नॉर्थ ईस्ट

नगा समूह का आरोप- गृह मंत्रालय असम राइफल्स को उनके ख़िलाफ़ अभियान तेज़ करने का निर्देश दे रहा

उत्तर-पूर्व के सभी उग्रवादी संगठनों के अगुवा एनएससीएन-आईएम ने एक बयान जारी कर कहा कि भारत सरकार को बड़ी संवेदनशीलता के साथ स्थिति को संभालना चाहिए और भारतीय सुरक्षा बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों को एनएससीएन के ख़िलाफ़ अभियान चलाने के लिए नहीं उकसाना चाहिए. हमारे धैर्य को हमारी कमज़ोरी या लाचारी नहीं समझना चाहिए.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: मंगलवार को एक बयान जारी कर नगा समूह एनएससीएन-आईएम ने आरोप लगाया है कि गृह मंत्रालय असम राइफल्स को एनएससीएन-आईएम के खिलाफ ऑपरेशन के लिए निर्देश जारी कर रहा है. उसका दावा है कि ये निर्देश भारत सरकार और नगा विद्रोही समूह के बीच हुए युद्धविराम के उल्लंघन के हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एनएससीएन-आईएम ने बयान में कहा, ‘जब युद्ध विराम के अधिकार क्षेत्र की बात आती है तो भारत सरकार 23 से अधिक वर्षों की वार्ता के बाद भी अस्पष्ट शब्दों में बात करना जारी रखा है. स्वाभाविक रूप से यह संघर्ष का चरम बिंदु बन गया है कि भारत सरकार केवल पीछे हट रही है.’

संगठन की ओर से जारी बयान में कहा गया है, ‘गृह मंत्रालय द्वारा एनएससीएन-आईएम के खिलाफ ऑपरेशन तेज करने के लिए असम राइफल्स को निर्देश जारी करना चौंकाने वाला है.’

यह कहते हुए कि केंद्र द्वारा नगा राजनीतिक मुद्दे को कम आंका जा रहा है एनएससीएन-आईएम ने कहा कि भारत सरकार 70 साल लंबे भारत-नगा राजनीतिक विवाद का स्थायी समाधान खोजने के अपने रवैये के प्रति उदासीन रही है.

युद्ध विराम के समझौते को तोड़ने की धमकी माने जा रहे बयान में एनएससीएन-आईएम ने कहा, ‘फ्रेमवर्क समझौता भारत के लिए हमारी शांति शाखा और अच्छे पड़ोसियों के रूप में शांति से सह-अस्तित्व की हमारी इच्छा का प्रतीक है. हालांकि, इसका सही राजनीतिक कदमों के साथ जवाब नहीं दिया गया है.’

बयान के अनुसार, भारत सरकार को बड़ी संवेदनशीलता के साथ स्थिति को संभालना चाहिए और भारतीय सुरक्षा बलों और अन्य सुरक्षा एजेंसियों को एनएससीएन के खिलाफ अभियान चलाने के लिए नहीं उकसाना चाहिए. ऐसी स्थिति में एनएससीएन-आईएम सदस्य खुद को शिकार बनने की अनुमति नहीं दे सकते. हमारे धैर्य को हमारी कमजोरी या लाचारी नहीं समझना चाहिए. इसके नतीजे दोनों पक्षों के लिए हानिकारक होंगे. यह नगा इलाके में संघर्षविराम के हितों में नहीं होगा.’

गौरतलब है कि उत्तर पूर्व के सभी उग्रवादी संगठनों का अगुवा माने जाने वाला एनएससीएन-आईएम अनाधिकारिक तौर पर सरकार से साल 1994 से शांति प्रक्रिया को लेकर बात कर रहा है.

सरकार और संगठन के बीच औपचारिक वार्ता साल 1997 से शुरू हुई. नई दिल्ली और नगालैंड में बातचीत शुरू होने से पहले दुनिया के अलग-अलग देशों में दोनों के बीच बैठकें हुई थीं.

18 साल चली 80 दौर की बातचीत के बाद अगस्त 2015 में भारत सरकार ने एनएससीएन-आईएम के साथ अंतिम समाधान की तलाश के लिए रूपरेखा समझौते (फ्रेमवर्क एग्रीमेंट) पर हस्ताक्षर किए गए.

एनएससीएन-आईएम के महासचिव थुलिंगलेंग मुइवाह और वार्ताकार आरएन रवि ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में तीन अगस्त, 2015 को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे.

तीन साल पहले केंद्र ने एक समझौते (डीड ऑफ कमिटमेंट) पर हस्ताक्षर कर आधिकारिक रूप से छह एनएनपीजी (नगा नेशनल पोलिटिकल ग्रुप्स) के साथ बातचीत का दायरा बढ़ाया था.

अक्टूबर 2019 में आधिकारिक तौर पर इन समूहों के साथ हो रही शांति वार्ता खत्म हो चुकी है, लेकिन नगालैंड के दशकों पुराने सियासी संकट के लिए हुए अंतिम समझौते का होना अभी बाकी है.

बता दें कि बीते अगस्त में एनएससीएन-आईएम नेतृत्व दिल्ली पहुंचा था और उनकी आधिकारिक स्तर की वार्ता हुई थी. इस बीच उनकी ओर से अपने अलग झंडे, संविधान और ग्रेटर नगालिम की मांगें दोहराई गई थीं.

उसी दौरान 14 अगस्त को संगठन प्रमुख टी. मुईवाह ने कहा कि अलग झंडे, संविधान और ग्रेटर नगालिम के बिना कोई समाधान नहीं निकल सकता.

मुईवाह  का कहना था, ‘सात दशकों पुराने हिंसक आंदोलन का सम्मानजनक समाधान बिना झंडे और संविधान के मुमकिन नहीं है. नगा लोग भारत के साथ संप्रभु अधिकारों को साझा करते हुए सह-अस्तित्व में रहेंगे, जैसा कि फ्रेमवर्क एग्रीमेंट में स्वीकृत और परिभाषित किया गया, लेकिन वो भारत के साथ विलय नहीं करेंगे.’

2015 में केंद्र सरकार के साथ हुए समझौता मसौदे के बाद यह पहली बार था जब मुईवाह ने कहा था कि अलग झंडे और संविधान को लेकर वे कोई समझौता नहीं करेंगे.

साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि एग्रीमेंट में सभी नगा इलाकों को एक साथ लाकर ‘ग्रेटर नगालिम’ बनाने की बात भी हुई है. मालूम हो कि ग्रेटर नगालिम में असम, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के भी क्षेत्र आते हैं. इन राज्यों में इस प्रस्ताव का भारी विरोध होता रहा है.

बताया गया है कि केंद्र सरकार पहले ही संगठन की इन मांगों पर असहमति जता चुकी है, ऐसे में इस पूरी शांति प्रक्रिया के बेपटरी होने के आसार बनते दिख रहे हैं.

इससे पहले पिछले साल अक्टूबर में जब शांति वार्ता आधिकारिक तौर पर पूरी हुई थी, तब केंद्र की ओर से वार्ताकार आरएन रवि ने एनएससीएन-आईएम की अलग झंडे और संविधान की मांग को भी खारिज कर दिया था.

हालांकि, अन्य नगा समूह एनएनपीजी ने पिछले साल भारत सरकार के साथ व्यावहारिक समाधान को लेकर अपनी इन मांगों को छोड़ दिया था. इसके बाद से ही एनएससीएन-आईएम पर आरोप लग रहा है कि वह समाधान में दखलअंदाजी कर रहा है.