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भारत की पहली ऑस्कर पुरस्कार विजेता भानु अथैया का निधन

भानु अथैया ने पांच दशक के अपने लंबे करिअर में 100 से अधिक फिल्मों के लिए बतौर कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर अपना योगदान दिया था. उन्हें गुलज़ार की फिल्म ‘लेकिन’ और आशुतोष गोवारिकर की फिल्म ‘लगान’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिल चुका था.

भानु अथैया. (फोटो साभार: फेसबुक/@ThirdVantagePoint)

भानु अथैया. (फोटो साभार: फेसबुक/@ThirdVantagePoint)

मुंबई: भारत की पहली ऑस्कर पुरस्कार विजेता और कॉस्ट्यूम डिजाइनर भानु अथैया का लंबी बीमारी के बाद मुंबई में बृहस्पतिवार को उनके घर पर निधन हो गया. उनकी बेटी ने यह जानकारी दी.

अथैया 91 वर्ष की थीं. उन्हें ‘गांधी’ फिल्म में अपने बेहतरीन कार्य के लिये 1983 में ऑस्कर पुरस्कार मिला था.

बृहस्पतिवार को उनकी बेटी राधिका गुप्ता ने कहा, ‘आज सुबह उनका निधन हो गया. आठ साल पहले उनके मस्तिष्क में ट्यूमर होने का पता चला था. पिछले तीन साल से वह बिस्तर पर थीं, क्योंकि उनके शरीर के एक हिस्से को लकवा मार गया था.’

उनके पार्थिव शरीर की अंत्येष्टि दक्षिण मुंबई के चंदनवाड़ी शवदाह गृह में की जाएगी.

अथैया का जन्म कोल्हापुर में हुआ था. उन्होंने हिंदी सिनेमा में गुरु दत्त की 1956 की सुपहरहिट फिल्म ‘सीआईडी’ में कॉस्ट्यूम डिजाइनर के रूप में अपने करिअर की शुरुआत की थी.

ब्रिटिश फिल्म निर्देशक रिचर्ड एटेनबॉरो की फिल्म ‘गांधी’ के लिए उन्हें (ब्रिटिश कॉस्ट्यूम डिजाइनर) जॉन मोलो के साथ ‘बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइन’ का ऑस्कर पुरस्कार मिला था.

अथैया ने 2012 में अपना ऑस्कर सुरक्षित रूप से रखे जाने के लिए एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर्स आर्ट्स एंड साइंसेज को लौटा दिया था.

अथैया ने पांच दशक के अपने लंबे करिअर में 100 से अधिक फिल्मों के लिए अपना योगदान दिया. उन्हें गुलजार की फिल्म लेकिन (1990) और आशुतोष गोविरकर की फिल्म लगान (2001) के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था.

1950 के दशक से वह गुरुदत्त, बीआर चोपड़ा, राजकपूर, विजय आनंद, यश चोपड़ा, राज खोसला जैसे फिल्मकारों के साथ काम कर चुकी थीं.

अथैया ने कोनराड रूक की ‘डेयरिंग सिद्धार्थ’ और कृष्णा शाह की ‘शालीमार’ जैसी अंतरराष्ट्रीय फिल्मों के अलावा ‘द क्वाउड डोर’ नाम की एक जर्मन शॉर्ट फिल्म के लिए भी काम किया था.

भानु अथैया का जन्म 28 अप्रैल 1929 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर में हुआ था. उन्होंने कभी किसी फैशन स्कूल में कॉस्ट्यूट डिजाइन की पढ़ाई नहीं की थी.

उन्होंने मुंबई से प्रकाशित होने वाले विभिन्न महिला पत्रिकाओं के लिए फ्रीलांस फैशन इलस्ट्रेटर के तौर पर अपने करिअर की शुरुआत की.

सिनेमा में उन्होंने गुरुदत्त की 1956 में आई फिल्म सीआईडी से बतौर कॉस्ट्यूम डिजाइनर शुरुआत की थी. गुरुदत्त की फिल्म प्यासा (1957), चौदवीं का चांद (1960) और साहिब बीबी और गुलाम के लिए भी उन्होंने काम किया था.

इसके अलावा उन्होंने कागज के फूल (1959), वक्त (1965), गाइड (1965), तीसरी मंजिल (1966), पत्थर के सनम (1967), मेरा नाम जोकर (1970), जॉनी मेरा नाम (1970), अनामिका (1973), सत्यम शिवम सुंदरम (1978), कर्ज (1980), राम तेरी गंगा मैली (1985), चांदनी (1989), 1942: अ लव स्टोरी और स्वदेस (2004) जैसी फिल्मों के लिए काम किया था.

इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ‘मेरे लिए यह (सिनेमा के लिए काम) खुद को अभिव्यक्त करने और मेरी कल्पना को उड़ान देने का एक रास्ता है. यह इतनी संपूर्णता लिए हुए था कि कुछ और करने (अपना बुटीक खोलने) के बारे में मैंने कभी महसूस ही नहीं किया. शीर्ष के कलाकार खुद से मेरे पास आते थे और फिल्म निर्देशकों से मेरी सिफारिश भी कर देते थे. नरगिस को मेरे डिजाइन पसंद थे.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)