भारत

रफाल निर्माता कंपनी ने ऑफसेट दायित्वों को पूरा नहीं किया: कैग

रफाल बनाने वाली फ्रांस की दासो एविएशन और यूरोप की मिसाइल निर्माता कंपनी एमबीडीए ने विमान खरीद से संबंधित भारत को उच्च प्रौद्योगिकी की पेशकश के ऑफसेट दायित्वों को अब तक पूरा नहीं किया है. कैग ने कहा कि विक्रेता अपनी ऑफसेट प्रतिबद्धताओं को निभाने में विफल रहे, लेकिन उन्हें दंड देने का कोई प्रभावी उपाय नहीं है.

Bordeaux: A view of Rafale Jet at its Dassault Aviation assembly line, in Bordeaux, France, Tuesday, Oct. 8, 2019. Rajnath Singh is in the city for the handover ceremony of the first Rafale combat jet acquired by the Indian Air Force. (PTI Photo) (PTI10_8_2019_000158B)

रफाल जेट. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: लड़ाकू विमान बनाने वाली फ्रांस की कंपनी दासो एविएशन और यूरोप की मिसाइल निर्माता कंपनी एमबीडीए ने 36 रफाल जेट की खरीद से संबंधित सौदे के हिस्से के रूप में भारत को उच्च प्रौद्योगिकी की पेशकश के अपने ऑफसेट दायित्वों को अभी तक पूरा नहीं किया है.

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की बीते बुधवार को जारी एक रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है.

दासो एविएशन रफाल जेट की विनिर्माता कंपनी है, जबकि एमबीडीए ने विमान के लिए मिसाइल प्रणाली की आपूर्ति की है. कैग की संसद में पेश रिपोर्ट में भारत की ऑफसेट नीति के प्रभाव की धुंधली तस्वीर पेश की गई है.

कैग ने कहा कि उसे विदेशी विक्रेताओं द्वारा भारतीय उद्योगों को उच्च प्रौद्योगिकी हस्तांतरित करने का एक भी मामला नहीं मिला है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि रक्षा क्षेत्र प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) पाने वाले 63 क्षेत्रों में से 62वें स्थान पर रहा है.

कैग ने कहा है, ‘36 मध्यम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) से संबंधित ऑफसेट अनुबंध में विक्रेताओं ‘मैसर्स दासो एविएशन और मैसर्स एमबीडीए ने शुरुआत में डीआरडीओ को उच्च प्रौद्योगिकी प्रदान करके अपने ऑफसेट दायित्व के 30 प्रतिशत का निर्वहन करने का प्रस्ताव किया था.’

कैग द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ‘डीआरडीओ लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के लिए इंजन (कावेरी) के स्वदेशी विकास में तकनीकी सहायता प्राप्त करना चाहता है. अब तक विक्रेताओं ने इस तकनीक के हस्तांतरण की पुष्टि नहीं की है.’

हालांकि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, कैग के बयान में 50 प्रतिशत ऑफसेट क्लॉज के किसी भी मूल्यांकन का उल्लेख नहीं किया गया है, जो कि 2019 के आम चुनावों से पहले भारतीय पक्ष की ओर से अनिल अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस की भागीदारी के कारण विवादों के केंद्र में था.

मालूम हो कि पिछले महीने 22 अगस्त को मीडिया रिपोर्टों के हवाले से पता चला था कि कैग ने रफाल विमान के ऑफसेट सौदे की ऑडिटिंग नहीं की है. इसे लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा था, ‘रफाल में भारतीय करदाताओं के पैसे की चोरी की गई.’

ऑडिट से जुड़े लोगों ने कहा था कि रक्षा मंत्रालय ने सीएजी से कहा है कि रफाल की फ्रांसीसी निर्माण कंपनी दासो एविएशन ने कहा है कि केवल तीन साल के बाद ही वह अपने ऑफसेट पार्टनर्स के कॉन्ट्रैक्ट्स की कोई जानकारी साझा करेगी.

पांच रफाल जेट की पहली खेप 29 जुलाई को भारत पहुंच चुकी थी. यह आपूर्ति 36 विमानों की खरीद के तहत 59,000 करोड़ रुपये के सौदे के लिए एक अंतर-सरकारी समझौते पर हस्ताक्षर होने के करीब चार साल बाद प्राप्त हुई.

भारत की ऑफसेट नीति के तहत, विदेशी रक्षा उत्पाद बनाने वाली कंपनियों को कुल खरीद अनुबंध मूल्य का कम से कम 30 प्रतिशत भारत में खर्च करना होता है. वह भारत में कल-पुर्जों की खरीद अथवा शोध व विकास केंद्र स्थापित कर यह खर्च कर सकते हैं.

ऑफसेट मानदंड 300 करोड़ रुपये से अधिक के सभी पूंजीगत आयात सौदे पर लागू होते हैं.

विक्रेता कंपनी इस ऑफसेट दायित्व को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, भारतीय कंपनी को नि:शुल्क प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण कर या फिर भारत में बने उत्पादों को खरीद कर पूरा कर सकती है.

ऑफसेट यानी सौदे की एक निश्चित राशि की भरपाई अथवा समायोजन भारत में ही किया जाएगा. कैग ने कहा कि हालांकि, विक्रेता अपनी ऑफसेट प्रतिबद्धताओं को निभाने में विफल रहे, लेकिन उन्हें दंडित करने का कोई प्रभावी उपाय नहीं है.

कैग ने कहा, ‘यदि विक्रेता द्वारा ऑफसेट दायित्वों को पूरा नहीं किया जाए, विशेष रूप से जब मुख्य खरीद की अनुबंध अवधि समाप्त हो जाती है, तो ऐसे में विक्रेता को सीधा लाभ होता है.’

राष्ट्रीय ऑडिटर ने कहा कि चूंकि ऑफसेट नीति के वांछित परिणाम नहीं मिले हैं, इसलिए रक्षा मंत्रालय को नीति व इसके कार्यान्वयन की समीक्षा करने की आवश्यकता है. मंत्रालय को विदेशी आपूर्तिकर्ताओं के साथ-साथ भारतीय उद्योग को ऑफसेट का लाभ उठाने से रोकने वाली बाधाओं की पहचान करने तथा इन बाधाओं को दूर करने के लिए समाधान खोजने की जरूरत है.

कैग ने कहा कि 2005 से मार्च 2018 तक विदेशी विक्रेताओं के साथ कुल 66,427 करोड़ रुपये के 48 ऑफसेट अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए गए थे.

इनमें से दिसंबर 2018 तक विक्रेताओं द्वारा 19,223 करोड़ रुपये के ऑफसेट दायित्वों का निर्वहन किया जाना चाहिए था, लेकिन उनके द्वारा दी गई राशि केवल 11,396 करोड़ रुपये है, जो कि प्रतिबद्धता का केवल 59 प्रतिशत है.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘इसके अलावा, विक्रेताओं द्वारा प्रस्तुत किए गए इन ऑफसेट दावों में से केवल 48 प्रतिशत (5,457 करोड़ रुपये) ही मंत्रालय के द्वारा स्वीकार किए गए. बाकी को मोटे तौर पर खारिज कर दिया गया क्योंकि वे अनुबंध की शर्तों और रक्षा खरीद प्रक्रिया के अनुरूप नहीं थे.’

कैग ने कहा कि लगभग 55,000 करोड़ रुपये की शेष ऑफसेट प्रतिबद्धताएं 2024 तक पूरी होने वाली हैं.

उसने कहा, ‘विदेशी विक्रेताओं ने लगभग 1,300 करोड़ रुपये प्रति वर्ष की दर से ऑफसेट प्रतिबद्धताओं को पूरा किया है. इस स्थिति को देखते हुए विक्रेताओं के द्वारा अगले छह वर्ष में 55 हजार करोड़ रुपये की प्रतिबद्धता को पूरा कर पाना एक बड़ी चुनौती है.’

मालूम हो कि कांग्रेस रफाल करार में बड़े पैमाने पर अनियमितता के आरोप लगाती रही है. वह विमान निर्माण के लिए दासो एविएशन के ऑफसेट पार्टनर के तौर पर हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) की जगह अनिल अंबानी की अगुवाई वाली रिलायंस डिफेंस के चयन पर भी मोदी सरकार पर हमलावर रही है.

14 दिसंबर, 2018 को अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने रफाल सौदे में जांच की मांग वाली सभी याचिकाएं खारिज कर दी थीं और कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग को भी ठुकरा दिया था

रफाल सौदे की स्वतंत्र जांच की मांग करने वाली अपनी याचिका खारिज होने के बाद पूर्व मंत्री अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा के साथ-साथ वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर कर फैसले की समीक्षा की मांग की थी, जिसे बाद में कोर्ट ने खारिज कर दिया था.

सितंबर 2017 में भारत ने करीब 59,000 करोड़ रुपये की लागत से 36 रफाल लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए फ्रांस के साथ अंतर-सरकारी समझौते पर दस्तखत किए थे.

इससे करीब डेढ़ साल पहले 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पेरिस यात्रा के दौरान इस प्रस्ताव की घोषणा की थी.

26 जनवरी 2016 को जब फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद गणतंत्र दिवस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि भारत आए थे तब इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे.

‘द हिंदू’ अख़बार ने फरवरी, 2019 में दावा किया था कि फ्रांस की सरकार के साथ रफाल समझौते को लेकर रक्षा मंत्रालय के साथ-साथ पीएमओ भी समानांतर बातचीत कर रहा था.

हालांकि चार मई, 2019 को सुप्रीम कोर्ट में एक नया हलफ़नामा दाख़िल कर केंद्र की मोदी सरकार ने दावा किया था कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा सौदे की निगरानी को समानांतर बातचीत या दखल के तौर पर नहीं देखा जा सकता.

 (समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)