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असमः 70 सालों से बुनियादी सुविधाओं से महरूम ज़िंदगी जीने को मजबूर है बेघर मिसिंग समुदाय

असम के डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान के अंदर दो गांवों में बसे राज्य के दूसरे सबसे बड़े जातीय समुदाय मिसिंग के क़रीब बारह हज़ार लोग लगभग सत्तर बरसों से बिजली-पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में पुनर्वास की उम्मीद लिए जी रहे हैं. राज्य में सरकारें बदलती रहीं, लेकिन इस समुदाय की दशा अब भी वैसी ही है.

असम के मिसिंग समुदाय की महिलाएं (फोटोः विकीमीडिया कॉमन्स)

असम के मिसिंग समुदाय की महिलाएं. (फोटोः विकीमीडिया कॉमन्स)

डिब्रूगढ़ः असम के डिब्रू-सैखोवा नेशनल पार्क के अंदर स्थित लाइका और दधिया गांवों में रहने वाले मिसिंग समुदाय के करीब 12 हजार लोग अब भी बिजली, पेयजल और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं. ये लोग 70 साल से बेघर हैं.

इन लोगों का कहना है कि सरकारी तंत्र की उदासीनता के कारण उन्हें यह पीड़ा झेलनी पड़ रही है.

उम्र के चौथे दशक को पार कर चुके लाइका गांव के अरण्य कसारी का कहना है कि स्कूल तक पहुंचने के लिए उनके बच्चों को पहाड़ों पर मीलों चलना पड़ता है और एक नदी भी पार करनी पड़ती है.

उनका कहना है कि यहां न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधा या पेयजल की आपूर्ति का भी कोई साधन नहीं है.

दधिया गांव के रहने वाले प्रांजल कसारी ने कहा, ‘हम यहां से निकलना चाहते हैं, जितनी जल्दी हो सके उतना बेहतर. हम यहां पीढ़ियों से रह रहे हैं. मैं नहीं चाहता कि आने वाली पीढ़ियां भी उन्हीं मुश्किलों का सामना करें. क्या आप मूलभूत सुविधाओं के बिना जिंदगी की कल्पना कर सकते हैं? पार्क के अंदर बिजली या गाड़ी चलने लायक सड़क तो सोच से परे है. हमारे मौलिक मानवाधिकार तक नहीं हैं. हम दुनिया के दूसरे हिस्सों से अलग-थलग हैं. यहां कोई टीवी नहीं है और हमें बमुश्किल अखबार पढ़ने को मिलता है.’

असम के दूसरे सबसे बड़े जातीय समुदाय मिसिंग के लोगों की यह दशा साल 1950 से बनी हुई है, जब एक भीषण भूकंप के बाद ब्रह्मपुत्र नदी ने मार्ग बदल लिया था और अरुणाचल प्रदेश सीमा से लगे मुरकोंगसेलेक के 75 घरों को बेघर कर दिया था.

यह घटना दोबारा 1957 में तब घटित हुई, जब नदी के कटाव के कारण डिब्रूगढ़ जिले के रहमारिया राजस्व क्षेत्र के ओकलैंड इलाके के 90 घरों में रहने वाले लोग बेघर हो गए और वहां से निकलकर डिब्रू आरक्षित वन में शरण लेने के लिए मजबूर हुए.

ये विस्थापित कृषक लोग जो नदी किनारे रहना पसंद करते थे, उन्हें ब्रह्मपुत्र का दक्षिणी किनारा पार करना पड़ा और वे इस इलाके में आ गए जो छह नदियों- उत्तर की तरफ लोहित, दिबांग, दिसांग तथा दक्षिण की तरफ अनंतनाला, दनगोरी और डिब्रू- से घिरा है.

खेती और मछली पकड़ने पर निर्भर यह कृषक समुदाय बाढ़ के कारण होने वाले क्षरण की वजह से आजीविका के लिए वन में भटकने लगा. समय बीतने के साथ 1950 के दशक के दो मूल गांव लाइका और दधिया अब 6 बस्तियों में फैल गए हैं, जहां 2,600 परिवारों में करीब 12,000 लोग रहते हैं.

हालांकि समस्या 1999 में शुरू हुई जब जंगल को डिब्रू-सैखोवा नेशनल पार्क घोषित कर दिया गया और संरक्षित इलाके के अंदर इंसानों का रहना अवैध हो गया. तभी से असम गण परिषद (एजीपी), कांग्रेस और भाजपा इस पूर्वोत्तर राज्य पर शासन कर चुके हैं, लेकिन इनके पुनर्वास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया.

लाइका गांव के सेवली पेगु का कहना है कि मानसून के दौरान गांव महीनों तक पानी से घिरे रहते हैं. उन्होंने बताया, ‘इलाके में बाढ़ आने पर इंसान और सुअर एक ही जगह शरण लेने को मजबूर होते हैं.’

लाइका-दधिया पुनर्वास मांग समिति के मुख्य संयोजक मिंतुराज मोरंग ने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं से मजबूर ग्रामीणों ने कई बार अन्य जगहों पर बसने की कोशिश की, लेकिन सरकार के उचित पुनर्वास के आश्वासन की वजह से उन्हें लौटना पड़ा.

उन्होंने कहा, ‘जुलाई 2017 में बाढ़ के चरम पर होने के दौरान लगभग 1,200 लोग तिनसुकिया में तारानी रिजर्व फॉरेस्ट पहुंचे और एक स्कूल के बगल में डेरा डाल लिया. लगभग 700 लोगों ने घर बनाने के लिए जंगल में प्रवेश किया, लेकिन तत्कालीन वन मंत्री प्रमिला रानी ब्रह्मा द्वारा हमारे पुनर्वास के लिए उपयुक्त भूमि खोजने के लिए सहमत होने के साथ यह समाप्त हो गया.’

मोरंग ने कहा, ‘2020 में एक और प्रयास किया गया था जब तिनसुकिया जिला प्रशासन ने मिसिंग लोगों को बसाने के लिए लखीपाथर क्षेत्र के औगुरी में 320 हेक्टेयर की पहचान की थी, लेकिन बाद में ऑल मोरन स्टूडेंट्स यूनियन (एएमएसयू) के नेतृत्व में स्थानीय मोरन समुदाय के विरोध के बाद इसे वापस ले लिया गया था.’

सत्ताधारी गठबंधन के सहयोगी दल एजीपी के विधायक पोनाकन बरुआ ने 24 मई को मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा शर्मा को पत्र लिखकर इस समुदाय की पीड़ा साझा करते हुए जिक्र किया था कि पूर्व में चार बार इन लोगों के पुनर्वास का प्रयास किया जा चुका है लेकिन अब तक कोई नतीजा नहीं निकला.

उन्होंने यह भी कहा कि लगभग 600 परिवार महीनों से अलग-अलग शिविरों में रह रहे हैं लेकिन उनके पुनर्वास के लिए कोई कदम नहीं उठाए गए.

बरुआ ने कहा, ‘सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व वाली सरकार के आखिरी पड़ाव के दौरान दधिया गांव के 908 परिवारों को लखीमपुर में हारमोटी वन रेंज के अधकोना में स्थानांतरित करने का प्रस्ताव दिया गया था, लेकिन ग्रामीणों ने यह कहते हुए इसे अस्वीकार कर दिया था कि भूमि काफी निचले इलाके में हैं, जहां साल में आठ से दस महीने तक बाढ़ का खतरा रहेगा.’

बरुआ ने कहा, ‘इसके बजाय उन्होंने कहा कि वे नम्फई जंगल या उसी ओगुरी क्षेत्र के तहत टिंकुपानी क्षेत्र में लाइका गांव के लोगों के साथ जाने के लिए तैयार हैं.’

विधायक ने जातीय समुदाय के लोगों के समुचित पुनर्वास के साथ 70 साल पुरानी समस्या का तत्काल समाधान करने की मांग की.

बरुआ ने कहा कि पिछली भाजपा सरकार ने पुनर्वास के लिए 10 करोड़ रुपये निर्धारित किए थे लेकिन उचित खाली जमीन न होने के कारण उन्हें स्थानांतरित नहीं किया जा सका.

इस साल जनवरी में विपक्ष के नेता देवब्रत सैकिया ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का रुख कर शिकायत की थी कि राज्य सरकार द्वारा कथित तौर पर जातीय समुदाय के कई सदस्यों के साथ उनके भूमि अधिकारों और बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन कर उनके साथ गंभीर अन्याय किया जा रहा है.

पिछले साल पूर्व मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने प्रशासन को निर्देश दिया था कि वे दधिया गांव के लोगों का लखीमपुर में और लाइका गांव के लोगों का तिनसुकिया जिलों में पुर्नवास करें. पुनर्वास प्रस्ताव को तत्काल सैद्धांतिक मंजूरी के लिए आठ जनवरी को सरकार को भेजा गया था.

सामाजिक कार्यकर्ता ज्योतिष पाटीर को हैरानी है कि आखिर कैसे 1950 से वहां रहने वाले लोगों के भविष्य को ध्यान में रखे बिना 1999 में राष्ट्रीय उद्यान को अधिसूचित किया गया. उन्होंने कहा, ‘फैसला लेने से पहले हमारी राय नहीं ली गई.’

मालूम हो कि कोई रास्ता नहीं निकलता देख ग्रामीण वर्षों से विरोध करने को मजबूर हैं. 2,000 से अधिक लोग तिनसुकिया में शरण ले रहे हैं और अपनी मांगों को लेकर पिछले साल 21 दिसंबर से लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)