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संपादकीय: मुंबई के पत्रकारों ने जो किया वो देश के पत्रकारों के लिए नज़ीर है

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की अदालती कार्यवाही की मीडिया रिपोर्टिंग पर लगी पाबंदी को नौ पत्रकारों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके बाद हाईकोर्ट ने यह पाबंदी हटा दी. उनकी जीत पत्रकारिता की जीत है.

Wire Hindi Editorial

बॉम्बे हाईकोर्ट  ने बुधवार को सीबीआई की विशेष अदालत के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें सोहराबुद्दीन शेख फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई की कार्यवाही की रिपोर्टिंग या प्रकाशन से पत्रकारों को रोका गया था.

मीडिया रिपोर्टिंग पर लगी रोक हटाने का फैसला सुनाते हुए जस्टिस रेवती मोहिते डेरे ने कहा, ‘प्रेस के अधिकार अभिव्यक्ति की आजादी देने वाले संवैधानिक अधिकार में निहित हैं. एक खुली सुनवाई की रिपोर्टिंग में प्रेस न केवल अपने अधिकार का प्रयोग करती है बल्कि आम जनता को इस तरह की सूचनाएं उपलब्ध कराने के बड़े उद्देश्य को भी पूरा करती है.’

संवैधानिक मुद्दों पर जोर देने के साथ जस्टिस मोहिते डेरे ने यह माना कि सीबीआई के विशेष जज ने अपनी शक्तियों से बाहर जाकर मीडिया रिपोर्टिंग पर पाबंदी का आदेश दिया है. उन्होंने स्पष्ट कहा कि सीआरपीसी (आपराधिक प्रक्रिया संहिता) में इस तरह का आदेश देने का कोई प्रावधान नहीं है.

प्रेस की आज़ादी को लेकर जस्टिस मोहिते डेरे का यह महत्वपूर्ण निर्णय ऐसे समय में आया है जब मीडिया भीषण दबाव में है. बेहद कमजोर आधार पर दायर होने वाले मानहानि के मुकदमे रोज की बात हो गए हैं. इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि अपना काम कर रहे पत्रकारों को धमकियों और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है.

सीबीआई कोर्ट के फैसले को नौ पत्रकारों ने हाईकोर्ट में चुनौती इस पेशे के सिद्धांतों के चलते दी थी- उनकी जीत इस पेशे के आधारभूत सिद्धांतों की पुष्टि करती है.

सोहराबुद्दीन मामले का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है. सोहराबुद्दीन के अलावा 2003 से 2006 के बीच हुए 21 लोगों के ग़ैर-न्यायिक ‘एनकाउंटर’ पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा जांच के आदेश के चलते गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह को न केवल इस्तीफा देना पड़ा, बल्कि वे जेल भी गए.

शाह को 2014 में सीबीआई की विशेष अदालत ने बरी कर दिया, लेकिन नवंबर 2017 में विशेष सीबीआई जज बृजगोपाल हरकिशन लोया के परिवार द्वारा उनकी मौत पर उठाए गए सवालों के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया.

इस मामले में लोगों की दिलचस्पी और बढ़ गई जब सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों द्वारा एक अप्रत्याशित प्रेस कॉन्‍फ्रेंस बुलाकर ऐसे संकेत दिए गए कि चीफ जस्टिस द्वारा, लोया मामले समेत बिना किसी तार्किक आधार के विशेष जजों को मुकदमे सौंपे जा रहे हैं.

सीबीआई के शाह के बरी होने के फैसले को चुनौती देने से इनकार और उसके इस कदम को चुनौती देने पर हुई याचिका का विरोध इस बात को पुष्ट करता है कि इस मामले में न्याय को ताक पर रख दिया गया है.

ऐसे में सीबीआई जज का मीडिया रिपोर्टिंग पर पाबंदी का आदेश इस मामले को जानने के जनता के अधिकार का उल्लंघन करता है. एक लोकतंत्र में किसी भी मामले में प्रेस पर पाबंदी के लिए कोई जगह नहीं होती; इस मामले में तो यह बेवजह और किसी सेंसरशिप की तरह था. पर अब से सुनवाई की विस्तृत रिपोर्टिंग होगी, जैसे उसे होना चाहिए.

हालांकि यह जरुरी है कि जस्टिस मोहिते डेरे का प्रेस को लोकतंत्र का सबसे ताकतवर स्तंभ कहना कोई मामूली-सी बात बनकर न रह जाए. न्यायपालिका, सरकार, कानून और व्यवस्था चलाने वालों और खासकर मीडिया प्रबंधकों को इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है.

प्रेस के खतरे खत्म नहीं होने वाले और इनके ख़िलाफ़ खड़े होने की जरूरत है- ये न सिर्फ सरकार से हैं, बल्कि कॉरपोरेट और रसूखदारों से भी हैं. जो पत्रकार सीबीआई कोर्ट के इस ग़ैर क़ानूनी आदेश के ख़िलाफ़ खड़े हुए, उन्होंने बस रास्ता दिखाया है.

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