पुस्तक समीक्षा: माधव हाड़ा द्वारा संपादित ‘भक्ति अगाध अनंत’ ऐसा संचयन है, जिसकी आवश्यकता लंबे समय से केवल अकादमिक संस्थानों या सुधि साहित्यिकों को नहीं थी वरन् जिसकी सर्वाधिक ज़रूरत रसहीन होते जा रहे सहृदय समाज को थी. यह संचयन देशज भक्ति परंपरा का अनुभव द्वार है, जिसमें बहुत ही स्पष्ट ढंग से भारतीय एवं पश्चिमी भक्ति अवधारणा और उससे संबंधित संशयों के निराकरण का उचित प्रयास है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इतिहास ज़्यादातर बहिर्मुख होता है, साहित्य अंतर्मुख भी. सचाई पर दोनों में से किसी का एकाधिकार नहीं होता, न हो पाता है. इतिहास और साहित्य दोनों की सचाई के गल्प रचते हैं. साहित्य अपनी गल्पता खुले ढंग से स्वीकार करता है पर इतिहास को अपनी गल्पता स्वीकार करने में हिचक है, होती है.
छत्तीसगढ़ पहुंचने वाले शुरुआती दाऊदी बोहराओं में से एक मुल्ला इब्राहिम अली अपने परिवार के साथ सारंगढ़ पहुंच कर यहीं रच बस गए. इनका यहां आना तब हुआ जब सारंगढ़ के साथ-साथ देश के सामाजिक और व्यापारिक इतिहास में मील के नए पत्थर गड़ रहे थे. फिर एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में इब्राहिम अली की कहानी भी इस इतिहास के साथ पानी में शक्कर की तरह घुल गई.
पुण्यतिथि विशेष: 2002 में 27 नवंबर के दिन सुमन का निधन हुआ तो अटल प्रधानमंत्री थे और उन्होंने उनको श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा था कि 'सुमन' हिंदी कविता के सशक्त हस्ताक्षर भर नहीं, अपने समय की सामूहिक चेतना के संरक्षक भी थे. क्योंकि उन्होंने अपनी रचनाओं में न केवल अपनी भावनाओं का दर्द व्यक्त किया, बल्कि अपने युग के मुद्दों पर निर्विवाद रचनात्मक टिप्पणियां भी कीं.
रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि स्वामीनाथन को वेरियर एल्विन की पुस्तक ‘द ट्राइबल आर्ट ऑफ मिडल इण्डिया’ ने प्रेरित किया था. दरअसल, एल्विन को पढ़ने से बहुत पहले स्वामी आदिवासी जीवन को समझ चुके थे.
रीति साहित्य के साथ न्याय नहीं हुआ. बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रजभाषा के बजाय नई संस्कृतनिष्ठ हिंदी को राष्ट्र-निर्माण की कार्रवाई के तौर पर देखा गया. ब्रज के ग्रंथ संदिग्ध बन गए. ब्रजभाषा को कठघरे में खड़ाकर इस हिंदी ने अपनी जगह बना ली.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: सत्ता पहले असहिष्णुता को बढ़ावा देती है, फिर हिंसा की अनदेखी करती है और फिर अपराधियों को बगैर दंड दिए छोड़ देती है. क्या यह संविधान से जानबूझकर किया जा रहा अपसरण नहीं है?
सुधा भारद्वाज अपनी जेल डायरी, ‘फाँसी यार्ड से’, में बतलाती हैं कि उस चारदीवारी के पीछे किस तरह का सामाजिक भेदभाव होता है, यंत्रणा की कितनी परतें मौजूद हैं, कैसे एक यंत्रणा दूसरी को गाढ़ा कर देती है. किताब का चयनित अंश.
अवध के नवाबों की विलासिता के सच्चे-झूठे इतने किस्से न सिर्फ अवध बल्कि उसके बाहर भी प्रचलित हैं कि कोई उन्हें गिनने बैठे तो गिनता ही रह जाए. इस बाबत कोई क़िस्सा बहुत मुश्किल से मिलता है कि इन नवाबों के बुरे दिन आए और उन दिनों को उन्होंने किस तरह सहा. लेकिन ऐसे क़िस्से भी कम नहीं हैं.
पुस्तक समीक्षा: कमलानंद झा की किताब ‘विद्यापति: राजकाज और समाज’ मिथिला के उस सांस्कृतिक भूगोल में लौटने का आमंत्रण है जहां भाषा, सत्ता और कविता एक दूसरे से बात करती थीं. यह किताब उस कवि का पुनर्पाठ है जिसने राज्य को धर्म से नहीं, बल्कि लोक से जोड़ा.
छत्तीसगढ़ के सरगुजा में कोयला खनन के विस्तार से रामगढ़ पहाड़ी की चट्टानों में दरारें आ रही हैं, जिससे सीताबेंगा और जोगीमारा जैसी ऐतिहासिक गुफाओं के क्षरण का ख़तरा बढ़ गया है. सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि नए कोयला खदान की अनुमति देते समय यह तथ्य छुपाया गया कि 10 किलोमीटर के दायरे में राष्ट्रीय महत्व का पुरातात्विक स्थल है.
पुस्तक अंश: अलक़ाज़ी और पद्मसी परिवारों के आईने से आप भारतीय समकालीन रंगमंच के इतिहास को देख सकते हैं. कुछ बरस पहले इब्राहीम अलक़ाज़ी के बेटे और एलेक पद्मसी के भांजे फ़ैसल अलक़ाज़ी ने एक किताब लिखी, 'एंटर स्टेज राईट'. भारतीय रंगमंच की अनूठी दास्तान इस किताब का अनुवाद युवा नाट्य आलोचक अमितेश कुमार ने किया है. पढ़िए इसका एक अंश.
ऊदा देवी केवल एक योद्धा नहीं थीं, बल्कि वे दलित और स्त्री अस्मिता की वह प्रतीक थीं जिन्होंने 1857 के संग्राम में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लखनऊ के सिकंदर बाग में अदम्य साहस और शौर्य का परिचय दिया. 16 नवंबर उनका शहीद दिवस था. इस अवसर देश उन्हें एक ‘स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और वीरांगना’ रूप में याद करता है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अगर हम साहित्य के पास जाते और उससे प्रतिकृत होते हैं तो उसमें जीवन के स्पंदन की बड़ी भूमिका है. किसी कृति में जीवन का स्पंदन हमें आकर्षित करता है और स्पंदन की अनुपस्थिति साहित्य से अपनापा नहीं जगाती.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: भारतीयता की कोई प्रामाणिक परिभाषा बहुवचन में ही हो सकती है, एकवचन में नहीं. भारतीयता बहुधार्मिक, बहुभाषिक, बहुआंचलिक, बहुसांस्कृतिक रही है. हमारे संवैधानिक लोकतंत्र ने भारतीयता के इन मूल्यों को आत्मसात् किया है. एकवचन पर बल देकर बहुसंख्यावादी तंत्र हमारी बहुलता को नष्ट कर रहे हैं.