भारत

मज़दूरों के लिए आवंटित धन का कहीं और इस्तेमाल होने से शीर्ष अदालत हैरान

देशभर के निर्माण क्षेत्र में लगे मज़दूरों के कल्याण के लिए जारी 26 हज़ार करोड़ रुपये की रकम में से पांच हज़ार करोड़ रुपये का अता-पता नहीं.

Supreme Court PTI

(फोटो: पीटीआई)

देश में निर्माण कार्यों के मज़दूरों के कल्याण के लिए निर्धारित रकम का कहीं और इस्तेमाल होने पर उच्चतम न्यायालय ने हैरानी जताई है. यह रकम देश के निर्धनतम लोगों के कल्याण के लिए थी.

शीर्ष अदालत ने बुधवार को टिप्पणी की कि इस बारे में कोई रिकॉर्ड नहीं है कि करीब 26 हजार करोड़ रुपये की धनराशि में से पांच हजार करोड़ रुपये कैसे ख़र्च किए गए. न्यायालय ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक को इस मामले में दो हफ्ते के भीतर आॅडिट रिपोर्ट दाख़िल करने का निर्देश दिया है.

न्यायमूर्ति मदन बी. लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल मनिंदर सिंह से कहा, 26000 करोड़ रुपये में से पांच हजार करोड़ रुपये ख़र्च किए गए हैं. हमें नहीं मालूम यह धन कहां ख़र्च हुआ. आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि यह धन चाय या भोजन पर ख़र्च न हो.

पीठ ने कहा, इसमें बहुत अधिक रकम शामिल है. यह रकम देश के गरीब से गरीब लोगों तक पहुंचना था. यह कहीं और ही जा रहा है. यह बहुत ही महत्वपूर्ण मामला है. यह धन गरीब से गरीब लोगों तक पहुंचना चाहिए.

सिंह ने पीठ से कहा कि यह धन राज्य सरकारों के पास है और ऐसा नहीं है कि यह रकम गायब हो गई है. शीर्ष अदालत ने हालांकि टिप्पणी की कि जो कुछ बताया गया वो चौंकाने वाला है और केंद्र को इस स्थिति से निपटने के लिए समाधान खोजना चाहिए.

पीठ ने कहा, जो कुछ भी हमें बताया गया वह बहुत ही चौंकाने वाला है. आपको समाधान खोजना होगा. यह 26 हजार करोड़ रुपये का मामला है.

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंज़ालवेज़ ने दावा किया कि इस धनराशि में से एक बड़ा हिस्सा हस्तांतरित किया जा चुका है और इसका इस्तेमाल दूसरे कार्यों में हो रहा है.

पीठ ने न्यायालय में मौजूद नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक के एक अधिकारी से जानना चाहा, मोटे तौर पर कितनी रकम होगी. इस पर अधिकारी ने कहा कि यह तकरीबन 28 हज़ार करोड़ रुपये होगी.

शीर्ष अदालत ने जब ख़र्च किए जा चुके पांच हजार करोड़ रुपये के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, हम इस पर काम करेंगे और अपनी आॅडिट रिपोर्ट देंगे. इसके साथ ही न्यायालय ने इस मामले में अगली तारीख़ पांच मई निर्धारित कर दी.

कैग ने इससे पहले न्यायालय को सूचित किया था कि वह निर्माण मज़दूरों के कल्याण के निमित्त धन के आॅडिट के बारे में ताज़ा स्थिति पर एक हलफनामा दाख़िल करेगा.

शीर्ष अदालत ने 2015 में केंद्र और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा 27 हजार करोड़ रुपये की इस धनराशि का उपयोग नहीं करने पर अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा था कि इससे बुरा और कुछ नहीं हो सकता.

न्यायालय नेशनल कैंपेन कमेटी फॉर सेंट्रल लेजिस्लेशन आॅन कंस्ट्रक्शन लेबर नाम के गैर सरकारी संगठन की याचिका पर सुनवाई कर रहा है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि रियल स्टेट फर्मों से मज़दूरों के कल्याण के लिए वसूले जाने वाले कर (सेस) को उचित तरीके से ख़र्च नहीं किया जा रहा है क्योंकि ऐसा कोई तंत्र नहीं है जिससे लाभार्थियों की पहचान हो सके.

इससे पहले न्यायालय ने हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली सरकार से इस संबंध फर्मों से टैक्स के रूप में ली गई रकम और उनके उपयोग के बारे में दो हफ्ते के भीतर शपथ पत्र दाख़िल करने के लिए कहा था.

सुनवाई के दौरान बताया गया कि भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक कल्याण सेस अधिनियम के तहत हरियाणा में 1314.86 करोड़ रुपये की रकम वसूली गई. इसमें से 52 करोड़ रुपये की राशि ख़र्च की गई लेकिन यह किस मद में ख़र्च की गई, इसका पता नहीं चल सका.

एमिकस क्यूरी ने अदालत को बताया कि राजस्थान ने 588 करोड़ रुपये की रकम बतौर कल्याण राशि वसूली गई. इसमें से 59.45 करोड़ रुपये की रकम ख़र्च की गई. हालांकि किस मद में ख़र्च की गई इसकी जानकारी नहीं थी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)