लाज़्लो क्राज़्नाहोरकाई का रचनाकर्म: पूर्णविराम की तलाश

लाज़्लो क्राज़्नाहोरकाई के रचनात्मक अवदान का एक पहलू अगर उनके उपन्यास हैं, दूसरा है सिनेमा. लाज़्लो और बेला तार की फिल्में किसी फिल्मकार और उपन्यासकार की जुगलबंदी का श्रेष्ठतम उदाहरण हैं.

पुस्तक समीक्षा: सिर्फ़ मुसलमान-कल्याण के ज़रिये लोकतंत्र को बचाया नहीं जा सकता

हिलाल अहमद की नयी किताब के अनुसार, लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण की लड़ाई को मुसलमानों को बचाने की ‘एकमात्र’ कार्रवाई तक सीमित कर देने की लिबरल राजनीति हिंदुत्व की उस राजनीति के समान जान पड़ती है जो कहती है कि हिंदू-राष्ट्र के रास्ते में ‘एकमात्र’ रोड़ा भारत के मुसलमान हैं. 

लखनऊ का फिरंगीमहल: इतिहास ऐसा कि ताज को ईर्ष्या हो… 

लखनऊ में फिरंगीमहल नाम की एक ऐतिहासिक इमारत भी है और मुहल्ला भी. लेकिन जानें क्यों, इस महल या मुहल्ले की दूसरे ऐतिहासिक महलों व मुहल्लों जैसी चर्चा नहीं होती, जबकि आज़ादी की लड़ाई में इनके योगदान का इतिहास इतना गौरवशाली है कि उसकी बाबत जानकर दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल आगरा के ताजमहल को भी ईर्ष्या होने लग जाए!

इतिहास बचाना भारतीय संस्कृति और स्मृति को बचाने जैसा है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अनेक युवा इतिहासकार और अध्येता आज इतिहास के दुरूपयोग, दुर्व्‍याख्या और तथ्यों-तर्कों-साक्ष्य के बिना मनगढ़ंत बातें थोपने की लोकप्रिय होती वृत्ति को लेकर क्षुब्ध हैं. इतिहास को उसकी वस्तुनिष्ठता, विश्वसनीयता और प्रामाणिकता में बचाने की कोशिश व्यापक होना चाहिए.

बंगनामा: जब अलीपुरद्वार में आई बाढ़

20 जुलाई 1993 को अलीपुरद्वार सबडिवीज़न के उत्तरी भाग में कालजानी नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में भीषण वर्षा हुई— 24 घंटों में 99 सेंटीमीटर. फलस्वरूप अगले दिन नदी किनारे बसे इस शहर की रक्षा के लिए बना बांध कई जगहों पर टूट गया... बंगनामा की बत्तीसवीं क़िस्त.

हंगेरियन लेखक लाज़्लो क्राज़्नाहोरकाई को साहित्य का नोबेल पुरस्कार

हंगरी के उपन्यासकार और पटकथा लेखक लास्ज़्लो क्रासज़नाहोर्काई को इस साल का साहित्य का नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा हुई है. 9 अक्टूबर, 2025 को पुरस्कार की घोषणा करते हुए स्वीडिश अकादमी ने कहा कि यह पुरस्कार उनकी सशक्त और दूरदर्शी रचनाओं के लिए है, जो भयावह समय में भी कला की शक्ति को स्थापित करती हैं.

आशंकाओं के द्वीप में लघु मानव: विजयदेव नारायण साही का तार्किक मूल्यांकन

पुस्तक समीक्षा: आनंद पांडेय ने इस किताब के जरिए साही के कवि, आलोचक और पॉलिटिकल एक्टिविस्ट जैसे संपूर्ण किरदार का तार्किक मूल्यांकन किया है. साही का जीवन और कर्म इसका प्रमाण है कि साहित्य केवल मनोरंजन या सौंदर्यबोध का साधन नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति को दिशा देने का एक शक्तिशाली माध्यम है. उनकी विरासत हिंदी साहित्य और वैचारिक विमर्श के लिये आज भी प्रासंगिक और प्रेरणादायी है.

बिहार से इलाहाबाद तक: बांसुरी-यात्रा के कुछ बिखरे पन्ने, कुछ कसकते स्वर

बांसुरी के निर्माता का जीवन बांसुरी की धुन की तरह मनमोहक नहीं है. वह एक कठोर और कसकती धड़कन है. इस स्वर-यात्रा को नम और नरम निगाह से देख रहे हैं, बिहार में आशुतोष कुमार पाण्डेय और उत्तर प्रदेश में रमाशंकर सिंह.

गीतगोविन्द: जिसके मूल में वर्चस्व नहीं, समकक्षता है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: गीतगोविन्द याद दिलाता है कि भारत की कला-कल्पना, उसका अध्यात्मिक चिंतन, उसका भाषा-सौंदर्य कैसी समावेशी नैतिकता में मूलबद्ध था और उससे महान काव्य और कला संभव हुई.

लोक में राम: भिन्न छबियों का अनूठा मिथक

'राम' शब्द ऋग्वेद में एक राजा के नाम की तरह आया है. राम को रां से भी जोड़ा जाता है, जिसका अर्थ 'लाल' है. इसी से रंज या गुस्से में लाल होना निकलता है या 'जियो मेरे लाल' जहां लाल का अर्थ पुत्र है. छत्तीसगढ़ी में लाल के लिए समानार्थी शब्द 'रंगहा' है. संभव है कि यह खून के रंग के कारण समानार्थी हुआ हो, जैसे अपने पुत्र-पुत्री वंशजों को 'अपना खून' कहा जाता है.

गार्डन ऑफ ईडन: धर्म, तकनीक और यथार्थ की टकराहट

पुस्तक अंश: धर्म भी हमें या तो अमर मानता है या मरने के बाद स्वर्ग दिलाने का लालच दिखाता है. लेकिन नई तकनीकी और धर्म दोनों भूल जाते हैं कि डिजिटल दुनिया हो या अलौकिक दुनिया, उनकी धारणा के लिए भौतिक दुनिया की बुनियाद ज़रूरी है, और मृत्यु नामक सत्य से मानवीय जीवन और यथार्थ अलग हो ही नहीं सकते. हम मर्त्य मनुष्य अपनी अतृप्त इच्छाओं और असन्तुष्टियों पर विजय पाने के लिए इन दोनों का आधार लेते रहते हैं.

पंडित छन्नूलाल मिश्र: बनारस के स्वर-व्याकरण, एक गुरु का अवसान

पंडित छन्नूलाल मिश्र का निधन 2 अक्तूबर 2025 की सुबह मिर्ज़ापुर स्थित अपनी बेटी नम्रता के घर पर हुआ. वे 89 वर्ष के थे. हर महान गायक केवल सुरों को नहीं संजोता, बल्कि सुधार की पद्धति, ठहराव की संवेदना, और शब्दहीन संकेतों की परंपरा को भी रचता है.

वाजपेयी पर मोदी की छाया मंडराती रही, भाजपा की राजनीति हिंदुत्व का रुख करती गई

पुस्तक समीक्षा: अभिषेक चौधरी की 'बिलीवर्स डिलेमा: वाजपेयी एंड द हिंदू राइट्स पाथ टू पावर' बताती है कि अटल बिहारी वाजपेयी उदार राजनीति व लोकतांत्रिक आदर्शों में अडिग दिखना चाहते थे, पर उनकी पार्टी और उत्तराधिकारियों ने उन्हें बार-बार उस जगह धकेला जहां उनके शब्द खोखले पड़ते गए. इस द्वंद्व ने न केवल भाजपा की दिशा बदली बल्कि भारतीय राजनीति को भी हिंदुत्व की ओर झुका दिया.

अन्याय का प्रतिरोध सिर्फ़ साहस नहीं, रुचि का भी सूचक है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: साहित्य में न कहने की कई विधियां संभव हैं और कौशल और कल्पना ऐसी नई विधियां भी खोज सकते हैं, जो न कह जाएं लेकिन आपत्तिजनक न लगें या दिखाई दें. क्या हमारे समय में चतुराई और हिकमत से ऐसा न कहा जा रहा है? या कि अधिकांशतः न कहने से बचा जा रहा है?

अंतिमा: कविता और चित्र की संगति, एक भारतीय दृष्टि की तलाश

रज़ा के लिए बिंदु किसी जपमाला की तरह था. जैसे जप करने वाला बार-बार एक ही बिंदु को मन में दोहराकर उदात्त चेतना हासिल करता है, उसी प्रकार रज़ा बिंदु के प्रयोग से चित्रों के भीतर उदात्तता महसूस करते हैं.

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