बिहार में कई पिछड़ी जातियां हैं, जिनकी जनसंख्या अच्छी ख़ासी है लेकिन उन्हें उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला है. ये समुदाय अनुसूचित जाति का दर्जा और आरक्षण पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. कांग्रेस इस दलित केंद्रित राजनीति का धुरी बनना चाहती है. उसने रविदास समुदाय के नेता को प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया है. लेकिन क्या वह इन बिखरी जातियों को एकजुट कर पाएगी?
बांसुरी के निर्माता का जीवन बांसुरी की धुन की तरह मनमोहक नहीं है. वह एक कठोर और कसकती धड़कन है. इस स्वर-यात्रा को नम और नरम निगाह से देख रहे हैं, बिहार में आशुतोष कुमार पाण्डेय और उत्तर प्रदेश में रमाशंकर सिंह.
'राम' शब्द ऋग्वेद में एक राजा के नाम की तरह आया है. राम को रां से भी जोड़ा जाता है, जिसका अर्थ 'लाल' है. इसी से रंज या गुस्से में लाल होना निकलता है या 'जियो मेरे लाल' जहां लाल का अर्थ पुत्र है. छत्तीसगढ़ी में लाल के लिए समानार्थी शब्द 'रंगहा' है. संभव है कि यह खून के रंग के कारण समानार्थी हुआ हो, जैसे अपने पुत्र-पुत्री वंशजों को 'अपना खून' कहा जाता है.
जब असुर इस देश की एक प्रजाति है तो उनकी हार या उनके नायकों की हत्या का उत्सव मनाना किस तरह की मानसिकता का परिचायक है? जेएनयू में महिषासुर शहादत दिवस मनाने वाले दलित, पिछड़े, आदिवासी छात्रों का कहना है कि जब कैंपस में दुर्गापूजा, सरस्वती पूजा आदि हिंदू अनुष्ठान हो सकते हैं तो बहुजन अपने नायक महिषासुर की पूजा क्यों नहीं कर सकते?
झारखंड में ई-केवाईसी की आड़ में राशनकार्ड धारकों के खाद्य सुरक्षा से वंचित होने का ख़तरा बढ़ रहा है. यह स्थिति राज्य में भूख और कुपोषण की समस्या को विकराल कर सकती है. केंद्र सरकार ने 41 लाख अयोग्य कार्डधारकों की सूची राज्य को भेजी है. राज्य में 4 अगस्त तक 2.5 लाख कार्ड रद्द भी हो चुके हैं, लेकिन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल बने हुए हैं.
शिक्षा का भगवाकरण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार की सबसे महत्वाकांक्षी और पुरानी परियोजनाओं में से एक है. वह जानता है कि इस बहुधर्मी, बहुभाषी देश को हिंदू राष्ट्र के सांचे में ढालने का लक्ष्य तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक देशवासियों, खासकर युवाओं, के दिलो-दिमाग और सोच-सरोकारों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित न कर ले.
सुशीला कार्की का कार्यकाल छोटा है, पर उनका असर स्थायी हो सकता है. अगर वे निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव करा पाती हैं, तो यह पूरे नेपाल की जीत होगी. क्या उनका कार्यकाल साबित कर पायेगा कि अधूरी क्रांतियों की इस लंबी यात्रा में उम्मीद की लौ अब भी जल रही है?
आज़ादी के दो साल बाद 1949 में 14 सितंबर को संविधान सभा में एक वोट के बहुमत से हिंदी को देश की राजभाषा घोषित किया गया था. चूंकि यह आज़ादी की लड़ाई में उसके योगदान के पुरस्कार जैसा था, इसलिए इससे उसके प्रेमियों की, जिनमें अनेक गैरहिंदीभाषी भी शामिल थे, खुशी का पारावार नहीं रह गया था.
नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली का इस्तीफ़ा केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है. यह दशकों से जमा हुई निराशा और अधूरी उम्मीदों का परिणाम है. नेपाल में वर्तमान हिंसा और अस्थिरता को समझने के लिए हमें पिछले कई दशकों की अधूरी क्रांतियों, संघर्षों और उनकी असफलताओं पर ध्यान देना होगा.
नेपाल में सोशल मीडिया बैन, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ भड़के विरोध के बाद प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफ़ा देना पड़ा है. राजधानी काठमांडू समेत कई शहर आग और हिंसा में डूबे हैं. प्रदर्शनकारियों ने नेताओं के घरों को निशाना बनाया है. यह असंतोष नेपाल की लोकतांत्रिक यात्रा की गहरी दरारों को उजागर करता है.
संकर्षण ठाकुर का जाना सिर्फ़ एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि उन शब्दों का मौन हो जाना है जो समाज की गंध और सच्चाई को पकड़ते थे. पटना की मिट्टी से निकले इस पत्रकार ने कश्मीर से बिहार तक कथाओं को दर्ज किया. उनका लेखन पत्रकारिता के लिए अमिट धरोहर है.
उस पत्नी के बारे में सोचिए जो अपने पति के लौटने का 19 साल तक इंतज़ार करती है. उस बेटी के बारे में सोचिए जो अपने पिता के जेल जाने के बाद पैदा हुई. उसने कभी अपने पिता का चेहरा नहीं देखा. वह पढ़ाई करके डॉक्टर या इंजीनियर बन सकती थी. लेकिन उसके पिता के जेल में होने के कारण, यह संभव नहीं था.
एक वक्त देश में कई आतंकी हमले हुए थे. हर हमले के बाद कुछ अपवादों को छोड़कर, मुस्लिम पुरुषों पर जघन्य आरोप लगाये गये और उन्हें सालों तक जेल में रखा गया. उनके परिवार ग़रीबी और अपमान में जीते रहे. और फिर ये मामले निराधार साबित होने लगे. अदालतों ने आरोपियों को निर्दोष घोषित कर दिया. लेकिन उनका खोया जीवन कौन लौटाएगा?
सिलिकोसिस बीमारी पत्थर की खदानों और ईंट के भट्ठों से निकलने वाले धूल के कणों से होती है, जिससे फेफड़े बुरी तरह प्रभावित होते हैं. इससे मजदूरों की कार्यक्षमता के साथ उनकी उम्र भी घटती जा रही है, लेकिन उनके लिये मास्क भी मयस्सर नहीं.
करीब साल भर पहले प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने 'द वायर हिंदी' में 'कविता में जनतंत्र' नामक एक श्रृंखला प्रकाशित की थी. युवा लेखक विभांशु कल्ला प्रस्तावित करते हैं कि अपूर्वानंद ने भारत पर मंडराते जनतांत्रिक संकट और उसके लक्षणों की पहचान तो की, लेकिन उनके आग्रह इस संकट की उत्पत्ति और विकास को समझने में बाधा बन गये.