नॉर्थ ईस्ट

नॉर्थ ईस्ट डायरीः पूर्व उग्रवादी की फ़र्ज़ी मुठभेड़ का दावा, मेघालय पुलिस के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज

इस हफ्ते नॉर्थ ईस्ट डायरी में मेघालय, असम, मिज़ोरम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश के प्रमुख समाचार.

मेघालय के गृह मंत्री लखमेन रिम्बुई, मणिपुर का शाही महल और केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू. (फोटोः द वायर/ट्विटर)

शिलॉन्ग/नई दिल्ली/गुवाहाटी/ईटानगर: मेघालय के प्रतिबंधित सशस्त्र संगठन हाइनीवट्रेप नेशनल लिबरेशन काउंसिल (एचएनएलसी) के पूर्व महासचिव चेरिस्टरफील्ड थांगखियु के परिवार ने 13 अगस्त को उनके घर पर हुई कथित फर्जी मुठभेड़ में चेरिस्टरफील्ड की हत्या में शामिल पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए एफआईआर दर्ज कराई है.

द शिलॉन्ग टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, परिवार ने 17 अगस्त को पूर्वी खासी हिल्स जिले में शिकायत दर्ज कराई थी और पुलिस की छापेमारी को फर्जी मुठभेड़ करार दिया था.

स्थानीय मीडिया के मुताबिक, चेरिस्टरफील्ड के छोटे भाई ग्रैनरी स्टारफील्ड थांगखियु ने 20 अगस्त को कहा कि परिवार ने पूर्वी खासी हिल्स के पुलिस अधीक्षक के समक्ष एफआईआर दर्ज कराई थी और इस एफआईआर में क्या लिखा गया था इसे सही समय पर ही उजागर किया जाएगा.

बता दें कि 13 अगस्त तड़के राज्य पुलिस द्वारा चेरिस्टरफील्ड के एनकाउंटर की खबर के बाद शिलॉन्ग में व्यापक स्तर पर अशांति देखी गई, वहां कर्फ्यू लगा दिया गया और इंटरनेट सेवाओं को बंद कर दिया गया. राज्य के गृहमंत्री लहकमन रिम्बुई ने 15 अगस्त को पद से इस्तीफा देते हुए मामले की न्यायिक जांच की मांग की.

राज्य सरकार ने राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस (सेवानिवृत्त) टी. वाइपे की अध्यक्षता में जांच समिति का गठन किया.

मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने कहा कि चेरिस्टरफील्ड की हत्या से जुड़े घटनाक्रमों की सच्चाई का पता रिपोर्ट मिलने के बाद ही पता लग सकेगा.

राज्य पुलिस ने जारी बयान में कहा कि पुलिस ने आत्मरक्षा में चेरिस्टरफील्ड पर गोली चलाई क्योंकि उसने (चेरिस्टरफील्ड ) पुलिस पर चाकू से हमला किया था.

पुलिस के मुताबिक,’ वह राज्य में दो कम तीव्रता के विस्फोटों में शामिल थे.’

पीड़ित परिवार की ओर से एफआईआर दर्ज कराना समाज के एक वर्ग की बढ़ती मांग के अनुरूप है, जो इस छापेमारी की अगुवाई करने वाले दो पुलिस अधिकारियों के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं.

स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, शिलॉन्ग के मवलाई क्षेत्र के युवा और सामाजिक संगठनों के प्रमुखों की संस्था- का सुर यू पेडबाह मवलाई ने 18 अगस्त को राज्य सरकार को फर्जी मुठभेड़ में शामिल दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पूर्वी जैंतिया हिल्स जिला के एसपी और पूर्वी खासी हिल्स जिला के एसपी (ट्रैफिक) को निलंबित करने के लिए एक हफ्ते की समयसीमा दी थी.

एक अन्य नागरिक समाज संगठन सेंग सामला मवलाई पाइलुन ने कैबिनेट मंत्रियो के साथ मुख्यमंत्री से मुलाकात की और फर्जी मुठभेड़ में शामिल पुलिस अधिकारियों को निलंबित करने की मांग की.

सरकार ने इन समूहों से न्यायिक जांच रिपोर्ट के आने तक इंतजार करने को कहा है. बता दें कि यह रिपोर्ट तीन महीने के भीतर तैयार हो सकती है.

इस बीच मुख्यमंत्री ने गृहमंत्री के इस्तीफे को स्वीकार नहीं किया है. 20 अगस्त को मुख्यमंत्री संगमा ने पत्रकारों को बताया था कि उन्होंने इस्तीफा स्वीकार नहीं करने का फैसला किया है क्योंकि इससे राज्य के बारे में देश को नकारात्मक संदेश जाएगा.

उन्होंने कहा था, ‘हमने पहले दिन से ही सामूहिक जिम्मेदारी लेने और किसी एक शख्स पर जिम्मेदारी नहीं पड़ने देने का फैसला किया है.’

डीजीपी की चेतावनी के बाद पुलिसकर्मियों ने सहानुभूति वाले पोस्ट हटाए

मेघालय सरकार के लिए तब असहज स्थिति पैदा हो गई जब पुलिस अधिकारियों और सिपाहियों के एक धड़े ने मुठभेड़ में मारे गए एक पूर्व उग्रवादी नेता के लिए सोशल मीडिया पर सहानुभूति दिखायी.

उग्रवादी नेता की मौत के बाद हिंसा के कारण शिलॉन्ग में स्वतंत्रता दिवस पर कर्फ्यू लगाया गया था.

पुलिस अधीक्षक स्तर के एक अधिकारी ने बताया कि पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) आर. रामचंद्रन की सख्त चेतावनी के बाद पुलिसकर्मियों ने सोशल मीडिया से आपत्तिजनक पोस्ट हटा लिए. कुछ ने काले झंडे भी प्रदर्शित किए थे.

अधिकारी ने कहा, ‘कुछ अधिकारियों और सिपाहियों ने सोशल मीडिया पर अपनी डिस्प्ले तस्वीरों (डीपी) या स्टेटस के रूप में काले झंडे लगाए थे.’

कुछ ने थांगखियु के प्रति सहानुभूति दिखाते हुए पुलिसबल के खिलाफ टिप्पणियां पोस्ट की थीं. अधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस के दौरान खुद डीजीपी ने इसका संज्ञान लिया.

अधिकारियों ने 16 अगस्त को सभी थानों को संदेश भेजकर प्रभारी अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे सभी संबंधित कर्मियों को तत्काल ऐसे पोस्ट हटाने का आदेश जारी करें, अन्यथा संबंधित कर्मचारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी.

अधिकारी ने कहा कि आदेश के बाद ऐसे पोस्ट को हटा दिया गया और किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई.

पूर्वोत्तर में संविधान और संप्रभुता को चुनौती दी जा रही, प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जवाब दें: कांग्रेस

कांग्रेस ने असम-मिजोरम विवाद और कुछ अन्य राज्यों की स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि पूर्वोत्तर में देश के संविधान और संप्रभुता को खुलेआम चुनौती दी जा रही है, लेकिन केंद्र सरकार मौन धारण किए हुए है.

पार्टी के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को सामने आकर इस पर जवाब देना चाहिए.

उन्होंने संवाददाताओं से कहा, ‘पूर्वोत्तर के राज्यों में कानून-व्यवस्था की स्थिति खराब हो चुकी है. संवैधानिक ढांचे पर हमला बोला जा रहा है. पूर्वोत्तर की स्थिति को टीवी पर नहीं दिखाया जा रहा है.’

कांग्रेस महासचिव ने दावा किया, ‘दो राज्यों की पुलिस एक-दूसरे के साथ शत्रु जैसा व्यवहार कर रही है और नागरिकों को गोलियां लग रही हैं. यह मोदी सरकार की किसी तरह भी पूर्वोत्तर में सत्ता हथियाने का एक नतीजा है. आज भी भाजपा और मोदी सरकार किसी तरह से सत्ता हथियाये रखना चाहती है, चाहे देश के लिए इसका कितना भी घातक परिणाम हो.’

उन्होंने आरोप लगाया, ‘मोदी सरकार द्वारा मौन धारण किए रहना, आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था और संवैधानिक व्यवस्था का छिन्न-भिन्न हो जाना यह दिखाता है कि केंद्र सरकार ने देश की सुरक्षा से मुंह मोड़ लिया है और गैरजिम्मेदाराना व्यवहार कर रही है.’

सुरजेवाला ने सवाल किया, ‘क्या प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जवाब देंगे कि असम-मिजोरम की सीमा पर बार-बार हो रही पुलिस गोलीबारी, हिंसा और मौतें पर वे कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं और इस स्थिति से पीछा क्यों छुड़ा रहे हैं?’

उनके मुताबिक, ‘मेघालय में उग्रवादी संगठन के लोग तालिबान की तरह हथियार लहराते हुए गाड़ी से खुलेआम घूम रहे थे. वहां 98 घंटे का कर्फ्यू लगाना पड़ा. मुख्यमंत्री के आवास पर पेट्रोल बम फेंके गए और वहां के गृहमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा. राज्यपाल के काफिले पर पथराव हुआ. क्या कारण है कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री कुछ नहीं बोल रहे?.’

उन्होंने दावा किया, ‘नगालैंड में एनएससीएन-आईएम नामक संगठन तो भारतीय संविधान को मानने से इनकार कर रहा है. अरुणाचल प्रदेश के अंदर चीन ने गांव बसा दिया है.’

उन्होंने आरोप लगाया, ‘पूर्वोत्तर के पांच राज्यों में संघर्ष की स्थिति बनी हुई है. हमारी संवैधानिक और सीमा की संप्रभुता को चुनौती दी जा रही है. मोदी सरकार देश की अखंडता और संप्रभुता से समझौता कर रही है. इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता.’

सुरजेवाला ने कहा, ‘प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को सामने आकर इस पर जवाब देना चाहिए.’

असम: सोशल मीडिया पर तालिबान का समर्थन करने के मामले में 15 गिरफ्तार

अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे का सोशल मीडिया पर कथित तौर पर समर्थन करने के मामले में असम के विभिन्न इलाकों से पुलिस ने 15 लोगों को गिरफ्तार किया है.

आरोपियों में असम पुलिस का एक कॉन्स्टेबल, जमीयत का एक वरिष्ठ नेता और एक पत्रकार भी शामिल हैं.

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि ये गिरफ्तारियां शुक्रवार रात से की गईं और इन पर गैरकानूनी गतिविधियां (निरोधक) अधिनियम, आईटी अधिनियम और भादंसं के तहत मामला दर्ज किया गया.

असम के विशेष पुलिस महानिदेशक जी पी सिंह ने ट्वीट कर कहा, ‘सोशल मीडिया पर तालिबान का समर्थन करने वाले पोस्ट लिखने के मामले में असम पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया है.’

सिंह ने लोगों को भड़काऊ सोशल मीडिया पोस्ट से सावधान रहने की भी सलाह दी. सोशल मीडिया पर ऐसे पोस्ट को रीट्वीट करने और कहा कि उन्हें लाइक करने पर लोगों को दंडात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है.

पुलिस उप महानिरीक्षक वायलेट बरुआ ने कहा कि असम पुलिस सोशल मीडिया पर तालिबान के समर्थन में टिप्पणी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रही है.

उन्होंने ट्वीट किया, ‘हम इस तरह के लोगों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज कर रहे हैं. अगर आपकी नजर में कोई ऐसी चीज आती है तो कृपया पुलिस से संपर्क करें.’

पुलिस ने कहा कि बारपेटा और धुबरी जिलों से दो-दो लोगों की गिरफ्तारी हुई. वहीं दरांग, दक्षिण सलमारा, गोवालपारा और होजाई जिलों से एक-एक व्यक्ति की गिरफ़्तारी हुई.

उन्होंने कहा कि कामरूप (ग्रामीण) जिले से भी दो लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से एक आरोपी असम पुलिस का कॉन्स्टेबल है.

कामरूप (ग्रामीण) के पुलिस अधीक्षक हितेश चंद्र रॉय ने कहा, ‘सोशल मीडिया पर तालिबान का समर्थन करने के मामले में असम पुलिस के एक जवान और एक शिक्षक को गिरफ्तार किया गया है. हम उनसे पूछताछ कर रहे हैं और जल्द ही कई और लोग हमारे घेरे में आ सकते हैं.’

इस मामले में गिरफ्तार किए गए तीन मौलानाओं में से एक मौलाना फजलुल करीम जमीयत-ए-उलेमा का प्रदेश सचिव है और वह राज्य के विपक्षी दल ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) का महासचिव भी है.

इस बीच एआईयूडीएफ के प्रवक्ता ने कहा कि जांच पूरी होने तक करीम पार्टी से निलंबित रहेंगे.

पूर्वोत्तर के नौ डिजिटल मीडिया समूहों ने एक नया संगठन बनाया 

 पूर्वोत्तर क्षेत्र के नौ डिजिटल मीडिया समूह एक नया संगठन बनाने के लिए साथ आए हैं जिसका उद्देश्य इसके सदस्यों को अपनी चिंताओं को व्यक्त करने के लिए एक मंच प्रदान करना है.

द नॉर्थईस्ट एसोसिएशन फॉर डिजिटल कम्युनिकेशन एंड मीडिया (एनएडीसीओएम) ने शनिवार को कहा कि यह कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के साथ एक गैर-लाभकारी कंपनी के रूप में पंजीकृत है.

एनएडीसीओएम ने एक बयान में कहा कि गुवाहाटी स्थित ईस्ट मोजो, जी प्लस, इनसाइडएनई, नॉर्थईस्ट नाऊ, टाइम8 और द न्यूज मिल, शिलॉन्ग स्थित द नॉर्थईस्ट टुडे (टीएनटी), गारो हिल्स स्थित हब न्यूज और गंगटोक स्थित द सिक्किम क्रॉनिकल एसोसिएशन के संस्थापक सदस्य हैं.

सुजाता गुरुंग चौधरी (नॉर्थईस्ट नाऊ) को 2021-22 के लिए अध्यक्ष, अफरीदा हुसैन (इनसाइडएनई) को निदेशक और जयंत डेका (द न्यूज मिल) को महासचिव चुना गया है.

बयान में कहा गया है, एसोसिएशन पत्रकारिता की नैतिकता और मानकों को ध्यान में रखते हुए सर्वोत्तम प्रथाओं को विकसित करने और बढ़ाने में मदद करेगा.

पूर्वोत्तर में कैंसर के सबसे ज्यादा नए मामले: रिपोर्ट

(प्रतीकात्मक फोटो: रॉयटर्स)

 देश में अरुणाचल प्रदेश के पापुम पारे जिले में महिलाओं में कैंसर के सबसे ज्यादा नए मामले और मिजोरम के आइजोल में पुरुषों में कैंसर में सर्वाधिक मामले सामने आए हैं. सरकार की ओर से जारी एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई.

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और राष्ट्रीय रोग इंफॉर्मेटिक्स एवं अनुसंधान केंद्र (एनसीडीआईआर) की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया कि पापुम पारे जिले में महिलाओं में 219.8 प्रति एक लाख कैंसर के मामले हैं और मिजोरम की राजधानी आइजोल में पुरुषों में 269.4 प्रति एक लाख कैंसर के मामले हैं.

पासीघाट में बाकिन पर्टिन जनरल अस्पताल (बीपीजीएच) में जनसंख्या आधारित कैंसर रजिस्ट्री (पीबीसीआर) के प्रधान अनुसंधानकर्ता डॉ कलिंग जेरंग ने बताया कि पूर्वोत्तर भारत देश की कैंसर राजधानी बन चुका है.

उन्होंने कहा कि आईसीएमआर-एनसीडीआईआर बेंगलुरु के तहत पीबीसीआर परियोजना राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम के अंतर्गत कैंसर पर अध्ययन किया जा रहा है.

उन्होंने उम्मीद जताई कि कैंसर के रोकथाम के लिए नीति निर्धारण के वास्ते सरकार द्वारा परियोजना से प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाएगा.

गोपीनाथ बोरदोलोई के नाम पर रहेगा गुवाहाटी हवाईअड्डे का नाम: हिमंता बिस्वा शर्मा

गुवाहाटी हवाईअड्डे का नाम कथित रूप से बदलने को लेकर हुए विवाद पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा का कहना है कि इसे हमेशा लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के नाम से ही जाना जाएगा.

गुवाहाटी हवाईअड्डे को गुजरात स्थित अडाणी समूह को सौंपे जाने के विरोध में विपक्षी दल, छात्र और युवा संगठन विरोध कर रहे हैं.

बीते कुछ दिनों से यहां कुछ समाचार पत्रों में एक विज्ञापन प्रकाशित होने के बाद इस हवाईअड्डे के नाम पर विवाद खड़ा हो गया है.

विज्ञापन अडाणी गुवाहाटी इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (एजीआईएएल) द्वारा लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे (एलजीबीआईए) में कुछ गैर-वैमानिकी सेवाओं के लिए बोलियां आमंत्रित करते हुए जारी किया गया था.

शर्मा ने गोलाघाट में एक कार्यक्रम से इतर संवाददाताओं से कहा, ‘कोई भी हवाईअड्डे का नाम नहीं बदल सकता. यह लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा बना रहेगा. किसी को भी नाम को लेकर कोई चिंता नहीं करनी चाहिए.’

बता दें कि हवाई अड्डे का नाम असम के पहले मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलोई के नाम पर रखा गया है.

भारत रत्न पुरस्कार से सम्मानित गोपीनाथ बोरदोलोई अभी भी भारत के विभाजन के दौरान तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के साथ पूर्वोत्तर को विलय से बचाने वाले उद्धारकर्ता के रूप में राज्य के लोगों के बीच सम्मानित हैं.

पिछले साल 19 अगस्त को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एएआई के तीन हवाईअड्डों- गुवाहाटी, जयपुर और तिरुवनंतपुरम को संचालन, प्रबंधन और विकास के लिए 50 साल के लिए अडाणी एंटरप्राइजेज को पट्टे पर देने की मंजूरी दी थी.

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (एएआई) और अडाणी समूह के बीच इस साल 19 जनवरी को नई दिल्ली में समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे.

हवाईअड्डे के पास की जमीन भी निजी कंपनी को 50 साल की अवधि के लिए लीज पर दी गई है ताकि उड्डयन संबंधी कारोबार और सुविधाएं विकसित की जा सकें.

वहीं, केंद्र सरकार ने 2018 में एएआई के छह हवाईअड्डों गुवाहाटी, अहमदाबाद, जयपुर, लखनऊ, तिरुवनंतपुरम और मंगलुरु को संचालन, प्रबंधन और विकास के लिए पट्टे पर दिया था.

मेघालय ने मणिपुर के शाही परिवार का विवादित महल राज्य सरकार को सौंपा

मणिपुर और मेघालय के बीच लंबे समय से चल रहे विवाद को खत्म करते हुए मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने शिलॉन्ग के ऊपरी इलाके में स्थित मणिपुरी राजा का शाही महल मणिपुर सरकार को सौंपने का फैसला किया है.

मणिपुर के राजनीतिक इतिहास में इस शाही महल का खासा महत्व है क्योंकि मणिपुर के राजा बोधचंद्र 1949 में भारत के साथ मणिपुर विलय समझौते पर हस्ताक्षर से पहले यहां रुके थे.

ऐसा कहा जाता है कि राजा को मणिपुरी राजबाड़ी कहे जाने वाले इस महल से बाहर निकलकर मणिपुर जाने और इस समझौते को लेकर अपने मंत्रियों से विचार-विमर्श करने की मंजूरी नहीं थी.

कुछ हफ्ते बाद अक्टूबर 1949 में मणिपुर भारत संघ का हिस्सा बन गया था. मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने 15 अगस्त को ट्वीट कर कहा था कि इस महल को राज्य भवन बनाया जाएगा.

सिंह ने कहा था, ‘यह ऐतिहासिक मणिपुर राजबाड़ी मणिपुर के महाराज का है और सितंबर 1949 में भारत के साथ मणिपुर विलय समझौते पर हस्ताक्षर के समय महाराजा बोधचंद्र यहां रुके थे. दुखद है कि यह संपत्ति मणिपुर के शाही परिवार के पास नहीं रहा.’

किरण रिजिजू का राज्यपाल से अरुणाचल प्रदेश में हाईकोर्ट की स्थापना कराने का अनुरोध

केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने 19 अगस्त को अरुणाचल प्रदेश के दौरे के दौरान राज्यपाल बीडी मिश्रा से ईटानगर में हाईकोर्ट का निर्माण कराने का अनुरोध किया.

स्थानीय रिपोर्टों के मुताबिक, ईटानगर में राजभवन में अपने दौरे के दौरान राज्यपाल ने राज्य में न्यायिक प्रणाली की मजबूत करने के लिए हाईकोर्ट के निर्माण के लिए उनसे मदद करने को कहा.

मौजूदा समय में सिर्फ अरुणाचल प्रदेश ही नहीं बल्कि नगालैंड और मिजोरम भी गुवाहाटी हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में ही आते हैं, जिससे इन राज्यों के आम लोगों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.

उत्तरपूर्वी क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम 1971 के अनुसार पांच उत्तरपूर्वी राज्यों असम, नगालैंड, मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा और दो केंद्रशासित प्रदेशों मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश के लिए एक कॉमन हाईकोर्ट का गठन किया गया था.

2013 में मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा को पूर्णकालिक हाईकोर्ट मिल गए, जिसके बाद पूर्वोत्तर के सात राज्यों में हाईकोर्ट की कुल संख्या बढ़कर चार हो गई.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)