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भूषण अवमानना मामला: 1,500 वकीलों ने की मांग, न्याय की विफलता को रोके अदालत

देश भर के क़रीब डेढ़ हज़ार वकीलों ने अवमानना के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रशांत भूषण को दोषी ठहराए जाने पर कहा कि अवमानना का डर दिखाकर यदि वकीलों को चुप कराया जाता है, तो इससे कोर्ट की ताकत और स्वतंत्रता प्रभावित होगी.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: दो ट्वीट्स के चलते सुप्रीम कोर्ट द्वारा वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना का दोषी करार दिए जाने के बाद देश के विभिन्न वर्गों के लोगों ने इस फैसले की आलोचना की है.

इसी कड़ी में वरिष्ठ अधिवक्ताओं समेत 1500 से ज्यादा वकीलों ने सर्वोच्च न्यायालय से अपील की है कि वह ‘सुधारात्मक कदम उठाकर न्याय की विफलता को रोकें.’

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, वकीलों ने कहा कि अवमानना का डर दिखाकर यदि वकीलों को चुप कराया जाता है, तो इसके सुप्रीम कोर्ट की ताकत और इसकी स्वतंत्रता प्रभावित होगी.

इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में श्रीराम पंचू, अरविंद दातार, श्याम दीवान, मेनका गुरुस्वामी, राजू रामचंद्रन, बिस्वजीत भट्टाचार्य, नवरोज सीरवई, जनक द्वारकावास, इकबाल छागला, डेरियस खंबाटा, वृंदा ग्रोवर, मिहिर देसाई, कामिनी देसाई और करुणा नंदी जैसे लोग शामिल है.

उन्होंने कहा, ‘यह फैसला जनता की नजर में कोर्ट के मान को बढ़ाता नहीं है, बल्कि यह आवाज उठाने के लिए वकीलों को हतोत्साहित करता है. जजों की नियुक्ति विवाद से लेकर उसके बाद की घटनाओं तक, बार ही न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा में सबसे पहले खड़ा हुआ है.’

वकीलों ने कहा कि वकीलों को चुप कराने से मजबूत कोर्ट का उदय नहीं होता है.

मालूम हो कि 14 अगस्त को जस्टिस अरुण मिश्रा, बीआर गवई और कृष्ण मुरारी की पीठ ने प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया था. कोर्ट ने कहा कि भूषण के दो ट्वीट पूरे ‘सुप्रीम कोर्ट पर अभद्र हमला’ हैं और इसमें ‘न्यायपालिका की नींव हिलाने की क्षमता’ है.

वकीलों ने अपने बयान में कहा, ‘एक स्वतंत्र न्यायपालिका का ये मतलब नहीं है कि जज टिप्पणियों और जांच से अछूते रह सकते हैं. यह वकीलों की जिम्मेदारी है कि वे किसी भी कमी को बार, बेंच और जनता के सामने लाएं. हो सकता है कि हममें से कुछ लोग प्रशांत भूषण के विचार से सहमत न हों, लेकिन हम सभी सर्वमत से ये कहते हैं कि किसी भी तरह से अदालत की अवमानना की कोशिश या अवमानना नहीं की गई है.’

उन्होंने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट का एक नामी वकील होने के नाते हो सकता है कि प्रशांत भूषण एक सामान्य व्यक्ति न हों, लेकिन उनके ट्वीट सामान्य बातों के अतिरिक्त कुछ भी बयां नहीं करते हैं. इसमें वही बातें हैं जो कि हाल के वर्षों में कोर्ट की कार्यप्रणाली के बारे में लोगों के बीच चर्चा होती है और सोशल मीडिया पर लिखा जाता है.’

प्रशांत भूषण को अवमानना का दोषी ठहराने वाले फैसले को वापस लेने की मांग के साथ ही बयान में कहा गया है कि इस महामारी के बाद सुप्रीम कोर्ट एक बड़ी बेंच गठित करके ‘आपराधिक अवमानना के मानकों की समीक्षा’ करे.

इसके अलावा एक अन्य बयान में 12 पूर्व जजों समेत 3,000 से अधिक लोगों प्रशांत भूषण का समर्थन करते हुए कोर्ट के फैसले की आलोचना की है.

उन्होंने कहा है कि प्रशांत भूषण द्वारा किया गया ट्वीट सिर्फ सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली को लेकर चिंताओं को जाहिर करता है.

उन्होंने कहा, ‘वैसा लिखने का उद्देश्य सर्वाच्च न्यायालय से ये गुजारिश करनी थी कि कोर्ट की सुनवाई को सामान्य ढंग से शुरू की जाए, खासकर राष्ट्रीय महत्व के मामले को.’

बयान में यह भी कहा गया है कि ट्वीट के जरिये उन चिंताओं को भी जाहिर करना था जिसमें कहा गया है कि न्यायपालिक अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी का उचित ढंग से निर्वहन नहीं कर रही है और सरकारी ज्यादती तथा मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के समय न्यायालय की प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं रहती है.