नेपाल के मधेश क्षेत्र में जारी सांप्रदायिक तनाव कई ज़िलों में फैल चुका है, जिसमें अब तक 3 लोगों की मौत हो चुकी है. नेपाल में स्थानीय स्तर पर सांप्रदायिक तनाव कोई नई बात नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हालिया हिंसा जिस पैमाने पर और जिस तेज़ी से फैली है, वह स्थिति के गंभीर रूप से बिगड़ने का संकेत है.
अप्रैल 2022 में खरगोन में हुई सांप्रदायिक हिंसा के चार साल बाद एक सत्र अदालत ने पुलिस द्वारा आरोपी बनाए गए 11 मुस्लिम पुरुषों को सभी आरोपों से बरी करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा. उस साल खरगोन में रामनवमी पर निकाले गए धार्मिक जुलूस के दौरान हुई हिंसा में दुकानों, घरों एवं वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया था.
वर्ष 2020 के दिल्ली दंगों के दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक कर्मचारी अंकित शर्मा की भीड़ द्वारा हत्या कर दी गई थी. दिल्ली की अदालत ने पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन को हत्या, दंगा करने, मारपीट, आपराधिक बल प्रयोग और समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने जैसे आरोपों में दोषी ठहराया है. अदालत ने हुसैन को आपराधिक साज़िश और दंगे के लिए उकसाने के आरोपों से बरी कर किया है.
साल 2024 में संभल के शाही जामा मस्जिद के सर्वेक्षण के दौरान हुई हिंसा के मामले में आरोपी 22 लोगों के ख़िलाफ़ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रोक लगा दी है. इससे पहले 13 मई 2026 को इसी तरह के एक मामले में चार अन्य आरोपियों के ख़िलाफ़ चल रही कार्यवाही पर अदालत ने रोक लगा दी थी.
पुस्तक समीक्षा: पत्रकार नेहा दीक्षित की 'द मैनी लाइव्स ऑफ सईदा एक्स' का हिंदी अनुवाद असल में सईदा के क़रीब की भाषा में किताब का फिर से लौटना है. दीक्षित सईदा के जीवन के ज़रिये मेहनत की लूट से चल रहे वैश्विक बाज़ार के दूसरे ध्रुव की कहानी कहती हैं. तमाम दुखों के बाद भी लोग कैसे ख़ुद को जीवित रखते हैं, सब खो देने के बाद कैसे जीवन शुरू करते हैं, और कई बार व्यवस्था के ख़िलाफ़ साझा संघर्ष
पुस्तक समीक्षा: आलोचक और अनुवादक बलवंत कौर की विभाजन पर आई शोधपरक किताब ‘स्मृति और दंश’ इतिहास लेखन नहीं है. किताब विभाजन की निरंतरता को स्वातंत्र्योत्तर परिप्रेक्ष्य में उन सभी महत्त्वपूर्ण पड़ावों पर देखती है, जो हमारे वर्तमान की दुश्चिंताओं के उत्तरदायी हैं. आज के ध्रुवीकृत माहौल में ऐसी किताबें हमें अपने विवेक और दृष्टि के संकुचित करने के ख़तरों के प्रति आगाह करती हैं.
मुज़फ़्फ़रनगर में 7 सितंबर 2013 को हुए सांप्रदायिक दंगों से जुड़े एक मामले में अदालत ने 23 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया. भौराकलां पुलिस ने इस मामले में 27 आरोपियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट कोर्ट में दाखिल की थी, इनमें से चार आरोपियों की पहले ही मौत हो चुकी है.
गरियाबंद ज़िले के दुतकैया गांव में सैकड़ों लोगों की भीड़ लाठी, ईंट, पत्थर और केरोसिन की बोतलें लेकर कथित तौर पर 10 मुस्लिम परिवारों पर हमला किया, वाहनों और घरों में आगजनी की. इस घटना में कम से कम छह पुलिसकर्मी घायल हो गए. पुलिस ने दंगे के सिलसिले में दो एफआईआर दर्ज की गई है, लेकिन पुलिस बल पर हमला करने वालों के ख़िलाफ़ फिलहाल कोई केस दर्ज नहीं किया है.
हिंसा के प्रति राज्य की सहनशीलता की नीति के कारण हिंसा की संस्कृति का समाज में विस्तार कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है. कश्मीरी विद्यार्थियों, व्यापारियों पर हमलों पर राष्ट्रीय चुप्पी से पता चलता है कि चूंकि मान लिया गया है कि वे पूरे भारतीय नहीं हैं, उन पर हिंसा की जा सकती है. हम किसी न किसी तरह, किसी समुदाय, व्यक्तियों पर अभारतीयता का आरोप लगा सकते हैं और उन्हें मार सकते हैं.
पुस्तक अंश: बलवंत कौर अपनी पुस्तक ‘स्मृति और दंश’ में लिखती हैं, '1992 में मस्जिद का ढांचा गिराते समय भी अतीत में हुए अन्याय और उत्पीड़न का कथानक रचकर न सिर्फ़ इस कृत्य को जायज़ ठहराया गया बल्कि धार्मिक विभाजन का विरोध कर पाकिस्तान न जाने का फ़ैसला लेने वाले और नये बन रहे लोकतंत्र में आस्था दिखाने वाले मुसलमानों को भी उसी अतीत के उत्पीड़न के तर्क के आधार पर प्रताड़ित किया गया. यहां तक कि 'समय-समय पर उन्हें
यूपी के फतेहपुर ज़िले के मवई गांव में मंगलवार को कथित तौर पर दो सौ साल पुरानी एक मज़ार को गिराए जाने के आरोप में पुलिस ने बजरंग दल के एक समन्वयक को गिरफ़्तार किया है और कई आरोपियों की तलाश जारी है. बताया गया है कि तोड़फोड़ करते समय आरोपी बांग्लादेश के मौजूदा हालात का ज़िक्र कर रहे थे.
छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले के बड़ेतेवड़ा गांव के ईसाई धर्म अपना चुके एक व्यक्ति के 70 वर्षीय पिता के शव को दफ़नाने को लेकर हुए विवाद के बाद हिंसक झड़पें हुईं जिसमें 20 पुलिसकर्मी समेत कई लोग घायल हो गए. बताया गया है कि भीड़ ने गांव में हिंसा और तोड़फोड़ भी की है.
बिहार के नवादा ज़िले में धार्मिक पहचान पूछने के बाद एक कपड़ा व्यापारी की भीड़ द्वारा बेरहमी से पिटाई कर हत्या कर दी गई. इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. घटना ने राज्य में बढ़ती भीड़ हिंसा और कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.
दिल्ली की अदालतों ने साल 2020 के दंगों से जुड़े कम से कम 17 मामलों में आरोपियों को ‘गढ़े गए’ सबूत, ‘काल्पनिक’ गवाह और ‘फ़र्ज़ी मुक़दमे’ का हवाला देते हुए बरी कर दिया है. जजों ने जांच के दौरान दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
असम के धुबरी में सांप्रदायिक तनाव के बाद मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने मंगलवार को जिले का दूसरा दौरा किया. उन्होंने 150 गिरफ्तारियों की जानकारी दी और कहा कि 'हम इस संवेदनशील जिले में भारतीय सेना का एक स्थायी बेस स्थापित करने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं.'