नॉर्थ ईस्ट

नॉर्थ ईस्ट डायरी: पूर्वोत्तर के राज्यों से इस सप्ताह की प्रमुख ख़बरें

इस हफ़्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में मणिपुर, मेघालय, असम, अरुणाचल प्रदेश और नगालैंड के प्रमुख समाचार.

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असम के चिरांग ज़िले के डिगोलडॉन्ग गांव का वह घर जहां से सुरक्षा बलों ने लुकास नारज़री और डेविड इजलेरी को उठाया था. यह गांव गुवाहाटी से 200 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है. इस गांव से पांच किलोमीटर दूर मंडारगुड़ी में लुकास और डेविड को कथित तौर पर मार दिया गया था. (फोटो: राजीव भट्टाचार्य)

असम: कथित फर्ज़ी मुठभेड़ में हत्याओं पर आईजी की रिपोर्ट साझा करने से इनकार

सीआरपीएफ ने अपने एक महानिरीक्षक द्वारा दी गई फर्ज़ी मुठभेड़ मामले की रिपोर्ट सार्वजनिक करने से इनकार कर दिया है. सीआरपीएफ ने दलील दी कि अर्धसैन्य बलों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम से जानकारी देने से छूट है.

असम में सुरक्षा बलों के संयुक्त दस्ते द्वारा एक फर्ज़ी मुठभेड़ में दो लोगों की हत्या से जुड़ी रिपोर्ट की प्रति मांगे जाने पर सीआरपीएफ ने अपने जवाब में आरटीआई अधिनियम की धारा 24 का हवाला दिया.

फर्ज़ी मुठभेड़ में हत्या मानवाधिकारों का उल्लंघन है और कुछ संगठनों को आरटीआई अधिनियम के तहत जानकारी देने से मिली छूट के दायरे में नहीं आती.

अधिनियम कहता है कि जब मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी सूचनाएं मांगी जाती हैं तो केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) से मंज़ूरी मिलने के 45 दिन के अंदर इसे उपलब्ध कराना होगा. लेकिन सीआरपीएफ ने मामले को सीआईसी को संदर्भित करने के बजाय आवेदन को ख़ारिज कर दिया.

गुजरात कैडर के 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी रजनीश राय ने सीआरपीएफ के सर्वोच्च अधिकारियों को एक रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें क्रमवार तरीके से बताया गया था कि कैसे सेना, असम पुलिस और सीआरपीएफ की कोबरा इकाई तथा सशस्त्र सीमा बल के संयुक्त दस्ते ने चिरांग जिले के सिमलागुड़ी इलाके में 29-30 मार्च को एक मुठभेड़ दो लोगों को मार दिया जिन्हें उन्होंने प्रतिबंधित संगठन एनडीएफबी (एस) का हिस्सा बताया.

राय ने अपनी 13 पन्नों की रिपोर्ट में कथित तौर पर कहा गया कि घटना के बारे में सूचना और बलों के संयुक्त दस्ते द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर इस ऑपरेशन का एक काल्पनिक विवरण पेश करती है जिसमें हिरासत में लिए गए दो लोगों की पूर्व नियोजित हत्या को छिपाकर इसे पेशेवराना उपलब्धि से जुड़े बहादुरी भरे कृत्य के तौर पर पेश किया गया.

गृह मंत्रालय ने रिपोर्ट मिलने की पुष्टि की है और कहा कि इसका अध्ययन किया जाएगा और इसकी विषयवस्तु पर जल्द ही कार्रवाई की जाएगी.

इससे पहले असम में विपक्ष के नेता देवव्रत सैकिया ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को पत्र लिखकर राज्य के चिरांग ज़िले में सुरक्षा बलों के संयुक्त दल द्वारा कथित फर्ज़ी मुठभेड़ की न्यायिक जांच की मांग की है.

कांग्रेस के विधायक ने कहा कि मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक, 30 वर्षीय लुकास नारज़री और 25 वर्षीय डेविड इजलेरी को इस वर्ष 30 मार्च को सेना, असम पुलिस, सीआरपीएफ और सशस्त्र सीमा बल ने एक अभियान में मार गिराया था.

सैकिया ने पत्र में कहा, फर्ज़ी मुठभेड़ में दो युवकों की हत्या के आरोप किसी और ने नहीं बल्कि सीआरपीएफ, नॉर्थ ईस्ट सेक्टर के महानिरीक्षक रजनीश राय ने लगाए हैं.

उन्होंने लिखा है, किसी समय असम में फर्ज़ी मुठभेड़ या गोपनीय तरीके से हत्याएं एक भावपूर्ण मुद्दा था. इसलिए बीते समय में ज़्यादा नहीं जाते हुए मैं आपसे (राजनाथ सिंह) अनुरोध करता हूं फर्ज़ी मुठभेड़ के मामले की न्यायिक जांच करवाइए और इस किस्म की अमानवीय और अलोकतांत्रिक घटनाओं को रोकने के लिए कड़े कदम उठाएं.

उन्होंने रेखांकित किया कि असम में सशस्त्र बल (विशेषाधिकार) कानून प्रभाव में है और वहां एकीकृत कमान ढांचा भी है, जिसका मतलब है कि असम में सुरक्षा से जुड़े मामलों में केंद्रीय गृह मंत्रालय की महत्वपूर्ण भूमिका है.

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डेविड इजलेरी. (फोटो: राजीव भट्टाचार्य)

पूर्वोत्तर में तैनात सीआरपीएफ के महानिरीक्षक रजनीश राय ने 17 अप्रैल को आरोप लगाया था कि असम में सुरक्षा बलों के संयुक्त दल ने जिस मुठभेड़ को अंजाम दिया था वह फर्ज़ी थी और इसमें एनडीएफबी के उग्रवादी बताकर दो लोगों की हत्या कर दी गई.

समाचार वेबसाइट वन इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, रजनीश राय ने 13 पेज की अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पुलिस की इस कहानी में बहुत-सी ख़ामियां हैं. उनकी रिपोर्ट कई सबूतों के अलावा उन गवाहों के बयानों पर आधारित है, जिन्होंने घटना से काफी वक़्त पहले सुरक्षाबलों को इन दो उग्रवादियों को किसी अन्य गांव से उठाते देखने का दावा किया था.

रिपोर्ट के मुताबिक सुरक्षाबलों को उनके कब्जे से सिर्फ एक चीन-निर्मित ग्रेनेड मिला था, और शेष सभी हथियार ‘प्लान्ट’ किए गए थे. रजनीश राय ने लिखा है कि सीआरपीएफ की आधिकारिक रिपोर्ट सुरक्षा बलों के संयुक्त ऑपरेशन की काल्पनिक कथा पेश करती है, ताकि दो लोगों की हिरासत में रखकर की गई सोची-समझी हत्या पर पर्दा डाला जा सके.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सुरक्षा बलों को समाज के फायदे की आड़ लेकर सोच-समझकर उनकी हत्या कर देने का हक नहीं है. रिपोर्ट तैयार करने वाले रजनीश राय केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के महानिरीक्षक (आईजी) हैं. वह असम और पूर्वोत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में उग्रवाद-विरोधी बल के प्रभारी हैं.

मणिपुर: बंद और अवरोध रोकने के लिए क़ानून लाएगी राज्य सरकार

भाजपा की अगुवाई वाली मणिपुर सरकार ने एक कैबिनेट बैठक में राज्य में होने वाले बंद और अवरोधों को रोकने के लिए क़ानून लाने का फ़ैसला किया है.

31 मई को हुई कैबिनेट की एक बैठक में राज्य में बंद के विरुद्ध इस तरह का कोई क़ानून लाने को लेकर विस्तार से चर्चा हुई, जहां केरल, पश्चिम बंगाल, मेघालय जैसे कई राज्यों के हाईकोर्ट द्वारा इस तरह के बंद को ग़ैरकानूनी बताते हुए दिए गए फ़ैसलों का भी संदर्भ दिया गया.

स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कैबिनेट की इस बैठक में राज्य में बारहों महीने विभिन्न राजनीतिक और नागरिक संगठनों द्वारा आयोजित किए जाने वाले बंद और अवरोधों से आम जनता को होने वाली परेशानियों के बारे में भी बात करते हुए यह भी कहा गया कि यह संविधान द्वारा देश के आम नागरिकों को मिले ‘फ्री मूवमेंट’ (स्वतंत्र गतिविधियों) के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है.

इन सभी तथ्यों को मद्देनज़र रखते हुए कैबिनेट ने यह तय किया है कि इस तरह के बंद या अवरोध के समय जनता को होने वाली परेशानी और सार्वजानिक संपत्ति के नुकसान की ज़िम्मेदारी बंद के आयोजक की होगी.

इस क़ानून के मुताबिक बंद या अवरोध के समय होने वाले भुगतान की भरपाई भी आयोजकों को करनी होगी. इसके अलावा अगर वह व्यक्ति दोषी साबित होता है, तब उसके ख़िलाफ़ आपराधिक कार्रवाई तो होगी ही, साथ ही उसे कोई भी सरकारी नौकरी करने और सरकार द्वारा संचालित योजनाओं के लाभ से वंचित रखा जाएगा.

पिछले कुछ दशकों में मणिपुर में अनेकों बंद और आर्थिक अवरोध देखे गए हैं. बीते साल तत्कालीन सरकार द्वारा राज्य में नए ज़िले बनाने के निर्णय के विरोध में यूनाइटेड नगा काउंसिल ने राज्य के प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्ग को अवरुद्ध कर दिया था, जिससे आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ था.

उस समय यूनाइटेड नगा काउंसिल का समर्थन नगा पीपुल्स फ्रंट (एनपीएफ) ने भी किया था. अब एनपीएफ राज्य में भाजपा के साथ गठबंधन करके सरकार का हिस्सा है. हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि एनपीएफ 31 मई को हुई इस बैठक में शामिल हुआ था या नहीं.

मेघालय: मवेशी ख़रीद-फरोख़्त पर प्रतिबंध मामले में मेघालय सरकार ने त्रिपुरा सरकार को लिखा पत्र

Mukul Sangma PTI

मेघालय के मुख्यमंत्री मुकुल संगमा. (फोटो: पीटीआई)

तुरा: मेघालय के मुख्यमंत्री मुकुल संगमा ने त्रिपुरा के अपने समकक्ष माणिक सरकार को पत्र लिखकर मवेशी बाजार में वध करने के लिए पशुओं की ख़रीद और बिक्री पर केंद्र के प्रतिबंध पर संयुक्त रूप से विरोध करने की बात कही है.

संगमा ने कहा है कि यह कदम मवेशी बाज़ारों सहित राज्य सूची की सामग्रियों को विनियमित करने संबंधी राज्यों के अधिकारों का उल्लंघन है.

शनिवार शाम सरकार को लिखे पत्र में उन्होंने कहा, ‘राज्य सरकारों को केंद्र सरकार पर इस तरह की कार्रवाई के लिए सामूहिक तौर पर दवाब डालना चाहिए जिससे सीधे देश का संघीय ढांचा कमज़ोर होता है.’ उन्होंने कहा कि अधिसूचना संघीय ढांचे की भावना को नकारने में बहुत ग़लत मिसाल पेश करेगी.

संगमा ने कहा, केंद्र सरकार को पशुओं के साथ क्रूरता पर रोकथाम अधिनियम के तहत मवेशी बाजारों के नियमन में बदलाव पर प्रस्ताव देने से पहले राज्य सरकारों से विचार-विमर्श कर सावधानी बरतनी चाहिए.

राज्यों से संयुक्त विरोध का आह्वान करते हुए संगमा ने कहा कि केंद्र सरकार का पशु बाजारों को विनियमित करने का कदम पर्यावरण नियमन की आड़ में राज्यों के अधिकारों का पूर्ण उल्लंघन है.

मेघालय: रेल परियोजनाओं का विरोध कर रहे लोगों से सरकार बातचीत को तैयार

मेघालय के गृह मंत्री एचडीआर लिंगदोह ने शनिवार को कहा कि राज्य सरकार खासी जयंतिया पर्वतीय क्षेत्र में रेल परियोजनाओं का विरोध कर रहे समूहों के साथ बातचीत करने को तैयार है.

रि-भोई ज़िले में रेल निर्माण स्थल पर हमले के लिए खासी छात्रसंघ के सात कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और राज्य की राजधानी में छिटपुट पेट्रोल बम हमलों के कुछ दिन बाद गृह मंत्री का बयान आया है.

गृह मंत्री लिंगदोह ने कहा, सरकार बातचीत करने पर विचार कर सकती है लेकिन पहले हिंसा और तोड़फोड़ की हरकतें रुकनी चाहिए.

उन्होंने कहा कि केएसयू नेताओं ने उनसे मांग की थी कि राज्य सरकार प्रभावशाली छात्र संगठन के साथ बातचीत करे हालांकि वह उनसे मुलाकात नहीं कर पाए क्योंकि वह बाहर थे.  बाहरी लोगों के भीड़-भाड़ के डर से राज्य के पूर्वी खासी जयंतिया क्षेत्र में रेलवे के विस्तार पर केएसयू ने खुलेआम विरोध प्रकट किया था.

अरुणाचल प्रदेश: 1962 में अधिग्रहीत ज़मीन के लिए लोगों को मिल सकता है मुआवज़ा

वर्ष 1962 में चीन के साथ युद्ध के बाद सेना द्वारा अरुणाचल प्रदेश में जमीन अधिग्रहीत किए जाने के 55 साल बाद अप्रत्याशित आश्चर्य के तौर पर हजारों निवासियों को मुआवज़ा मिल सकता है. केंद्र और राज्य सरकारें मुआवज़े के लिए काम कर रही हैं. मुआवज़े की राशि 3,000 करोड़ तक हो सकती है.

रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे और गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू, मुख्यमंत्री पेमा खांडू और केंद्र और राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस मुद्दे पर 30 मई को नई दिल्ली में एक बैठक कर विचार विमर्श किया.

अरुणाचल के निवासी रिजिजू ने कहा कि 1962 के चीन युद्ध के बाद सीमावर्ती राज्य में रक्षा प्रतिष्ठानों के लिए अधिग्रहीत ज़मीन के मुद्दे के निपटारे के लिए बैठक बुलाई गई थी.

उन्होंने कहा कि हालांकि अरुणाचल के लोगों को अति राष्ट्रभक्त भारतीय कहा जा सकता है लेकिन सेना द्वारा बड़े पैमाने पर ज़मीन के अधिग्रहण के बाद मुआवज़े का भुगतान नहीं होने के कारण उनमें असंतोष पैदा होने लगा था.

कहा जाता है कि भामरे ने अपने मंत्रालय तथा सेना में अधिकारियों से कहा है कि एक दूसरे और राज्य सरकार के साथ बेहतर समन्वय के ज़रिये वे सभी लंबित मुद्दों को त्वरित गति से निपटाएं.

रिजिजू ने तय सीमा के अंदर सभी मुद्दों के निपटारे और लंबित मुद्दों के हल पर बल दिया. उन्होंने अधिकारियों से सवाल किया कि बैठक के दौरान चर्चा के लिए सामने आए सभी मुद्दों के हल में वे कितना समय लेंगे.

मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने कहा कि लीज दर, स्वामित्व अधिकारों का अनुदान, दोहरे मुआवज़े का भुगतान और जमीन की दरों का निर्धारण का जल्दी ही हल हो जाएगा.

मेघालय: नोंगक्या खाद्य विषाक्तता मामले में न्यायिक जांच के आदेश

Meghalaya Food Poison The Shillong Times

मरीज़ों को अस्पताल में भर्ती कराया गया. (फोटो: द शिलॉन्ग टाइम्स)

री-भोई ज़िले के सुदूर नोंगक्या गांव में नौ लोगों की मौत की वजह बने खाद्य विषाक्तता के मामले में न्यायिक जांच के आदेश दिए गए हैं. 28 मई को यहां एक उत्सव के दौरान चावल और सुअर का मांस खाने से नौ लोगों की जान चली गई और लगभग 200 लोग बीमार हो गए थे.

ज़िले के उपायुक्त सीपी गोटमारे ने कहा, हमने अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट डी. खरसाती की अध्यक्षता में न्यायिक जांच के आदेश दिए गए हैं. उन्हें आठ जून तक रिपोर्ट जमा करवाने के लिए कहा गया है.

पुलिस अधीक्षक रमेश सिंह ने कहा कि पुलिस से भी मामले की जांच करने के लिए कहा गया है. पुलिस उपाधीक्षक सी. मोमिन को जांच का काम सौंपा गया है.

गोटमारे ने कहा कि आठ लोगों की मौत की अब तक पुष्टि हो चुकी है. एक और मौत की ख़बर मिली है लेकिन ज़िला प्रशासन की ओर से इसकी पुष्टि की जानी अभी बाकी है.

उन्होंने कहा, प्रशासन ने नोंगक्या गांव में त्वरित चिकित्सा सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए वहां सभी सुविधाओं के साथ एक चिकित्सीय दल की व्यवस्था की है.

डीसी और एसपी खाद्य विषाक्तता के पीड़ितों से मिलने के लिए नोंगपोह सिविल हॉस्पिटल, बेथनी हॉस्पिटल, उम्सनिंग सीएचसी और भोइरेमबोंग सीएचसी का दौरा कर चुके हैं और स्थिति का जायजा ले चुके हैं.

उन्होंने कहा कि मिली जानकारी के अनुसार, अधिकतर मरीज़ों की हालत स्थिर है और उनकी हालत पर नजर रखी जा रही है.

नगालैंड: सीआईसी ने कहा, नगा रूपरेखा समझौते का अभी खुलासा नहीं किया जा सकता

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को केंद्र और नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) के बीच 2015 में हुए एक शांति समझौते से जुड़ी सूचनाओं का खुलासा नहीं करने की इजाज़त दे दी है.

सूचना का अधिकार (आरटीआई) कार्यकर्ता वेंकटेश नायक ने भारत सरकार और एनएससीएन इसाक-मुइवा (एनएससीएन-आईएम) के बीच तीन अगस्त 2015 को हुए रूपरेखा समझौते का ब्योरा मांगा था.

संयुक्त ख़ुफिया समिति (जेआईसी) के अध्यक्ष और वार्ताकार आरएन रवि ने सीआईसी को बताया कि ज़मीनी हालात संवेदनशील और नाजुक हैं और सूचना समय से पहले जारी करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ठीक नहीं होगा.

मुख्य सूचना आयुक्त आरके माथुर ने रवि को उद्धृत करते हुए कहा, सरकार ढांचागत समझौते से होने वाले फायदे को गंवाना नहीं चाहती.

सीआईसी ने मंत्रालय पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उसे इस बात की पहचान करने में महीनों लग गए कि समझौते से जुड़े दस्तावेज जेआईसी के पास हैं.

सूचना मांगने वाले नायक ने दावा किया कि समझौते पर दस्तख़त के बाद एक प्रेस रिलीज में कहा गया था कि ब्योरा और लागू करने की योजना जल्द ही जारी की जाएगी लेकिन 18 महीने बीत जाने के बाद भी सूचना जारी नहीं की गई.

नायक ने कहा था कि पिछले साल दिसंबर में क्षेत्र में सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (आफ्सपा) के लागू रहने की अवधि बढ़ाने से इस तर्क को बल मिला कि आधिकारिक वार्ता और ज़मीनी हालात के बीच फर्क है. लिहाजा, समझौते के बारे में प्रामाणिक सूचना सार्वजनिक करना ज़रूरी है.

असम: गुवाहाटी के प्रतिष्ठित कॉटन कॉलेज को मिला विश्वविद्यालय का दर्ज़ा

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असम के शिक्षा मंत्री ने कॉटन विश्वविद्यालय का शुभारंभ किया. (फोटो: ट्विटर)

उच्च शिक्षा के लिए पूरे उत्तर पूर्व में मशहूर गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज को विश्वविद्यालय का दर्ज़ा मिल गया है. अब से इसे कॉटन कॉलेज स्टेट यूनिवर्सिटी के नाम से जाना जाएगा.

यह निर्णय 1 जून को राज्य सरकार द्वारा पिछले बजट सत्र में विधानसभा में पारित एक बिल के आधार पर लिया गया. इस फ़ैसले के बाद अब कॉटन यूनिवर्सिटी एक्ट 2017 के तहत कॉटन कॉलेज के मानव संसाधन और संपत्ति अब विश्वविद्यालय से संबद्ध होंगे.

1901 में असम में ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन चीफ कमिश्नर सर हेनरी कॉटन द्वारा शुरू किया गया ये कॉलेज दशकों से इस क्षेत्र के सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थियों के साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ अध्यापकों का भी गढ़ रहा है.

नगालैंड: स्कूलों में पढ़ाई जाएंगी स्थानीय बोलियां

नगालैंड सरकार ने शैक्षणिक सत्र 2018 से राज्य के विद्यालयों में राज्यभर की विभिन्न जनजातियों द्वारा बोली जाने वाली स्थानीय बोलियों को पढ़ाए जाने का फैसला किया है.

इस निर्णय को अमल में लाने के लिए मई में नगा पीपुल्स फ्रंट सरकार द्वारा एक आदेश में कहा गया कि इस क़दम से राज्य के शिक्षा विभाग को तीन-भाषाई नीति लागू करने में आसानी होगी, साथ ही स्थानीय भाषाओं को बचाने, बढ़ावा देने और संरक्षित करने में भी मदद मिलेगी.

यह आदेश सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूलों पर लागू होगा. हालांकि स्कूलों में माध्यम अंग्रेज़ी ही रहेगा पर शिक्षकों को पाठ्यक्रम के मुश्किल कॉन्सेप्ट और बिंदु स्थानीय भाषा में समझाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा.

गौरतलब है कि राज्य की जनजातियों के बीच नगामी भाषा ही प्रचलित है पर सभी जनजातियों की अपनी-अपनी बोलियां भी हैं. नगामी भाषा की अपनी कोई लिपि नहीं है, यह रोमन में लिखी जाती है. इसे राजकीय भाषा का दर्ज़ा भी नहीं मिला है.

इसी वजह से राज्य के स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई का माध्यम अंग्रेज़ी ही है. 1964 में राज्य की विधानसभा द्वारा अंग्रेज़ी को राज्य की आधिकारिक भाषा घोषित किया गया था.

असम: पूर्व आईबी प्रमुख उल्फा के साथ होंगे वार्ताकार

केंद्र सरकार ने असम में उग्रवादी संगठन उल्फा के साथ शांतिवार्ता के लिए ख़ुफिया ब्यूरो (आईबी) के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकार नियुक्त किया है.

प्राप्त जानकारी के मुताबिक, केरल कैडर के 1976 बैच के आईपीएस अधिकारी शर्मा को पिछले सप्ताह केंद्रीय गृह मंत्रालय से बतौर वार्ताकार नियुक्ति किए जाने का आदेश जारी किया गया था. सूत्रों के मुताबिक शर्मा ने दो जून को अपना कार्यभार संभाल लिया. वह पिछले साल 31 दिसंबर को आईबी प्रमुख पद से सेवानिवृत्त हुए थे.

बतौर वार्ताकार एक साल के लिए नियुक्त किए गए शर्मा शांतिवार्ता के प्रति सकारात्मक रुख़ रखने वाले उल्फा के धड़े नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड और अन्य स्थानीय संगठनों को बातचीत की मेज पर लाने का प्रयास करेंगे.

इससे पहले असम में उग्रवादी संगठनों के साथ वार्ताकार नियुक्त किए गए पीसी हलदर ने यह ज़िम्मेदारी 31 दिसंबर 2015 तक निभाई थी.

(संगीता बरुआ पिशारोती के सहयोग और समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)