भारत

पाठ्यपुस्तकों में स्वतंत्रता सेनानियों के ग़लत चित्रण को सुधारा जाना चाहिए: संसदीय समिति

‘स्कूल की पाठ्यपुस्तकों की सामग्री और डिज़ाइन में सुधार’ विषय पर स्थायी समिति की रिपोर्ट में कहा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कई ऐतिहासिक शख़्सियतों और स्वतंत्रता सेनानियों को अपराधियों के रूप में ग़लत तरीके से चित्रित किया गया है, इसे ठीक किया जाना चाहिए और उन्हें हमारी इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में उचित सम्मान दिया जाना चाहिए.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: अभी शर्मा/CC BY 2.0)

नई दिल्ली: एक संसदीय समिति ने इस बात पर गौर करते हुए कि कई ऐतिहासिक शख्सियतों और स्वतंत्रता सेनानियों को गलत तरीके से ‘अपराधियों’ के रूप में चित्रित किया गया है, सिफारिश की है कि इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में उन्हें उचित सम्मान देने के लिए भारत के स्वतंत्रता संग्राम के नायकों के गलत चित्रण को ठीक किया जाना चाहिए.

‘स्कूल की पाठ्यपुस्तकों की सामग्री और डिजाइन में सुधार’ विषय पर स्थायी समिति की रिपोर्ट में पाठ्यक्रम में सिख और मराठा इतिहास के साथ-साथ पुस्तकों को लिंग-समावेशी बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है.

राज्यसभा सदस्य विनय सहस्रबुद्धे की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट को मंगलवार को संसद में पेश किया गया. इसमें कहा गया है कि भारतीय इतिहास से जुड़े पाठ्यपुस्तकों में इतिहास की सभी अवधि के उपयुक्त उद्धरण का उल्लेख किया जाना चाहिए जिसमें प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास शामिल है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘समिति ने अपनी बातचीत के दौरान गौर किया कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के कई ऐतिहासिक शख्सियतों और स्वतंत्रता सेनानियों को अपराधियों के रूप में गलत तरीके से चित्रित किया गया है. इसलिए, समिति का विचार है कि स्वतंत्रता संग्राम के हमारे नायकों के गलत चित्रण को ठीक किया जाना चाहिए और उन्हें हमारी इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में उचित सम्मान दिया जाना चाहिए.’

समिति ने कहा कि स्कूली पाठ्यपुस्तकों में विक्रमादित्य, चोल, चालुक्य, विजयनगर, गोंडवाना या उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के त्रावणकोर और अहोम जैसे कुछ महान भारतीय साम्राज्यों को पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया है और विश्व मंच पर भारत की स्थिति के विस्तार में इन लोगों योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘नई पाठ्य पुस्तकें तैयार करने में इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. अंग्रेजों ने दर्शनशास्त्र, विज्ञान, गणित, अध्यात्म, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में प्राचीन भारत के महान योगदान को कम करने की कोशिश की और हमारी पाठ्यपुस्तकों में इसे उपेक्षित रखा गया. जबकि लैंगिक पूर्वाग्रह और जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए काफी पहल की गई थी, इतिहास लेखन पांच दशकों से अधिक समय तक कुछ शिक्षाविदों के एक चुनिंदा समूह के आधिपत्य तक ही सीमित रहा.’

समिति को इस विषय पर विशेषज्ञों, व्यक्तियों और संगठनों से लगभग 20,000 अभ्यावेदन प्राप्त हुए, जो स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में विसंगतियों/चूक की ओर इशारा करते हैं.

समिति ने सुझाव दिया कि स्कूली पाठ्य पुस्तिकाओं में देश के विभिन्न राज्यों एवं जिलों के ऐसे अनाम पुरुषों एवं महिलाओं के जीवन को रेखांकित किया जाना चाहिए, जिन्होंने हमारे राष्ट्रीय इतिहास एवं अन्य पहलुओं पर सकारात्मक प्रभाव डाला है.

रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय शिक्षा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के निदेशक ने समिति को बताया कि पाठ्यपुस्तकों में इतिहास से परे तथ्यों को हटाने एवं हमारे राष्ट्रीय विभूतियों के बारे में बातों को तोड़ मरोड़ की पेश करने के मुद्दे पर एनसीईआरटी एक समिति गठित करने की प्रक्रिया में है ताकि इस बारे में विभिन्न पक्षकारों द्वारा उठाये गए विषयों एवं अन्य मुद्दों का आकलन किया जा सके और इसका निपटारा किया जा सके.

इसमें कहा गया है कि एनसीईआरटी महान महिला नेत्रियों की भूमिकाओं को रेखांकित कर रही है जिसमें गार्गी, मैत्रेयी के अलावा झांसी की रानी, रानी चेन्नमा, चांद बीबी आदि शामिल हैं. इसके अलावा अन्य पूरक सामग्री भी उपलब्ध कराई गई हैं.

रिपोर्ट के अनुसार, नई पाठ्यपुस्तकों एवं पूरक सामग्री में भारतीय इतिहास की विभिन्न अवधियों से संबद्ध इतिहास की महान महिलाओं के बारे में विस्तृत जानकारी एवं ई सामग्री उपलबध कराई जाएगी.

समिति को यह भी बताया गया कि एनसीईआरटी द्वारा माध्यमिक शिक्षा पर राष्ट्रीय पाठ्यचर्या ढांचा (एनसीएफएसई) विकसित करने के लिए जमीनी कार्य शुरू किया जा चुका है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, पैनल ने कहा, ‘नई खोजें हो रही हैं, नए तथ्य सामने आ रहे हैं और पाठ्यपुस्तकें एक जैसी नहीं रह सकतीं. अगर इतिहास राजनीतिक रूप से विवश वैचारिक बंधनों के परिणामस्वरूप कुछ पूर्व-कल्पित पूर्वाग्रहों के साथ लिखा गया है, तो यह और भी खराब है.’

पैनल ने आगे कहा कि भारत में इतिहास लेखन को इन अस्वीकार्य पैमानों के चलते नुकसान हुआ है और इसे हटाया जाना चाहिए…

समिति ने नोट किया कि हमारे आस-पास नए तथ्य सामने आए हैं, जिनमें आर्य आक्रमण सिद्धांत, सरस्वती नदी, राम सेतु और भी बहुत कुछ शामिल हैं. इनमें पूरी तरह से नई वैज्ञानिक प्रगति और नए उपकरणों के कारण नए शोध हुए हैं. नई पाठ्यपुस्तकें तैयार करने में इन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.

समिति ने कहा कि अंग्रेजों ने दर्शनशास्त्र, 25 विज्ञान, गणित, आध्यात्म, चिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में प्राचीन भारत के महान योगदान को कम करने की कोशिश की और हमारी पाठ्यपुस्तकों में इसे उपेक्षित रखा गया. जबकि लैंगिक पूर्वाग्रह और जातिगत भेदभाव को दूर करने के लिए काफी पहल की गई थी. इतिहास लेखन पांच दशकों से अधिक समय तक कुछ शिक्षाविदों के एक चुनिंदा समूह के आधिपत्य तक ही सीमित रहा.

समिति ने सुझाव देते हुए कि एनसीईआरटी और एससीईआरटी को मुख्य रूप से अपनी पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से मुख्य सामग्री प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए. साथ ही सिफारिश की कि देश भर के स्कूली छात्रों के शैक्षिक मानकों में एकरूपता बनाए रखने के लिए शिक्षा मंत्रालय को एक कोर क्लास-वाइज कॉमन विकसित करने की संभावना का पता लगाना चाहिए.

इतिहास पर बोलते हुए समिति ने हितधारकों के साथ अपनी चर्चा में कहा, ‘संयुक्त राष्ट्र ने अपनी सबसे महत्वपूर्ण एजेंसियों में से एक- यूनेस्को के माध्यम से इतिहास के लिए व्यापक दिशानिर्देश तैयार किए थे जो विश्व शांति, सहिष्णुता, मानवाधिकार और लोकतंत्र के सार्वभौमिक मूल्यों की उन्नति को बढ़ावा देंगे.’

रिपोर्ट में कहा, ‘उन्होंने सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक इतिहास को उजागर करने और संघर्षों के इतिहास को कम करने की आवश्यकता पर जोर दिया. अब तक हाशिए पर पड़े समूहों, विशेषकर महिलाओं और ‘विविधता में एकता’ और ‘बहुलवाद’ के मूल्यों को इतिहास के शिक्षण में प्रमुखता मिलनी चाहिए.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)