन्य आम शहर जैसा लगता है, मगर इतिहास बताता है कि लगभग 2500 वर्ष पूर्व तामलुक की जगह पर बंगाल की खाड़ी पर स्थित था ताम्रलिप्त नामक पोत-नगर, जिसने उस युग में उत्तर तथा पूर्वी भारत के वाणिज्यिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जीवन में अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. बंगनामा की अड़तालीसवीं क़िस्त.
पुस्तक समीक्षा: 'मैं बरबाद होना चाहती हूं' मलिका अमर शेख की आत्मकथा है, जो अप्रत्यक्ष रूप से यह संदेश ज़रूर देती दिखती है कि भारतीय समाज में बेटियों को इस लायक ज़रूर बनाया जाए कि वह अपने सिर पर बनी रहने वाली छत ज़रूर खरीद सकें, ताकि उन्हें खदेड़े जाने पर उलटकर पति के ही यहां अथवा अन्य किसी के यहां शरण न लेनी पड़े.
कभी-कभार में इस सप्ताह वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी अपने 'उत्तरकाल' की व्याख्या करते हुए लिखते हैं, 'मुझे किसी तरह की मुक्ति की तलाश नहीं है, न भवचक्र से, न जन्मचक्र से. संसार बहुत तेज़ी से बदल गया और रहा है- वह निरंतर क्रूर-निष्करुण-असह्य होता जाता है पर उसमें, फिर भी, सचाई और विवेक, ईमानदारी और सुंदरता, अर्थ और संभावनाएं बची हुई हैं. मैं इस बचे हुए को अलक्ष्य नहीं करना चाहता.'
पुस्तक अंश: देखा जाए तो हर तरह का ज्ञान आखिरकार वैज्ञानिक ज्ञान रह जाता है. फलसफे की ज़रूरत महज़ विज्ञान की समझ बढ़ाने की रह जाती है. कई दार्शनिक इस सरलीकरण को खारिज करते हैं. उनका मानना है कि हर दार्शनिक सवाल को वैज्ञानिक तरीकों से देखा या समझा नहीं जा सकता है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कॉकरोच जनता पार्टी को तरह-तरह से व्याख्यायित, संदेहास्पद बताने की कोशिशें हो रही हैं. यह होना ऐसे पिछले आंदोलन आदि के हश्र के अनुभव की रोशनी में, अस्वाभाविक और अतर्किक नहीं है. लेकिन भारत के युवाओं की निष्क्रियता और राजनीतिक दृष्टि के अभाव से क्षुब्ध-असंतुष्ट हम जैसे कुछ बूढ़ों को इस पहल से कुछ उम्मीद बंध रही है.