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मोदी सरकार किसानों का विश्वास क्यों नहीं जीत पा रही है?

किसानों को फंसाने के लिए मोदी सरकार भले ही बड़ी-बड़ी योजनाएं घोषित कर दे, लेकिन उन पर ईमानदारी से अमल नहीं करती. 2022 तक उनकी आय दोगुनी करने का वादा हो या फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों से भी ज़्यादा करने का दावा, इस बात की नज़ीर हैं.

New Delhi: Police use water cannons to disperse farmers protesting at Delhi-UP border during 'Kisan Kranti Padyatra' in New Delhi on Tuesday, Oct 2, 2018. (PTI Photo/Ravi Choudhary)(PTI10_2_2018_000101B)

बीते दो अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर किसान क्रांति पदयात्रा के दौरान दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर जुटे किसानों पुलिस वाटर कैनन और आंसू गैस के गोले छोड़े. (फोटो: पीटीआई)

केंद्र सरकार अपने कार्यकाल के आखिरी साल में भी बार-बार यह कहते नहीं थक रही कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 2022 तक किसानों की आय दो गुनी करने का वायदा निभाने को लेकर पूरी तरह गंभीर है.

गत बुधवार को उसने रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों का ऐलान किया तो भी यह दावा करने से नहीं चूकी कि खरीफ के बाद उसने इन फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में भी एमएस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से आगे बढ़कर भारी वृद्धि कर दी है, जिससे किसानों का मालामाल होना तय है.

इसके बावजूद न उसकी रीति-नीति से किसानों की शिकायतें कम हो रही हैं, न ही असंतोष. उलटे उनकी नाराजगी इतनी बढ़ गयी है कि गत किसान क्रांति पदयात्रा के तहत हरिद्वार से दिल्ली कूच के दौरान गृहमंत्री राजनाथ सिंह उन्हें मनाने पहुंचे तो उन्होंने उनकी ओर जूता उछालने तक से परहेज नहीं किया. इस परिदृश्य से साफ है कि इस सरकार ने अब तक और चाहे जितनी उपलब्धियां हासिल की हों, देश के अन्नदाताओं का विश्वास नहीं जीत पायी है.

किसानों की मानें तो इसका एक बड़ा कारण यह है कि सरकार किसानों से अपनों की तरह पेश ही नहीं आती. वह जिस पार्टी का प्रतिनिधित्व करती है, चूंकि उसमें किसानों की सार्थक चिंता की कोई ऐसी परंपरा भी नहीं रही है, इसलिए वह उसकी ओर से किसान हितकारी होने का कोई सांगठनिक दबाव भी महसूस नहीं करती.

यही कारण है कि किसानों को पटाने (पढ़िये: फंसाने) के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं भले ही घोषित कर दे, उन पर ईमानदारी से अमल नहीं करती. उसका 2022 तक उनकी आय दोगुनी करने का वादा हो या फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से भी ज्यादा बढ़ाने का दावा, दोनों इसी की नजीर हैं.

प्राकृतिक आपदाओं के कहर से किसानों की सुरक्षा के नाम पर चलाई जा रही फसलों के बीमे की सरकारी योजना के बारे में तो यह जगजाहिर ही है कि वह किसानों के बजाय बीमा कम्पनियों का भला कर रही है, उनकी आय दो गुनी करने की बात करती हुई भी यह सरकार चालाकी से यह बताने से मना कर देती है, कि ऐसा करने के लिए वह किसानों की किस वर्ष की आय को आधार मानेगी?

इसी तरह फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में लागत के डेढ़ गुने से भी ज्यादा वृद्धि के उसके दावे का सच यह है कि फसलों की लागत-गणना की उसकी पद्धति ही किसान विरोधी है क्योंकि उसमें उनके श्रम की लागत के वस्तुनिष्ठ आकलन की ओर से आंखें मूंद ली गई हैं.

तभी तो उसके पास कृषि विशेषज्ञ विजय सरदाना के इस सवाल का कोई तर्कसंगत जवाब नहीं है कि जब उसने चार साल पहले सर्वोच्च न्यायालय में दिये अपने हलफनामे में कहा था कि वह किसानों को फसलों की लागत के 50 फीसदी से ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य दे ही नहीं सकती तो अब 150 फीसदी देने का ‘चमत्कार’ कैसे कर रही है?

New Delhi: An elderly farmer clashes with police personnel during a protest at Delhi-UP border during 'Kisan Kranti Padyatra' in New Delhi, Tuesday, Oct 2, 2018. (PTI Photo/Ravi Choudhary) (PTI10_2_2018_000112A)

बीते दो अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर किसान क्रांति पदयात्रा के दौरान दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर पुलिसवालों और एक बूढ़े किसान के बीच संघर्ष. (फोटो: पीटीआई)

गत दो अक्टूबर को किसानों के ‘दिल्ली कूच’ से निपटने का सरकार का तरीका भी कुछ कम शातिर नहीं था.

उस रोज जब दुनिया भारत को किसानों का देश कहने वाले महात्मा गांधी की याद में विश्व अहिंसा दिवस मना रही थी, किसान अपने ही देश की राजधानी में प्रवेश के लिए पुलिस की लाठियां झेलने को अभिशप्त थे, जबकि प्रधानमंत्री कई अन्य ‘जरूरी’ कामों में व्यस्त थे.

वैसे भी उनकी प्राथमिकताओं में किसानों का मुद्दा उनके स्वच्छता अभियानों के काफी बाद रहता आया है, तिस पर उन्हें अगले ही दिन संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस से ‘चैम्पियन आॅफ द अर्थ अवॉर्ड’ लेना था.

ऐसे में स्वाभाविक ही सरकारी अमले ने किसानों के कूच को ऐसे निपटाया जैसे कहना चाहता हो कि ये किसान भी वक्त-बे-वक्त नहीं देखते और जब भी मन होता है, अपनी मांगें लेकर हाजिर हो जाते हैं.

तभी तो कृषिमंत्री उनसे मिलने ही नहीं आए और कृषि राज्यमंत्री ने कुछ मांगें पूरी करने के आश्वासन दिये तो कुछ की बाबत खामोशी अख्तियार किये रखी. फिर दिल्ली पुलिस ने आधी रात बैरीकेड हटाकर किसानों को किसान घाट व राज घाट पर फूल चढ़ाने की इजाजत दे दी, ताकि सरकार की सदाशयता में उनका भरम एकदम से खत्म होकर न रह जाये.

कौन जाने इस भरम का आगे क्या हुआ, लेकिन ज्यादातर किसानों को अभी भी पता नहीं चला है कि उनका कर्ज माफ होगा या नहीं, गन्ने का बकाया भुगतान होगा या नहीं, नलकूप चलाने के लिए मुफ्त बिजली मिलेगी या नहीं और छोटे किसानों को 60 साल की उम्र के बाद पेंशन मिलेगी या नहीं.

अलबत्ता, ये पंक्तियां लिखने तक वे अपनी तमाम मांगों व परेशानियों के साथ लौटा दिये गये हैं और दिल्ली में जनजीवन ‘सामान्य’ हो गया है.

क्या आश्चर्य कि अब आम किसान सरकार को इस बाबत संदेह का भी लाभ नहीं देते कि उसका ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा सिर्फ झांसा है और उसके निकट विकास का वास्तविक अर्थ उद्योगपतियों का विकास ही है.

इसलिए कभी उनके कर्ज माफ हो जाते हैं, कभी बैंकों के एनपीए में तब्दील कर दिये जाते हैं और कभी उनके लगाये हजारों करोड़ के चूने की ओर से ऐसे आंख मूंद ली जाती है कि वे वित्तमंत्री को बताकर देश से भाग जाने में सफल हो जाते हैं.

तिस पर प्रधानमंत्री के मुताबिक, तेजी से ‘न्यू इंडिया’ में बदलने जा रहे आज के भारत की एक बड़ी विडम्बना यह भी है कि उसके अमर्यादित धन व शक्ति से संपन्न उच्च मध्यवर्गों के लोग जीडीपी के बनावटी आंकड़े देखकर खुश होते हैं तो किसानों के हालात सुधारने पर नहीं, इस पर विचार करते है कि अयोध्या में ‘वहीं’ मंदिर कब बनेगा?

हां, कभी-कभार उन्हें रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों में की गई घट-बढ़, रुपये के डॉलर के मुकाबले 73 के पार हो जाने और पेट्रोल-डीजल के दामों के संभावित शतक आदि की भी चिंता होती है.

उन्हीं जैसे बनने की चाह रखने वाले निम्न मध्यवर्ग को भी अब किसानों की फिक्र नहीं ही होती. किसानी घाटे का सौदा है तो रहे और किसान आत्महत्या करते हैं तो किया करें.

भले ही राजनीतिक दलों के लिए किसान अभी भी वोट हासिल करने का माध्यम हैं और उनके प्रायः हर चुनाव के घोषणापत्रों में किसानों की बात शामिल होती है, उनके वोट बटोरकर सत्तासीन सरकारें इस समझदारी तक पहुंचते-पहुंचते उम्र गंवा बैठती हैं कि सरकारी टीवी पर रंगीन किसान चैनल शुरू होने भर से किसानों के जीवन में नये रंग नहीं भर जाते.

हाल के वर्षों में आपराधिक सरकारी उपेक्षा के चलते उनका जीवन पहले से ज्यादा बेनूर व बेरंग हो गया है, तो वे बार-बार सड़कों पर उतर रहे हैं और कभी पुलिस की लाठियां तो कभी गोलियां झेल रहे हैं.

पिछले साल मध्यप्रदेश के मंदसौर में उनपर पुलिस फायरिंग से 6 मौतों के बावजूद यह सिलसिला टूटा नहीं है और दिल्ली में जंतर-मंतर से लेकर रामलीला मैदान तक वे लगातार इकठ्ठे होते और आवाज उठाते रहे हैं.

इसी साल मार्च में लगभग 30 हजार किसानों ने महाराष्ट्र में नासिक से मुंबई तक यात्रा भी निकाली थी. उनकी रैलियों व आंदोलनों के हर अवसर पर कोई न कोई सरकारी नुमांइदा उन तक पहुंचता और किसी तरह समझा बुझाकर उन्हें वापस भेज देता रहा है.

ऐसे में यह विश्वास करने के कारण है कि अब, देश के चुनाव वर्ष में, जब सरकार नई-नई लोकलुभावन घोषणाओं की तैयारी में है और विपक्षी दल उसे कठघरे में खड़ी करने की रणनीतियां बना रहे हैं, कम से कम जागरूक किसान तो चुप होकर अपने घरों में नहीं ही बैठे रहने वाले.

उन्होंने सरकार से कह भी दिया है कि तय समय सीमा में उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वह उनके अगले आंदोलन के लिए तैयार रहे. अगर सरकार चाहती है कि उसे फिर से किसान असंतोष का सामना न करना पड़े तो उनके प्रति शातिराने व सोतेलेपन से बाज आना होगा.

इस स्थिति को और चलने देना खुद उसके भी हित में नहीं कि जो किसान सवा अरब से ज्यादा देशवासियों के पेट भरने में एड़ी चोटी का पसीना एक करते रहते हैं, उनके लिए सारे के सारे मौसम फांसियों के ही बने रहें.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)

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