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मणिपुर की भौगोलिक स्थिति बदलने वाले किसी भी समझौते का विरोध करेगी कांग्रेस: जयराम रमेश

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने सरकार से मांग की कि वह नगा समूहों से हो रही बातचीत के नियम और शर्तों को सार्वजनिक करे. इसके अलावा उन्होंने तीन राज्यों- मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और असम, जो नगा शांति वार्ता से प्रभावित हो सकते हैं, उन्हें इस बातचीत में शामिल करने की भी मांग की है.

जयराम रमेश. (फाइल फोटो: पीटीआई)

जयराम रमेश. (फाइल फोटो: पीटीआई)

इम्फालः पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम नरेश ने नगा शांति वार्ता में पारदर्शिता को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि मणिपुर सहित पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की भौगोलिक स्थिति में बदलाव लाने वाले किसी भी शांति समझौते का कांग्रेस विरोध करगी.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जयराम ने कहा कि मणिपुर की भौगोलिक स्थिति में एक इंच भी बदलाव लाने वाले नगालैंड के साथ किसी भी तरह के शांति समझौते का कांग्रेस पुरजोर विरोध करेगी.

नगा शांति वार्ता के मद्देनजर मणिपुर की मौजूदा स्थिति का आकलन करने कांग्रेस का छह सदस्यीय शिष्टमंडल रविवार को मणिपुर की राजधानी इम्फाल पहुंचा और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) पर लोगों और पार्टी नेताओं की राय जानी.

कांग्रेस भवन में रमेश ने पत्रकारों से कहा, ‘केंद्र सरकार की ओर से नगा शांति वार्ता पर कोई पारदर्शिता नहीं है. मौजूदा नगा शांति वार्ता पर प्रगति की भी कोई जानकारी नहीं दी गई है.’

उन्होंने कहा कि मणिपुर सहित किसी भी पूर्वोत्तर राज्य की भौगोलिक स्थिति में बदलाव लाने वाले समझौते का कांग्रेस विरोध करेगी.

जयराम रमेश ने कहा कि पूर्वोत्तर की समस्याओं विशेष रूप से नगा शांति समझौते से जुड़ी हुई समस्याओं, नागरिकता संशोधन बिल (सीएबी) 2016 और एनआरसी का आकलन करने के लिए ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) प्रमुख सोनिया गांधी की निगरानी में एक टीम का गठन किया गया है.

उन्होंने कहा कि हालांकि नगा शांति वार्ता की वजह से मणिपुर में मौजूदा अशांति को देखते हुए इसमें तुरंत हस्तक्षेप की जरूरत है. टीम ने पहले मणिपुर का दौरा करने का फैसला किया है.

जयराम रमेश ने कहा कि भारत सरकार और नगा समूहों के बीच तीन अगस्त 2015 को इंडो-नगा फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे और इस समझौते की विषयवस्तु अभी भी पूरी तरह से गोपनीय बनी हुई है.

उन्होंने कहा कि यहां तक कि तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह और असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री भी इससे वाकिफ नहीं हैं.

उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस पार्टी मणिपुर की भौगोलिक स्थिति में बदलाव लाने वाले नगालैंड में किसी भी तरह के समझौते का पुरजोर तरीके से विरोध करेगी. पार्टी मणिपुर की सरकार के साथ मणिपुर में स्वायत्त जिला काउंसिल के संबंधों में बदलाव लाने वाले समझौते का विरोध करेगी.’

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल के दौरान केंद्र ने किसी भी राज्य की भौगोलिक स्थिति में बदलाव किए बिना असम, मिजोरम और त्रिपुरा के समझौतों पर हस्ताक्षर किया था.

कांग्रेस शासन के समय हुई संधियों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि असम समझौता 1985, पंजाब शांति समझौता और मिजोरम समझौता 1987 जैसे दूसरे समझौतों के दौरान राज्यों की सीमाओं में बदलाव नहीं किया गया था.

उन्होंने सलाह दी कि वर्तमान भाजपा सरकार को 22 साल पुराने शांति वार्ता का समाधान बिना किसी समुदाय के हित को प्रभावित किए निकालना चाहिए.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व मंत्री ने एनडीए सरकार से मांग की कि वह नगा समूहों से हो रही बातचीत के नियम और शर्तों को सार्वजनिक करे. इसके अलावा उन्होंने तीन राज्यों- मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और असम, जो नगा शांति वार्ता से प्रभावित हो सकते हैं, उन्हें इस बातचीत में शामिल करने की भी मांग की है.

उन्होंने नागरिकता संशोधक विधेयक को भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे संविधान के धर्म निरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ बताया.

एनआरसी को लेकर जयराम रमेश ने कहा कि यह असम समझौता 1985 को हिस्सा था. उन्होंने ऐसी किसी भी प्रक्रिया को किसी अन्य राज्य में लागू करने से पहले सावधान रहने को कहा. उन्होंने कहा कि भारतीय नागरिकों को प्रताड़ित करने के लिए एनआरसी का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.

उन्होंने मोदी सरकार की इन सभी नीतियों को वास्तविक मुद्दों- किसानों की परेशानी, बढ़ती बेरोजगारी और राजस्व में गिरावट, से ध्यान भटकाने वाला बताया.

छह सदस्यीय शिष्टमंडल में पूर्व केंद्रीय मंत्री के साथ एआईसीसी महासचिव मुकुल वासनिक, पूर्व सांसद जितेंद्र सिंह, सांसद मणिकम टैगोर, एआईसीसी सचिव रणजीत मुखर्जी और मोहम्मद अली खान भी यहां पहुंचे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)