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मोदी सरकार ने चार साल में मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए एक रुपया भी जारी नहीं किया

विशेष रिपोर्ट: आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए कोई राशि जारी नहीं की गई है. इससे पहले आखिरी बार 2013-14 यानी यूपीए कार्यकाल में जारी 55 करोड़ रुपये में से 24 करोड़ रुपये अभी तक खर्च नहीं हुए हैं.

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उत्तर प्रदेश के इटावा में मैला साफ करती एक मैनुअल स्कैवेंजर (फोटो: जाह्नवी सेन/द वायर)

नई दिल्ली: केंद्र में पिछले चार सालों से सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए एक रुपया भी जारी नहीं किया है. इतना ही नहीं इस सरकार ने पिछली यूपीए सरकार द्वारा जारी की गई राशि का लगभग आधा हिस्सा अभी तक खर्च नहीं किया है.

द वायर द्वारा दायर किए गए सूचना का अधिकार आवेदन में इसका खुलासा हुआ है.

भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अधीन काम करने वाली संस्था नेशनल सफाई कर्मचारी फाईनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएसकेएफडीसी)  द्वारा मुहैया कराई जानकारी के मुताबिक साल 2013-14 में यानी यूपीए कार्यकाल के दौरान, मंत्रालय द्वारा 55 करोड़ रुपये जारी किया गया था.

इसके बाद से 22 सितंबर 2017 तक मंत्रालय ने मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए ‘स्व-रोजगार योजना’ के तहत एक रुपया भी जारी नहीं किया है.

गौरतलब है कि मैला ढोने वालों का पुनर्वास सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए स्व-रोजगार योजना (एसआरएमएस) के तहत किया जाता है.

आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक इस योजना के तहत सरकार ने 2006-07 से लेकर अब तक कुल 226 करोड़ रुपये जारी किए हैं. सभी राशि वित्त वर्ष 2013-14 तक ही जारी की गई है. साल 2014 यानी जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, इस योजना के लिए कोई राशि जारी नहीं की गई है.

बता दें कि इस योजना के तहत मुख्य रूप से तीन तरीके से मैला ढोने वालों का पुनर्वास किया जाता है. इसमें ‘एक बार नकदी सहायता’ के तहत मैला ढोने वाले परिवार के किसी एक व्यक्ति को एक बार 40,000 रुपये दिया जाता है. इसके बाद सरकार मानती है कि उनका पुनर्वास कर दिया गया है.

वहीं, दूसरी तरफ मैला ढोने वालों को प्रशिक्षण देकर उनका पुनर्वास किया जाता है. इसके तहत प्रति माह 3,000 रुपये के साथ दो साल तक कौशल विकास प्रशिक्षण दिया जाता है.

इसी तरह एक निश्चित राशि तक के लोन पर मैला ढोने वालों के लिए सब्सिडी देने का प्रावधान है.

आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, 2015-16 में 8,627 लोगों को 40,000 की नगदी सहायता दी गई.

वहीं, इसी साल 365 मैनुअल स्कैवेंजर्स को सब्सिडी दी गई. इसी तरह साल 2016-17 में 1,567 लोगों को और 2017-18 में 890 लोगों 40,000 की ‘एक बार नगदी सहायता’ दी गई थी.

हालांकि सरकार के इस पुनर्वास योजना को सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित बेजवाड़ा विल्सन बिल्कुल भी पर्याप्त नहीं मानते हैं.

उनका कहना है, ‘पुनर्वास के लिए कोई व्यापक विचार नहीं है. सरकार मैला ढोने वालों को बाहर फेंकना चाहती है. ये सही योजना नहीं है. इसमें महिला सफाई कर्मचारियों की कोई गणना नहीं है. योजना के तहत सरकार लोन देती है, लेकिन लोग लोन लेने से डरते हैं कि कहीं पैसा ले लिया तो कैसे चुकाएंगे.’

उन्होंने आगे कहा, ‘सरकार कहती है बिजनेस करो, लेकिन ये कैसे बिजनेस कर सकते हैं जब समाज ने इतने सालों से इन्हें दबा के रखा है. बिजनेस करने के लिए कुछ जानकारी तो होनी चाहिए. लोन देने से बिजनेस नहीं होता है. इसके लिए ट्रेनिंग की जरूरत होती है.’

आंकड़े बताते हैं कि साल 2006-07 से लेकर साल 2017-18 के बीच में सिर्फ पांच बार ही इस योजना के तहत मंत्रालय द्वारा फंड जारी किया गया है.

हैरानी की बात ये है कि साल 2011-12 में तो एनएसकेएफडीसी को 60 करोड़ रुपये मंत्रालय को ही वापस लौटाना पड़ा था. साल 2006-07 में मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए 56 करोड़ रुपये जारी किए गए थे. वहीं, साल 2007-08 में मंत्रालय ने इस योजना के तहत 25 करोड़ की राशि जारी की गई थी.

इसके बाद साल 2008-09 में अब तक का सबसे ज्यादा 100 करोड़ रुपये भारत सरकार ने एसआरएमएस के लिए जारी किया.

आंकड़े आरटीआई से मिली जानकारी पर आधारित

आंकड़े आरटीआई से मिली जानकारी पर आधारित

हालांकि जितनी भी राशि मंत्रालय द्वारा जारी की गई है उसका भी एक अच्छा खासा हिस्सा अभी तक खर्च नहीं किया गया है. पिछले चार सालों में मंत्रालय ने एक भी राशि जारी नहीं की और जो भी राशि यूपीए के कार्यकाल में जारी किया गया था उसमें से 24 करोड़ से ज्यादा की राशि अभी तक खर्च नहीं की गई है.

आंकड़े बताते हैं कि इसी तरह साल दर साल पुनर्वास के लिए जारी किए फंड की बड़ी राशि खर्च नहीं की जा रही है. इस योजना के तहत जारी की गई राशि को नेशनल सफाई कर्मचारी फाईनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएसकेएफडीसी) के द्वारा खर्च किया जाता है.

साल 2006-07 में 56 करोड़ रुपये जारी किए गए थे लेकिन सिर्फ 10 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए और 45 करोड़ से ज्यादा की राशि उस साल बकाया रह गई. इसी तरह साल 2007-08 में 36 करोड़ रुपये खर्च नहीं किए गए. वहीं साल 2014-15 में 63 करोड़ से ज्यादा की राशि बची रह गई, उसे खर्च नहीं किया गया.

2015-16 में मैला ढोने वालों के पुनर्वास के लिए 36 करोड़ रुपये बचे रह गए, इन्हें खर्च नहीं किया गया. वहीं साल 2017-18 के लिए 24 करोड़ से ज्यादा की राशि बची हुई थी लेकिन 22 सितंबर 2017 तक एक भी राशि खर्च नहीं की गई थी.

द वायर ने एनएसकेएफडीसी और सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय दोनों जगह इस संबंध में सवालों की सूची भेजी है, हालांकि वहां से अभी तक कोई जवाब नहीं आया है. अगर कोई जवाब आता है तो स्टोरी में अपडेट कर दिया जाएगा.

मैनुअल स्कैवेंजर्स की सही गणना नहीं करने का आरोप

देश में मैला ढोने की प्रथा खत्म करने से जुड़ा पहला कानून 1993 में आया था, इसके बाद 2013 में इससे संबंधित दूसरा कानून बना, जिसके मुताबिक नाले-नालियों और सेप्टिक टैंकों की सफाई के लिए रोजगार या ऐसे कामों के लिए लोगों की सेवाएं लेने पर प्रतिबंध है.

हाल ही में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के 12 राज्यों में 53, 236 लोग मैला ढोने के काम में लगे हुए हैं. यह आंकड़ा साल 2017 में दर्ज पिछले आधिकारिक रिकॉर्ड का चार गुना है. उस समय यह संख्या 13,000 बताई गयी थी.

हालांकि यह पूरे देश में काम कर रहे मैनुअल स्कैवेंजर का असली आंकड़ा नहीं है क्योंकि इसमें देश के 600 से अधिक जिलों में से केवल 121 जिलों का आंकड़ा शामिल है.

आरोप है कि ज्यादातर राज्य मैला ढोने वालों (मैनुअल स्कैवेंजर) की सही संख्या नहीं बताते हैं. सरकार द्वारा नेशनल सर्वे में बताए 53 हजार मैनुअल स्कैवेंजर की संख्या में से राज्यों ने 6,650 को ही आधिकारिक रूप से स्वीकारा है. सबसे ज्यादा 28, 796 मैनुअल स्कैवेंजर उत्तर प्रदेश में रजिस्टर किए गए हैं.

इस पर गैरसरकारी संगठन जन सहस के निदेशक और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की सेंट्रल मॉनिटरिंग कमेटी के सदस्य आशिफ शेख ने कहा, ‘पिछले 26 सालों में, राष्ट्रीय सरकारों ने मैनुअल स्कैवेंजर्स की पहचान के लिए सात राष्ट्रीय सर्वेक्षण किए गए हैं. 1992 में किए गए एक सर्वेक्षण में पता चला की देश में 5.88 लाख मैनुअल स्कैवेंजर्स हैं. 2002-03 में यह संख्या बढ़कर 6.76 लाख हो गई. बाद में मंत्रालय द्वारा संशोधित करने के बाद ये संख्या लगभग आठ लाख (7,70,338) तक पहुंच गई.’

उन्होंने आगे कहा, ‘विडंबना यह है कि 2013 के राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण में यह संख्या चमत्कारिक रूप से कुछ हजारों तक पहुंच गई, केवल 13,639 थी. मैनुअल स्कैवेंजर्स की गणना के लिए किया गया हर एक सर्वेक्षण बहुत ही खराब रहा है.’

सरकार का मानना है कि मैनुअल स्कैवेंजर का मुख्य कारण इनसैनिटरी या सूखे शौचालय हैं. 2013 में बनाए गए कानून ‘मैनुअल स्कैवेंजर्स के रुप में रोजगार का निषेध और उनके पुनर्वास अधिनियम 2013’ की धारा 5 के मुताबिक सूखे शौचालयों का निर्माण करना अवैध है.

बता दें कि 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में 26 लाख से ज्यादा परिवारों में अलग-अलग प्रकार के सूखे शौचालय हैं. इसमें से सात लाख 94 हजार परिवारों में ऐसे शौचालय हैं, जिसके मल को हाथ से साफ करना पड़ता है. सबसे ज्यादा पांच लाख 58 हजार सूखे शौचालय उत्तर प्रदेश में हैं.

गुजरात जैसे राज्यों ने अभी तक ये नहीं माना है कि उनके यहां मैनुअल स्कैवेंजर हैं, जबकि गुजरात में 32,690 सूखे शौचालय हैं. राजधानी दिल्ली में भी 69,640 इस तरह के शौचालय हैं.

बेजवाड़ा विल्सन कहते हैं, ‘इस सरकार का सफाई कर्मचारियों से कोई लेनादेना नहीं है. इनका शौचालय बनाना शौक है. मैनुअल स्कैवेंजर्स कई शताब्दी से इस समाज का मल अपने सिर पर रखकर ढो रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी बहुत ज्यादा मन की बात करते हैं लेकिन आज तक उनकी मन के बात में सफाईकर्मियों का जिक्र नहीं आया.’

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