नॉर्थ ईस्ट

असम समझौते के खंड छह संबंधी सिफ़ारिशें वास्तविकता से परे, लागू नहीं कर सकते: हिमंता बिस्वा शर्मा

सर्बानंद सोनोवाल की अगुवाई वाली राज्य सरकार ने असम में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों को शांत करने के लिए दिसंबर 2019 में खंड 6 के त्वरित कार्यान्वयन का वादा किया था. इसके बाद फरवरी 2020 में केंद्र द्वारा नियुक्त पैनल ने अपनी सिफ़ारिशें केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी थीं.

असम के वरिष्ठ मंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा (फोटो: पीटीआई)

असम के वरिष्ठ मंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा (फोटो: पीटीआई)

गुवाहाटी: असम के वरिष्ठ मंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा ने बुधवार को कहा कि सरकार असम समझौते के खंड-छह के बारे में केंद्रीय समिति की सिफारिशों को लागू नहीं कर सकती क्योंकि वे कानूनी वास्तविकता से परे हैं.

सरकार की ओर से इस समिति की रिपोर्ट पर पहली बार कुछ कहा गया है. इस रिपोर्ट को पिछले साल 25 फरवरी को असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के समक्ष पेश किया जाना था.

राजग की क्षेत्रीय शाखा पूर्वोत्तर लोकतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए) के संयोजक शर्मा ने कहा, ‘समिति द्वारा दी गई सिफारिशें वास्तविकता से दूर हैं. हम उन्हें कैसे लागू कर सकते हैं?’

उन्होंने अपनी पुस्तक ‘एटा सपोनार पोम खेड़ी (किसी सपने का पीछा करना)’ के लोकार्पण के मौके पर कहा कि सिफारिशें उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों के विरुद्ध हैं.

उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ने आदेश दिया था कि आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता, लेकिन पैनल की रिपोर्ट में इससे अधिक का सुझाव दिया गया है.

भाजपा नेता ने कहा, ‘समिति ने उच्चतम न्यायालय के फैसलों पर विचार क्यों नहीं किया? मुझे लगता है कि वे सिफारिशें नहीं थीं, बल्कि उनकी (पैनल की) उम्मीदें भी हैं.’

असम के राज्यपाल जगदीश मुखी ने 11 फरवरी को विधानसभा में कहा था कि राज्य अभी तक केंद्रीय गृह मंत्रालय की जस्टिस विप्लब कुमार शर्मा के नेतृत्व वाली उच्चस्तरीय समिति (एचएलसी) द्वारा तैयार की गई खंड-छह रिपोर्ट की जांच कर रहा है और इसे विचार के लिए केंद्र सरकार के पास नहीं भेजा गया है.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, सर्बानंद सोनोवाल की अगुवाई वाली राज्य सरकार ने असम में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को शांत करने के लिए दिसंबर 2019 में खंड 6 के त्वरित कार्यान्वयन का वादा किया था.

हालांकि, फरवरी 2020 में केंद्र द्वारा नियुक्त पैनल ने अपनी सिफारिशें केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेज दी थीं, इसलिए सरकार इस मामले पर चुप रही.

मालूम हो कि 1985 में हुए असम समझौते के अनुच्छेद छह में कहा गया है कि असमिया समाज के लोगों की संस्कृति, सामाजिक, भाषाई पहचान और विरासत की रक्षा, संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए संवैधानिक, विधायी और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय, जो भी उपयुक्त हों किए जाएंगे.

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जनवरी 2019 में सेवानिवृत्त केंद्रीय सचिव एमपी बेजबरुआ की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था, लेकिन नौ सदस्यों में से छह ने इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था.

उसके बाद 16 जुलाई, 2019 को समिति का पुनर्गठन किया गया, जिसमें जस्टिस (सेवानिवृत्त) बीके शर्मा अध्यक्ष बनाए गए और 14 अन्य सदस्य रखे गए.

फरवरी 2019 में 14 सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी थी. इस पर कोई अमल न होने का आरोप लगाते हुए अगस्त 2020 में ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) के तीन और समिति के एक अन्य सदस्य अरुणाचल प्रदेश के महाधिवक्ता निलय दत्ता ने इसकी रिपोर्ट को मीडिया में लीक कर दी थी.

नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के बारे में बात करते हुए, शर्मा ने कहा कि जब कानून के नियम बनाए जाएंगे तो हिंदू प्रवासियों को दिए गए फायदे और असमिया लोगों के हितों के बीच संतुलन बनाया जाएगा.

उन्होंने कहा, ‘मेरा काम हिंदुओं और असमियों के बीच संतुलन बनाना है. मैं एक हिंदू के रूप में गर्व महसूस करता हूं. यदि आप एक हिंदू हैं, तो हम उन सभी को समायोजित करेंगे जो कोई खतरा नहीं है.’

उन्होंने कहा कि अन्य धर्मों में विश्वास करने वाले लोग भी हिंदू हो सकते हैं यदि वे भारत को अपनी मातृभूमि मानते हैं.

उन्होंने कहा, ‘मैं दुनिया के किसी भी हिंदू को मुझसे अलग नहीं देखता. मेरी परिभाषा सांस्कृतिक है और इसके लिए आप मुझे सांप्रदायिक या अराजक कह सकते हैं.’

भाजपा नेता ने कहा कि भारत 1947 में नहीं बना था, बल्कि इसे 6,000 साल पहले बनाया गया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)