बिहार का मतदाता देख रहा है कि कौन उसके अधिकार की रक्षा कर रहा है और कौन उसकी चुप्पी का फायदा उठा रहा है. आने वाला चुनाव केवल सरकार बदलने की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि इस बात की परीक्षा भी होगा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लोकतंत्र की कसौटी पर कौन खरा उतरता है.
रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित राष्ट्रगान पर विवाद होता रहा है. लेकिन टैगोर ने बड़ी व्यथा के साथ श्री सुधारानी देवी को अपने 23 मार्च 1939 के पत्र में लिखा था कि 'मैंने किसी चतुर्थ या पंचम जॉर्ज को ‘मानव इतिहास के युग-युग धावित पथिकों की रथ यात्रा का चिर-सारथी‘ कहा है, इस प्रकार की अपरिमित मूढ़ता का संदेह जो लोग मेरे विषय में कर सकते हैं उनके प्रश्नों का उत्तर देना आत्मावमानना है.'
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रायसेन में ‘रामचरित मानस’ के प्रसिद्ध हनुमान–रावण संवाद को सीता–हनुमान संवाद के रूप में प्रस्तुत किया. यह तथ्यात्मक ग़लती विपक्षी नेताओं से होती तो हंगामा मचता, लेकिन यहां सन्नाटा रहा. यह घटना धार्मिक आख्यानों के राजनीतिक इस्तेमाल पर सवाल उठाती है.
चुनाव आयोग का बयान कि अगर 1 लाख मतदान केंद्रों की सीसीटीवी फुटेज देखने में 273 साल लगेंगे बैलगाड़ी युग की याद दिलाता है. क्या आयोग को नहीं पता कि डेटा के आकलन करने में भारत कितना आगे बढ़ चुका है?
भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है; वह स्मृति, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक संरचना का वाहक भी होती है. ऐसे में जब भाषा सार्वजनिक नीति और राजनीति के केंद्र में आती है, तो वह केवल शैक्षिक या सांस्कृतिक विषय नहीं रह जाती-वह सत्ता, प्रतिनिधित्व और सामाजिक संतुलन का प्रश्न बन जाती है.
कर्नाटक की घटना दिल दहलाने वाली है. क्या हिंदू समाज घृणा में इस हद तक आत्मघाती हो चुका है कि अपने बच्चों की बलि देने को तैयार है अगर उससे मुसलमानों को और पीड़ित करने का एक बहाना मिल सके?
तमाम रणनीतिकारों का मानना है कि केंद्र सरकार ने जातीय जनगणना का फैसला इसलिए लिया क्योंकि कांग्रेस तथा अन्य क्षेत्रीय दल बार-बार इसे मुद्दा बनाकर भारतीय जनता पार्टी पर प्रहार करते रहे हैं. इस साल बिहार में चुनाव होने हैं जिसे जातीय राजनीति का प्रयोगशाला माना जाता है. भाजपा ने जातीय जनगणना की घोषणा करके थोड़ी बढ़त हासिल कर ली है.
5 अगस्त, 2019 के बाद का कश्मीर भारत के लिए आईना है. उसके बाद भारत का तेज़ गति से कश्मीरीकरण हुआ है. नागरिकों के अधिकारों का अपहरण, राज्यपालों का उपद्रव, संघीय सरकार की मनमानी.
प्रधानमंत्री स्त्रियों के अधिकारों के लिए बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन उनके कथनों का उनकी ही पार्टी के सांसद, मंत्री और कार्यकर्ता पालन नहीं करते.
न्यायालय और सड़क की भीड़ में भेद मिट जाना चिंता का विषय है. यह एक नई राष्ट्रवादी स्वतःस्फूर्तता का जन्म है. नेहरू प्लेस की भीड़ संगठित नहीं थी. वे लोग बजरंग दल के सदस्य शायद नहीं थे. लेकिन जैसे ही अदालत ग़ज़ा के लिए सहानुभूति की बात सुनते ही बिफर पड़ी, यह भीड़ फ़िलिस्तीन का झंडा देखते ही भड़क उठी.
रामचरण मल्लाह एक प्रशिक्षित वकील के रूप में 20वीं सदी के शुरुआती दौर में लखनऊ में निषाद और मल्लाह जातियों की एक प्रमुख आवाज़ बनकर उभरे. 1925 में उन्होंने निषाद/मल्लाह समुदाय में राजनीतिक जागरूकता लाने के उद्देश्य से ‘अखिल भारतीय निषाद महासभा’ की स्थापना की थी.
बहराइच में ग़ाज़ी मियां की दरगाह और तब्लीग़ी जमात पर एफआईआर को लेकर क्रमशः इलाहाबाद और दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों के बाद कई हलकों में यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकारें इनसे कुछ सबक लेकर अपने मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक एजेंडे से बाज़ आएंगी?
भारत और नेपाल ने साथ तप किया, साथ सीखा और साथ आगे बढ़े. आज जब सीमाएं दीवारों में बदल रही हैं और राष्ट्रवाद रिश्तों की स्मृति को धुंधला कर रहा है, तब यह साझा संघर्ष हमें याद दिलाता है कि भारत और नेपाल दो राष्ट्र नहीं हैं. वे एक ही अधूरी कथा के दो पात्र हैं.
क्या यह कहना वाजिब होगा कि शिक्षा के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बदलने की जो कोशिशें हाल में परवान चढ़ी हैं, उसे चुनौती देते हुए कुछ अध्यापक प्रतिरोध का व्याकरण विकसित कर रहे हैं?
जगदीप धनखड़ राजस्थानी किसान हैं, जो कई बार ज़मीन और फ़सल की हिफ़ाज़त के लिए झुक जाता है. लेकिन जब उसे लगता है कि पानी सिर से गुज़र रहा है तो वह पटखनी देने में देर नहीं लगाता. उसकी वह पटखनी किसी विद्रोही से भी अधिक ख़तरनाक़ होती है.