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जेएनयू ने पीएचडी उम्मीदवारों के बीच भेदभाव के आरोपों को ख़ारिज किया

जेएनयू छात्रसंघ की अध्यक्ष आइशी घोष ने आरोप लगाया था कि पीएचडी पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए मौखिक परीक्षा में शामिल हुए कई उम्मीदवारों को संवैधानिक रूप से अनिवार्य आरक्षण नीति का उल्लंघन करते हुए कम अंक दिए गए, ख़ासतौर पर उन विद्यार्थियों को जो हाशिये पर रहने वाले वर्गों से आते हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) ने सोमवार को उन आरोपों को खारिज किया है कि हाशिये पर रहे वर्गों के पीएचडी उम्मीदवारों के साथ मौखिक परीक्षा के दौरान भेदभाव किया गया और कहा कि वह ‘न्याययुक्त, पारदर्शी और समावेशी प्रवेश नीति’ का अनुपालन करता है.

विश्वविद्यालय ने कहा कि पीएचडी चयन समिति को विद्यार्थियों की श्रेणी की जानकारी नहीं दी जाती ताकि सुनिश्चित किया जा सके कि प्रक्रिया में कोई भेदभाव न हो.

उल्लेखनीय है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ (जेएनयूएसयू) की अध्यक्ष आइशी घोष ने बीते 12 दिसंबर को आरोप लगाया था कि पीएचडी पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिए मौखिक परीक्षा में शामिल हुए कई उम्मीदवारों को संवैधानिक रूप से अनिवार्य आरक्षण नीति का उल्लंघन करते हुए कम अंक दिए गए, खासतौर पर उन विद्यार्थियों को जो हाशिये पर रहने वाले वर्गों से आते हैं.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, विश्वविद्यालय के एक बयान में कहा, ‘जेएनयू मीडिया के कुछ हिस्से में समाज के हाशिये के वर्गों से पीएचडी उम्मीदवारों के साथ भेदभाव का आरोप लगाने वाली रिपोर्टों को स्पष्ट रूप से खारिज करता है.’

बयान के मुताबिक, ‘विश्वविद्यालय द्वारा अपनाई गई प्रवेश नीति के अनुसार प्रत्येक एससी/एसटी/पीडब्ल्यूडी उम्मीदवार जो पीएचडी प्रवेश के लिए जेएनयू प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करता है, को मौखिक परीक्षा (Viva Voce) के लिए बुलाया जाता है, भले ही उनकी संबंधित श्रेणियों में प्रवेश के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या कुछ भी हो.’

इसमें कहा गया है कि पीएचडी प्रवेश के लिए जेएनयू प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले अन्य श्रेणियों के छात्रों को उनकी संबंधित श्रेणियों में उपलब्ध सीटों की संख्या के आधार पर एक विशेष अनुपात में बुलाया जाता है.

बयान में कहा गया है, ‘हाशिये पर रहने वाले छात्रों के लिए यह हर योग्य एससी/एसटी/पीडब्ल्यूडी उम्मीदवार को अवसर प्रदान करने में विश्वविद्यालय की चिंता और प्रतिबद्धता को दर्शाता है.’

इस बात पर जोर देते हुए कि विश्वविद्यालय एक निष्पक्ष, पारदर्शी और समावेशी प्रवेश नीति का पालन करता है, जो इसकी सिद्ध शैक्षणिक उत्कृष्टता की नींव है, विश्वविद्यालय ने कहा कि अध्ययन के विभिन्न कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए सरकार की आरक्षण नीति को सख्ती से लागू किया जाता है.

बयान के मुताबिक, ‘पीएचडी चयन समितियों के सदस्य जो मौखिक परीक्षा आयोजित करते हैं, उन्हें किसी भी पूर्वाग्रह और पूर्वाग्रह को खत्म करने के लिए उम्मीदवारों की श्रेणियों के बारे में जानकारी प्रदान नहीं की जाती है. आरक्षित श्रेणियों से संबंधित पर्यवेक्षकों को हमेशा यह सुनिश्चित करने के लिए नियुक्त किया जाता है कि मौखिक परीक्षा के दौरान उम्मीदवारों के साथ कोई भेदभाव न किया जाए.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)