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प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत लगातार 142वें स्थान पर, पत्रकारों के लिए बेहद ख़तरनाक देश बताया

रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स की ओर से जारी विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 180 देशों में 142वें स्थान पर है. रिपोर्ट में देश में कम होती प्रेस की आज़ादी के लिए भाजपा समर्थकों को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहा गया है कि पार्टी समर्थकों ने पत्रकारों को डराने-धमकाने का माहौल बनाया है. साथ ही पत्रकारों की ख़बरों को ‘राष्ट्र विरोधी’ क़रार दिया है.

(फोटो: द वायर)

(फोटो: द वायर)

नई दिल्लीः मीडिया की आजादी से संबंधित ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ की सालाना रिपोर्ट में प्रेस की आजादी के मामले में भारत 180 देशों में लगातार 142वें स्थान पर है.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके अलावा भारत लगातार पत्रकारिता के लिए सबसे खराब देशों में शामिल है.

मंगलवार को जारी वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2021 यानी ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2021’ की सूची में नॉर्वे शीर्ष पर है. इसके बाद फिनलैंड और डेनमार्क है जबकि एरिट्रिया इस सूची में सबसे निचले पायदान पर है.

सूची में चीन का 177वां स्थान है. तुर्कमेनिस्तान 178वें और उत्तर कोरिया 179वें स्थान पर है.

बता दें कि भारत पिछले साल भी सूची में 142वें स्थान पर ही था जबकि 2016 में भारत का स्थान 133 था. सूची में नेपाल 106वें, श्रीलंका 127वें, म्यांमार 140वें, पाकिस्तान 145वें और बांग्लादेश 152वें स्थान पर है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्राजील, मेक्सिको और रूस के साथ भारत पत्रकारिता के लिए सबसे खराब देश है.

रिपोर्ट में भारत में कम होती प्रेस की स्वतंत्रता के लिए भाजपा समर्थकों को जिम्मेदार ठहराया गया है. इसमें कहा गया है कि भाजपा समर्थकों ने पत्रकारों को डराने-धमकाने का माहौल बनाया है. उन्होंने पत्रकारों की खबरों को ‘राज्य विरोधी’ और ‘राष्ट्र विरोधी’ करार दिया है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीडिया पर अपनी पकड़ और मजबूत कर ली है. 2020 में अपने काम को लेकर चार पत्रकारों की हत्या की गई है, ऐसे में भारत अपना काम ठीक से करने वाले पत्रकारों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक है.

रिपोर्ट कहती है, ‘इसी तरह देश में कवरेज के दौरान पत्रकारों को पुलिस हिंसा, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और अपराधियों के गैंग के हमलों का सामना करना पड़ा है. इसी तरह भ्रष्ट अधिकारियों द्वारा पत्रकारों को कई बार अपमानित भी किया गया है.’

रिपोर्ट में कहा गया कि साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा पार्टी के आम चुनाव जीतने के बाद से मीडिया पर हिंदू राष्ट्रवादी सरकार के अऩुरूप काम करने का दबाव बनाया गया है.

रिपोर्ट कहती है, ‘हिंदुत्व की विचारधारा का समर्थन करने वाले भारतीय सार्वजनिक बहस को राष्ट्रविरोधी विचार साबित करने पर जुटे हैं. भारत में हिंदुत्व का समर्थन करने वालों के खिलाफ लिखने वाले या बोलने वाले पत्रकारों को निशाना बनाया जाता है, उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर नफरता भरा अभियान चलाया जाता है. पत्रकारों के खिलाफ हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया जाता है, विशेष रूप से जब निशाना महिला हो.’

रिपोर्ट कहती है कि सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को चुप कराने के लिए उन पर राजद्रोह जैसे मुकदमे चलाए जाते हैं.

रिपोर्ट में कहा गया, ‘भारत सरकार ने किस प्रकार देश में कोरोना महामारी का लाभ उठाकर प्रेस की स्वतंत्रता को कुचलने का काम किया. कश्मीर में स्थिति अभी भी चिंताजनक है. वहां पर पत्रकारों को अभी भी पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों द्वारा प्रताड़ित किया जा रहा है. वहां ऑरवेलियन कंटेट रेगुलेशन का सामना किया जा रहा है, जो मीडिया आउटलेट के बंद होने के लिए जिम्मेदार है, जैसा कि कश्मीर टाइम्स के साथ हुआ.’

रिपोर्ट कहती है, ‘सरकार समर्थित मीडिया ने दुष्प्रचार शुरू किया है. ऐसे पत्रकार जो सरकार की आलोचना करने की हिम्मत रखते हैं, उन्हें भाजपा के समर्थकों द्वारा राष्ट्रविरोधी या यहां तक कि आतंकवादी समर्थक तक कहा जा रहा है.’

रिपोर्ट में भाजपा और हिंदुत्व समर्थकों द्वारा शुरू किए गए अत्यंत हिंसक सोशल मीडिया अभियानों पर भी रोशनी डाली गई है, जिसमें सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों की सार्वजनिक आलोचना का आह्वान किया जाता है और महिला पत्रकारों के मामले में जान से मारने तक की धमकियां तक दी जाती हैं.

रिपोर्ट में भारत में सोशल मीडिया पर स्वतंत्रता की आजादी का गला घोंटने और ट्विटर एल्गोरिदम की मनमानी प्रकृति का उल्लेख किया गया है.

यह भी उल्लेख किया गया है कि द कश्मीरवाला मैगजीन को लेकर ट्रोल्स की शिकायतों के बाद ट्विटर ने अचानक ही बिना किसी अपील के उसका एकाउंट सस्पेंड कर दिया था.

2021 की रिपोर्ट से पता चलता है कि इन 180 देशों के 73 फीसदी भागों में पत्रकारिता पूरी तरह से या आंशिक रूप से अवरुद्ध है. सिर्फ इन 180 देशों में से 12 फीसदी में ही पत्रकारिता के अनुकूल माहौल है.