60 से अधिक संगठनों, ट्रेड यूनियनों की असम के कार्यकर्ता प्रणब डोले पर लगाए रासुका को हटाने की मांग

देशभर के 60 से अधिक संगठनों ने असम के मूलनिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले पर रासुका लगाए जाने की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि देशभर में एक चिंताजनक प्रवृत्ति उभर रही है, जहां भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, पर्यावरण विरोधी परियोजनाओं और प्राकृतिक संसाधनों पर कॉरपोरेट नियंत्रण का विरोध करने वालों के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं, तथा उन्हें लंबे समय तक जेल में रखा जा रहा है.

आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले. (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: देशभर के जनआंदोलनों, संगठनों, ट्रेड यूनियनों, लोकतांत्रिक अधिकार समूहों और जागरूक नागरिकों के 60 से अधिक संगठनों ने असम के मूलनिवासी अधिकार कार्यकर्ता और ग्रेटर काजीरंगा लैंड एंड ह्यूमन राइट्स प्रोटेक्शन कमेटी के संयोजक प्रणब डोले पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) लगाए जाने की कड़ी निंदा की है. इन संगठनों ने इस कार्रवाई को ‘बदले की भावना से प्रेरित’ बताया है.

यह कदम गोलाघाट सेशन कोर्ट द्वारा उन्हें एक झूठे मामले में ज़मानत दिए जाने के एक दिन बाद उठाया गया; यह मामला असम पुलिस ने कई आदिवासी और मूल निवासी अधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज किया था.

संगठनों द्वारा जारी संयुक्त पत्र में कहा गया है, ‘रासुका लगाने के आदेश में दिए गए आधार खुद यह साबित करते हैं कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से सक्रिय नागरिक और अधिकारों के पैरोकार होने के कारण प्रणब के खिलाफ राज्य ने दुर्भावनापूर्ण और मनमाने ढंग से कार्रवाई की है. यह किसी भी तरह से राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा नहीं है, जैसा कि आरोप लगाया गया है.’

प्रणब डोले को असम पुलिस ने 12 जुलाई को इलाके में धरने के दौरान गिरफ्तार किया था और इस हफ़्ते की शुरुआत में 29 जुलाई को स्थानीय अदालत ने उन्हें ज़मानत दे दी थी. वे असम के गोलाघाट ज़िले के कई मूल निवासी परिवारों के साथ मिलकर काजीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिज़र्व के किनारे बनने वाले एक प्रस्तावित फाइव-स्टार लक्ज़री रिज़ॉर्ट का विरोध कर रहे हैं.

जमानत देते हुए अदालत ने कहा था, ‘ऐसे मामलों में जहां पर्यावरण संरक्षण और मूल निवासियों के अस्तित्व का सवाल एक-दूसरे से जुड़े हों, वहां स्थानीय चिंताओं को दबाने के लिए आपराधिक कानून के सामान्य तरीकों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.’

इस कठोर कानून के तहत असम सरकार डोले को बिना किसी मुकदमे या औपचारिक आरोप के 12 महीने तक हिरासत में रख सकती है. इस कानून के बारे में डोले को 30 जुलाई को एक आधिकारिक ‘सूचना’ के ज़रिए बताया गया था.

अधिकार समूहों ने कहा कि जमानत मिलने के तुरंत बाद एक जमीन अधिकारों के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता पर रासुका लगाया जाना ‘गंभीर संवैधानिक सवाल खड़े करता है.’

उन्होंने कहा, ‘अगर सरकार के पास किसी अपराध के पर्याप्त सबूत हैं, तो उसे वह सबूत अदालत के सामने रखना चाहिए और प्रणब को कानून के तहत गारंटीकृत उनके अधिकारों का पूरा संरक्षण देना चाहिए. जब सामान्य आपराधिक प्रक्रिया किसी कार्यकर्ता को जेल में रखने में विफल हो जाए, तब निवारक हिरासत (प्रिवेंटिव डिटेंशन) सरकारों के लिए वैकल्पिक रास्ता नहीं बन सकता.’

पत्र में आगे कहा गया, ‘यह केवल एक कार्यकर्ता को निशाना बनाने का मामला नहीं है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया की स्वतंत्रता पर भी सीधा प्रहार है. सक्षम अदालत द्वारा दी गई जमानत को केवल इसलिए अर्थहीन नहीं बनाया जा सकता कि कार्यपालिका उस फैसले से असहमत है. यह एक खतरनाक मिसाल कायम करता है, जिसमें सरकार कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर असाधारण और निवारक हिरासत कानूनों के जरिए अदालत के जमानत आदेशों को निष्प्रभावी कर सकती है.’

संगठनों ने कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जमानत के अधिकार के लिए गंभीर खतरा है.

पत्र में साल 2017 का भी उल्लेख किया गया, जब असम सरकार ने किसान नेता और भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता अखिल गोगोई, जो उस समय कृषक मुक्ति संग्राम समिति (केएमएसएस) के नेता थे, पर भी रासुका लगाया था. गोगोई को किसानों के मुद्दों, बांध परियोजनाओं, भ्रष्टाचार और नागरिकता संबंधी आंदोलनों के दौरान गिरफ्तार किया गया था.

बाद में 21 दिसंबर, 2017 को गौहाटी हाईकोर्ट ने उनकी निवारक हिरासत को रद्द कर दिया था और कहा था कि ऐसी हिरासत का आदेश कानूनी रूप से दोषपूर्ण था.

संयुक्त पत्र में कहा गया, ‘तब भी और आज भी, लोगों के सशक्त संघर्षों से जुड़े एक कार्यकर्ता को ऐसे खतरे के तौर पर पेश किया गया जिसके लिए असाधारण प्रिवेंटिव डिटेंशन की ज़रूरत हो. तब भी और अब भी, सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए असाधारण खतरों से निपटने के लिए बने कानून का इस्तेमाल सरकार की नीतियों के खिलाफ़ राजनीतिक असहमति को दबाने के लिए किया.’

संगठनों ने कहा कि पूरे देश में एक चिंताजनक प्रवृत्ति उभर रही है, जिसमें भूमि अधिग्रहण, विस्थापन, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली परियोजनाओं और प्राकृतिक संसाधनों पर कॉरपोरेट नियंत्रण का विरोध करने वालों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज किए जा रहे हैं, उन्हें लंबे समय तक जेल में रखा जा रहा है और असाधारण कानूनों के तहत मुकदमे चलाए जा रहे हैं.

उन्होंने कहा, ‘सरकारों को विकास नीतियों पर असहमति और विरोध को राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती. जमीन, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के अपने अधिकारों की मांग करने वाले आदिवासी और स्वदेशी समुदाय राष्ट्र के दुश्मन नहीं हैं.’

पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले संगठनों ने मांग की है कि प्रणब डोले और आंदोलन में शामिल अन्य समुदाय के सदस्यों पर लगाया गया रासुका तुरंत वापस लिया जाए, साथ ही उनके खिलाफ की गई अन्य सभी दंडात्मक कार्रवाइयों को भी समाप्त किया जाए.

उन्होंने असम में जमीन संघर्षों के सिलसिले में जेल में बंद सभी कार्यकर्ताओं और समुदाय के सदस्यों की तत्काल रिहाई की भी मांग की. इनमें आदित चंद्र राभा भी शामिल हैं, जिन्हें बरदुआर में प्रस्तावित सैटेलाइट टाउनशिप परियोजना का विरोध करने के कारण जेल में रखा गया है. संगठनों ने उनके खिलाफ दर्ज सभी कथित फर्जी और राजनीतिक रूप से प्रेरित मामलों को वापस लेने की भी मांग की.

इसके अलावा, संगठनों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ निवारक हिरासत और अन्य असाधारण कानूनों के इस्तेमाल पर रोक लगाने, पुलिस की कथित ज्यादतियों की स्वतंत्र जांच कराने, काजीरंगा परियोजना के लिए किए गए भूमि आवंटन का पूरा खुलासा और पारदर्शी समीक्षा कराने और असम के आदिवासी, स्वदेशी, किसान और जंगल में रहने वाले समुदायों को विस्थापन से बचाने के लिए अधिक मजबूत कानूनी सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने की मांग की है.