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सीबीआई विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, सरकार की कार्रवाई जांच एजेंसी के हित में होनी चाहिए

कोर्ट ने कहा कि ऐसा नहीं है कि आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच झगड़ा रातोंरात सामने आया, जिसकी वजह से सरकार को चयन समिति से परामर्श के बगैर ही निदेशक के अधिकार वापस लेने को विवश होना पड़ा हो. सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा मामले की सुनवाई पूरी. फैसला बाद में सुनाया जाएगा.

नरेंद्र मोदी और आलोक वर्मा. (फोटो: पीटीआई/फेसबुक)

नरेंद्र मोदी और आलोक वर्मा. (फोटो: पीटीआई/फेसबुक)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने छुट्टी पर भेजे गए सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा मामले की सुनवाई गुरुवार को पूरी कर ली. इस मामले में फैसला बाद में सुनाया जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट वर्मा को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक के अधिकारों से वंचित कर छुट्टी पर भेजने को लेकर मोदी सरकार के निर्णय के खिलाफ उनकी याचिका पर सुनवाई कर रही थी.

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसफ की पीठ ने इस मामले में आलोक वर्मा, केंद्र, केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) और अन्य पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद कहा कि इस पर फैसला बाद में सुनाया जाएगा.

कोर्ट ने सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना सहित जांच एजेंसी के अनेक अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच शीर्ष अदालत की निगरानी में विशेष जांच दल से कराने के लिए गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की याचिका पर भी सुनवाई की.

इसके अलावा, पीठ ने लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे और राकेश अस्थाना का पक्ष भी सुना.

आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं. इन दोनों के बीच लड़ाई तेज होने पर सरकार ने केंद्रीय सतर्कता आयोग की सिफारिश पर वर्मा को निदेशक के अधिकारों से वंचित करते हुए छुट्टी पर भेज दिया था.

सीवीसी ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि असाधारण स्थिति के लिए असाधारण उपाय जरूरी है. सतर्कता आयोग ने आलोक वर्मा को केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक के अधिकारों से वंचित कर छुट्टी पर भेजने के केंद्र के फैसले के खिलाफ उनकी याचिका पर सुनवाई के दौरान यह दलील दी.

सीवीसी की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत के फैसलों और सीबीआई को संचालित करने वाले कानूनों का जिक्र किया और कहा कि सीबीआई पर आयोग की निगरानी के दायरे में इससे जुड़ी आश्चर्यजनक और असाधारण परिस्थितियां भी आती हैं.

इस पर पीठ ने कहा कि अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने उसे बताया था कि जिन परिस्थितियों में ये हालात पैदा हुए उनकी शुरुआत जुलाई में ही हो गई थी. पीठ ने कहा, ‘सरकार की कार्रवाई के पीछे की भावना संस्थान (सीबीआई) के हित में होनी चाहिए.’

शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसा नहीं है कि सीबीआई निदेशक और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच झगड़ा रातोंरात सामने आया जिसकी वजह से सरकार को चयन समिति से परामर्श के बगैर ही निदेशक के अधिकार वापस लेने को विवश होना पड़ा हो.

उसने कहा कि सरकार को निष्पक्षता रखनी होगी और उसे सीबीआई निदेशक से अधिकार वापस लेने से पहले चयन समिति की सलाह लेने में क्या मुश्किल थी. मुख्य न्यायाधीश ने सीवीसी से यह भी पूछा कि किस वजह से उन्हें यह कार्रवाई करनी पड़ी क्योंकि यह सब रातोंरात नहीं हुआ.

मेहता ने कहा कि सीबीआई के शीर्ष अधिकारी मामलों की जांच करने के बजाय एक दूसरे के खिलाफ मामलों की तफ्तीश कर रहे थे.

उन्होंने कहा कि सीवीसी के अधिकार क्षेत्र में जांच करना शामिल है, अन्यथा वह कर्तव्य में लापरवाही का दोषी होगा. अगर उसने कार्रवाई नहीं की होती तो राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के प्रति वह जवाबदेह होता.

उन्होंने कहा कि सरकार ने सीबीआई निदेशक के खिलाफ जांच के लिए मामला उसके पास भेजा था. मेहता ने कहा, ‘सीवीसी ने जांच शुरू की लेकिन वर्मा ने महीनों तक दस्तावेज ही नहीं दिए.’

राकेश अस्थाना की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने शीर्ष अदालत से कहा कि इस मामले में वह तो व्हिसिल-ब्लोअर थे परंतु सरकार ने उनके साथ भी एक समान व्यवहार किया.

उन्होंने कहा कि सरकार को वर्मा के खिलाफ केंद्रीय सतर्कता आयोग को जांच को अंतिम नतीजे तक ले जाना चाहिए.

आलोक वर्मा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता फली नरीमन ने कहा कि केंद्र के आदेश ने उनके सारे अधिकार ले लिए. उन्होंने कहा कि सामान्य उपबंध कानून की धारा 16 भी इस बिन्दु के बारे में है कि सीबीआई निदेशक जैसे अधिकारी को कौन हटा सकता है परंतु यह अधिकारी को उसके अधिकारों से वंचित करने के बारे में नहीं है.

आलोक वर्मा के अभी भी जांच एजेंसी का निदेशक होने संबंधी अटॉर्नी जनरल की दलील के संदर्भ में नरीमन ने कहा, ‘अधिकारी के पास निदेशक के अधिकार होने चाहिए. दो साल के कार्यकाल का यह मतलब नहीं कि निदेशक बगैर किसी अधिकार के सिर्फ पद के साथ विजिटिंग कार्ड रख सकता है.’

बता दें कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं.

हवाला और मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में मीट कारोबारी मोईन क़ुरैशी को क्लीनचिट देने में कथित तौर पर घूस लेने के आरोप में सीबीआई ने अपने ही विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज किया. अस्थाना पर आरोप है कि उन्होंने मोईन क़ुरैशी मामले में हैदराबाद के एक व्यापारी से दो बिचौलियों के ज़रिये पांच करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी थी.

जिसके बाद राकेश अस्थाना ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पर ही इस मामले में आरोपी को बचाने के लिए दो करोड़ रुपये की घूस लेने का आरोप लगाया. दोनों अफसरों के बीच मची रार सार्वजनिक हो गई तो केंद्र सरकार ने दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया. साथ ही अस्थाना के ख़िलाफ़ जांच कर रहे 13 सीबीआई अफसरों का भी तबादला कर दिया गया था.

सुप्रीम कोर्ट ने बीते 26 अक्टूबर को केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) से कहा था कि सुप्रीम कोर्ट जज की निगरानी में वह निदेशक आलोक वर्मा के ख़िलाफ़ लगाए गए आरोपों की जांच दो हफ्ते में पूरी करे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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