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यह अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए निराशाजनक दौर है

यह एक कठोर हक़ीक़त है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी को बचाए रखने वाले हर क़ानून के अपनी जगह पर होने के बावजूद समाचारपत्रों और टेलीविज़न चैनलों ने बिना प्रतिरोध के आत्मसमर्पण कर दिया है और ऊपर से आदेश लेना शुरू कर दिया है.

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(फोटो क्रेडिट:Pixabay/The Wire)

अब हमें बाल की खाल निकालना बंद कर देना चाहिए. हम आज के भारत में जो देख रहे हैं वह सैद्धांतिक कसौटी पर फासीवाद है या नहीं, इसकी बारीकियों में पड़ने का कोई मतलब नहीं है. यह तर्क कि यह 1975 के आपातकाल जैसा नहीं है, पूरी तरह से अप्रासंगिक है.

इस तरह की किताबी धारणाएं संगोष्ठी कक्षों और अकादमिक बहसों की चीजें हैं, जहां बड़े-बड़े विद्वान, जो जमीनी हकीकत से ज्यादा सिद्धांतों के प्रति आकर्षित रहते, परिभाषाओं की बारीकियों पर चर्चा कर सकते हैं. लेकिन, एक ऐसे समय में ऐसा करना जब हम सतत तरीके विरोधी स्वरों दबाया जाता देख रहे हैं, एक निरर्थक कवायद है.

हकीकत में विरोध की आवाजों को ही नहीं दबाया जा रहा है. यहां तक कि तथ्यों पर भी पाबंदी लगा दी गई है, जिसका मतलब यह है कि सिर्फ कानों में मधुर रस घोलने वाले झूठों को ही इजाजत दी जाएगी.

मीडियाकर्मी होने के नाते मेरे साथियों और मैंने सच्चाई का प्रकाशन करते वक्त धमकियों के आगे डर और घबराहट का अनुभव किया है; लेकिन आप मेरी बातों पर मत जाइए. आप पुण्य प्रसून बाजपेयी की उनकी ही जु़बानी सुनाई गई आपबीती को पढ़िए कि किस तरह से उनके टीवी चैनल के प्रोपराइटर ने उनके शो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम न लेने की ताकीद की थी.

बाजपेयी और उनके सहकर्मी मिलिंद खांडेकर को उस समय नौकरी गंवानी पड़ी जब तथ्यों और जमीनी रिपोर्टिंग के सहारे की गई सरकार की आलोचना करने वाली खबरें तय की गई ‘हदों को पार करने लगीं’. लेकिन, इतना ही काफी नहीं था- पिछले कई दिनों से बाजपेयी के कार्यक्रम मास्टरस्ट्रोक, जिसने चैनल की प्रतिष्ठा और दर्शक संख्या, दोनों को बढ़ाने का काम किया था, को केबल और सैटेलाइट चैनलों से गायब कर दिया गया था.

न ही यह सिर्फ मीडिया के बारे में है- हाल के वर्षों में, हास्य कलाकार कुनाल कामरा के एमएस यूनिवर्सिटी, वडोदरा में होने वाले शो को रद्द कर दिया गया. यह कुछ पूर्व छात्रों की इस शिकायत के बाद किया गया कि वे ‘देशद्रोही’ हैं.

उन्होंने यह दावा किया कि उनका शो ‘2019 के चुनावों से पहले वडोदरा के युवाओं के दिमागों को प्रदूषित करने की एक वैचारिक साजिश’ था. ऑडिटोरियम के संयोजक ने कहा कि ‘उन्हें यह बताया गया कि उनके शो की विषय वस्तु देशविरोधी और विवादास्पद है.’ यह किसी पुराने व्यंग्य नाटक की तरह (जब व्यंग्य नाटक लिखे जाते थे) दूसरी दुनिया का और झूठा लगता है, लेकिन यह वास्तविकता है और बेहद खतरनाक है.

या फिर मिसाल के लिए ‘डॉयलॉग ऑन फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ (अभिव्यक्ति की आजादी पर संवाद) शीर्षक से उस कार्यक्रम को ही लीजिए, जिसे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्रों के विरोध के कारण दिल्ली विश्वविद्यालय ने रद्द कर दिया. संघ परिवार का हिस्सा एबीवीपी के लिए यह शीर्षक अपने आप में राजद्रोही और फसाद के लायक है.

पहली बात तो यह अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर है, जो उनके अपने चरित्र के बिल्कुल उलट है. दूसरी बात, यह एक डॉयलॉग यानी संवाद है, जो कि एक ऐसे संगठन के लिए बिल्कुल अजनबी चीज है, जहां आधिकारिक पक्ष के अलावा किसी अन्य दृष्टिकोण को रखने की कोई इजाजत ही नहीं है.

अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी कार्यक्रम की इजाजत न देना कितना विडंबनापूर्ण है, इसे वे नहीं समझेंगे क्योंकि न तो एबीवीपी और न ही उसे नियंत्रित करने वाले व्यंग्य करते हैं.

हमारे उदार और वामपंथी बुद्धिजीवी तबके को इस बात का इससे ज्यादा क्या प्रमाण चाहिए कि यह अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध के लिए मुश्किल दौर है? हां, आपातकाल के दौरान चीजें कठिन थीं- पत्रकार जेल में थे और अखबार वैसे खबरों को छापने से घबराते थे, जो सरकार को कुपित कर सकती थी- लेकिन तब एक कानून लागू था.

अब अखबार के प्रोपराइटर अपने संपादकों को जबान बंद रखने या बाहर का रास्ता नाप लेने के लिए कहते हैं. संपादकों के अनुबंधों को बीच में ही समाप्त कर दिया जा रहा है. मीडिया कंपनियों पर छापा मारा गया है, उनके चैनलों के प्रसारण को रोका गया है (या ऐसी कोशिश की गई है), और पत्रकारों को गोली मारी जा रही है.

क्या यह वास्तव में इतना अलग है? तब और अब के बीच तुलना करने का कोई मतलब नहीं है. यह एक कठोर हकीकत है कि अभिव्यक्ति की आजादी को बचाए रखने वाले हर कानून के अपनी जगह पर होने के बावजूद समाचारपत्रों और टेलीविजन चैनलों ने बिना प्रतिरोध के आत्मसमर्पण कर दिया है और ऊपर से आदेश लेना शुरू कर दिया है.

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(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

आने वाला समय कैसा होने वाला है, इसके संकेत पहले से ही मौजूद थे. गुजरात में अपने कार्यकाल के दौरान नरेंद्र मोदी ने मीडिया से दूरी बनाकर रखी थी और कुछ मौकों पर जब उन्होंने राज्य से बाहर के पत्रकारों से मुलाकात की, तब उन्होंने ऐसे किसी भी सवाल का जवाब देने से इनकार कर दिया, जो उन्हें पसंद नहीं आए या जो उनके विरोध में जाने वाले थे. एक चुने हुए पदाधिकारी से सवाल पूछा जा सकता है या पूछा जाना चाहिए, यह एक ऐसी चीज है, जिसे वे न तो समझते हैं और न जिस विचार से इत्तेफाक रखते हैं.

वे स्थितियों को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं और जब उनका नियंत्रण कमजोर पड़ता है- जैसा कि तब हुआ जब करन थापर उनका इंटरव्यू ले रहे थे, तब वे इसे संभाल नहीं पाते और बातचीत बंद कर देते हैं.

यह एक ऐसे प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार है जो छवि मैनेजमेंट के प्रति आसक्त है- सारे विज्ञापन, सारी तस्वीरें, उनके मंत्रियों द्वारा उनके नाम का उद्घोष ये सब उन्हें एक गढ़े गये चमकते भगवान के तौर पर पेश करने के लिए होता है, जिसकी हमेशा प्रशंसा होनी चाहिए.

उन्होंने शायद ही कभी गुजरात में प्रेस कॉन्फ्रेंसों को संबोधित किया और प्रधानमंत्री के तौर पर अपने साढ़े चार साल के कार्यकाल में उन्होंने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित नहीं किया है. उन्होंने जो कुछ इंटरव्यू दिए भी हैं, वे उनके पैरों में रेंगने वाले चापलसू एंकरों द्वारा लिए गए हैं.

लंदन में मंच पर दी गई एक पूर्व नियोजित प्रस्तुति, जिसमें एक कवि उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ रहा था, एक शर्मसार करने वाला प्रकरण था. यहां तक कि डोनाल्ड ट्रंप जिनका मीडिया के साथ काफी कड़वा संबंध है, नियमित तौर पर मीडिया से समूह में बात करते हैं और उनके सवालों का सामना करते हैं.

वे उनका मजाक बनाते हैं, उनका नाम लेकर पुकारते हैं, लेकिन वे कम से कम उनके सामने हाजिर तो होते हैं. नरेंद्र मोदी मीडिया के प्रति अवमानना का भाव रखते हैं, लेकिन वे उनके सामने खड़े होने का खतरा मोल नहीं लेंगे, एक गलत सवाल उनके होश उड़ा सकता है और उन्हें अस्त-व्यस्त कर सकता है.

इसलिए यह ज्यादा आश्चर्यजनक नहीं है कि वे मीडिया से दूर रहे हैं. लेकिन यह छुईमुईपन नित नई ऊंचाइयां छू रहा है. मीडिया पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है और मीडिया घरानों को नियमित तौर पर निर्देश दिए जा रहे हैं.

बाजपेयी ने 200 लोगों की मजबूत टीम की बात की है, जिनका काम चैनलों/अखबारों के कंटेंट पर निगरानी रखना और यह रिपोर्ट तैयार करना है कि कौन क्या कह रहा है? अगर कोई पत्रकार अपनी निर्धारित हदों को पार कर रहा है, तो इसके बारे में समाचारपत्रों के मालिकों को जल्दी ही पता चल जाता है.

उनसे उम्मीद की जाती है कि वे उन्हें हद में रहने के लिए कहेंगे और उनके पर कतर देंगे. पत्रकार लोग किस तरह से खुद को हताश और अपने हाथ बंधे हुए महसूस कर रहे हैं, इसके साक्ष्य के तौर पर कहानियों की कोई कमी नहीं है.

विरोध करने वालों का क्या हश्र किया जा रहा है, यह मालिकों के आदेशों से ज्यादा डरावना संदेश देता है. नौकरी गंवाना काफी मुश्किल हो सकता है और कई बार दूसरी नौकरी पाना लगभग नामुमकिन हो जाता है.

कोई भी दूसरा मालिक ऐसे पत्रकार को अपने यहां नहीं रखना चाहता, जो राजनीतिक सत्ता का कोपभाजन बन चुका है. ऐसे कई उदाहरण हैं जो यह बताते हैं कि कैसे ठोस प्रस्तावों को भी पीछे ले लिया गया है.

एक बेरोजगार पत्रकार आजीविका से ज्यादा गंवा देता/देती है. वह एक मंच और अपनी आवाज भी गंवा देता/देती है. यह डर अच्छे से अच्छे सुस्थापित-स्टार-पत्रकारों को भी अपना सिर जितना संभव हो सके झुका कर और बिना कोई मुसीबत मोल लिए अपनी नौकरी करने पर मजबूर कर सकता है.

बाजपेयी के साथ जो हुआ है, उसके बाद भी हम इस बात को लेकर निश्चिंत रह सकते हैं हम पेशेवर एकता या सरकार के खिलाफ व्यक्तिगत या सामूहिक मुखालफत के ज्वार को उठता हुआ नहीं देखेंगे. बहुत हुआ तो एक भुरभुरा सा बयान जारी कर दिया जाएगा, लेकिन छोटे और बड़े, खासतौर पर बड़े पत्रकार अपने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मसलों की जानकारी देने के काम में लग जाएंगे.

जब एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में डोनाल्ड ट्रंप ने सीएनएन के रिपोर्टर का मजाक बनाया, तब फॉक्स न्यूज से एक साथी पत्रकार ने खड़े होकर इसके खिलाफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सामने अपनी आपत्ति प्रकट की. लेकिन ऐसा कुछ भी यहां होने की उम्मीद नहीं है. भारत में परंपरागत तरीके से मीडिया संघ कमजोर रहे हैं और अब तो वे किसी मजाक में तब्दील हो गए हैं.

इसलिए मसला वर्तमान स्थिति के विश्लेषण और इसे सटीक नाम से संबोधित करने का नहीं है; यह काम भविष्य के इतिहासकारों के लिए छोड़ देना चाहिए. यह समय है कि हम खड़े हों और अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं और यह साफ कर दें कि अभिव्यक्ति को इस तरह कुचलने की कोशिशों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, क्योंकि यह अभारतीय और असंवैधानिक है.

हमारे सामने सबसे कठिन और चुनौतीपूर्ण हालातों में अपना काम करने वाले साहसी पत्रकारों की अच्छी मिसालें हैं. यहां तक कि युवा रिपोर्टरों ने भी अपने पेशे को पूरी तरह से तिलांजलि नहीं दे दी है और अपना सर्वश्रेष्ठ दे रहे हैं. मैं अक्सर ऐसे नए-नए तैयार पेशेवरों के संपर्क में आता रहता हूं, जिनमें अपने चारों ओर दिख रही चीजों को लेकर गुस्सा है.

उन्होंने आपातकाल के बारे में सिर्फ अस्पष्ट रूप से सुना है और फासीवाद उनके लिए एक अनजाना विचार है. वे अतीत की या सटीक, सैद्धांतिक परिभाषाओं की परवाह नहीं करते. न ही हमें इसकी ज्यादा चिंता करनी चाहिए, जिन्होंने ज्यादा समय देखा है.

जैसा कि हम्प्टी डम्प्टी ने एलिस से कहा था, जब वह इस सोच में पड़ी थी कि क्या दुनिया को ऐसा बनाया जा सकता है कि उसके कई अर्थ निकलें : सवाल है मालिक कौन होगा, बात बस इतनी ही है.’ जो लोग संदेश पर नियंत्रण करना चाहते हैं, वे मालिक बनना चाहते हैं; लड़ने का दारोमदार उनका है, जो लोकतंत्र में यकीन करते हैं, प्रतिरोध में यकीन करते हैं, न कि समर्पण करने में.

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