भारत

शारीरिक तौर पर अक्षम महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा पर आंकड़ों को अलग रखा जाएः अधिकार कार्यकर्ता

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को 90 से अधिक लोगों, अधिकार कार्यकर्ताओं और संगठनों ने पत्र लिख कर कहा कि शारीरिक तौर पर अक्षम लड़कियों और महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाओं के काफी संख्या में दर्ज मामले होने के बावजूद  एनसीआरबी इस तरह की हिंसा पर अलग से आंकड़े नहीं रखता है.

(इलस्ट्रेशन: एलिज़ा बख़्त)

(इलस्ट्रेशन: एलिज़ा बख़्त)

नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को 90 से अधिक लोगों, कार्यकर्ताओं और संगठनों ने पत्र लिख कर यह सुनिश्चित करने का अनुरोध किया है कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) शारीरिक तौर पर अक्षम लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ हिंसा पर अलग से आंकड़े रखे.

शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों के लिए राष्ट्रीय मंच, दृष्टिहीन के लिए राष्ट्रीय संघ और बधिर के लिए अखिल भारतीय महासंघ सहित अधिकार समूहों एवं कार्यकर्ताओं ने कहा कि शारीरिक तौर पर अक्षम लड़कियों और महिलाओं के यौन उत्पीड़न के काफी संख्या में दर्ज मामले होने के बावजूद, एनसीआरबी इस तरह की हिंसा पर अलग से आंकड़े नहीं रखता है.

उन्होंने शाह को लिखे एक पत्र में कहा, ‘हम आपसे अनुरोध करते हैं कि आप यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश जारी करें कि एनसीआरबी अलग से आंकड़े रखे.’

उन्होंने कहा कि एनसीआरबी ने दिसंबर 2020 में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत दायर एक आवेदन के जवाब में यह कहकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की कि ‘पुलिस राज्य सूची का विषय है, जो संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत आता है.’

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक कार्यकर्ता शम्पा सेनगुप्ता आरटीआई के तहत याचिका दायर कर जानकारी मांगी थी. इसके जवाब में दिसंबर में एनसीआरबी कहा है कि आवासहीन, शारीरिक तौर पर अक्षम लड़कियों और महिलाओं से बलात्कार या अन्य प्रकार के यौन उत्पीड़न की घटनाओं की जानकारी राज्यों द्वारा अलग से नहीं मिली है.

एऩसीआरबी ने आवेदक को यह भी बताया कि भारतीय संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत यह मामला राज्य पुलिस का विषय है. इसलिए आपको संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश से सीधे जानकारी प्राप्त करने की सलाह दी जाती है.

इस पर सेनगुप्ता ने कहा, ‘इस कारण तो एनसीआरबी को ज्यादातर अपराधों के आंकड़ों को एकत्र कर व्यवस्थित नहीं करना चाहिए, क्योंकि कानून व्यवस्था राज्य सूची का विषय है.’

शारीरिक तौर पर अक्षम लोगों की आवाज उठाने वाले अधिकार समूहों एवं कार्यकर्ताओं ने कहा कि यह मुद्दा कहीं अधिक तात्कालिक महत्व का हो गया है, क्योंकि देश में ऐसी लड़कियों और महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं.

उन्होंने कहा, ‘महामारी के दौरान भी इसमें कमी नहीं आई. इसके उलट हमने पाया कि पीड़िता का उत्पीड़न बढ़ा और उनकी संख्या भी बढ़ी.’

द हिंदू के मुताबिक,  उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को उन्होंने सरकार के अलावा महिला एवं बाल विकास, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के सामने भी उठाया था, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

समूह ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन ऑफ पीडब्लूडी के अधिकारों के कार्यान्वयन की निगरानी करने वाली संयुक्त राष्ट्र की समिति ने सितंबर 2019 में सरकार से सिफारिश की थी कि वह सुनिश्चित करे कि एनसीआरबी लिंग, आयु, निवास स्थान, शारीरिक तौर पर अक्षम महिलाओं, लड़कियों की हिंसा और शोषण, अपराध का डेटा अलग-अलग एकत्र करे.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी हाल ही में सिफारिश की थी कि एनसीआरबी को पीडब्ल्यूडी पर डेटा रखना चाहिए.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)