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मिज़ोरम विधानसभा चुनाव के नतीजे कांग्रेस के साथ भाजपा के लिए भी सबक हैं

मिज़ोरम में भाजपा पहली बार अपना खाता खोलने के साथ अपने कांग्रेस-मुक्त पूर्वोत्तर के राजनीतिक मिशन में कामयाब तो हुई, लेकिन राज्य के ईसाई बहुल मतदाताओं ने उसे पूरी तरह नकार दिया.

Zoramthanga Twitter

मिज़ोरम के राज्यपाल के. राजशेखरन के साथ जोरामथांगा (फोटो साभार: twitter/@Kummanam)

मिज़ोरम विधानसभा चुनाव परिणाम पहली एक बार त्रिकोणीय आया है, लेकिन सत्ता परिवर्तन परंपरागत द्वि-दलीय ही रहा है. राज्य में हर दस साल में सत्तारूढ़ दल को बदलने की प्रवृति इस बार भी कायम रही हैं.

वैसे राज्य में पिछले 30 साल के चुनावी इतिहास में मतदाताओं ने न तो खंडित जनादेश दिया और न ही किसी भी सत्ताधारी दल को लगातार तीसरी बार सत्ता के लिए बहुमत दिया. यही परंपरा इस बार भी रही हैं. हालांकि इस बार के चुनाव परिणाम कई मायने में अलग भी हैं.

पहली बार राज्य में 7 दलों का क्षेत्रीय गठबंधन जोरम पीपुल्स मूवमेंट (जेडपीएम) ने 8 सीट पर जीत दर्ज कर 10 साल से सत्तारूढ़ कांग्रेस को तीसरे स्थान पर धकेल दिया. क्षेत्रीय पहचान की विचारधारात्मक राजनीति करने वाली मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) पार्टी दस साल बाद 40 में से 26 सीटों के साथ सत्ता में वापसी की हैं.

राज्य में पहली बार भाजपा जो 1993 से चुनाव लड़ रही थी, ने एक सीट के साथ विधानसभा में खाता खोल लिया. कांग्रेस 2013 में 34 सीट के साथ सत्ता में लगातार दूसरी बार आयी थी वो इस बार 5 सीट पर सिमट गई.

अपने 40 साल के राजनीतिक सफर में लालथनहवला दो बार चुनाव हारे हैं, पहली बार 1998 और दूसरी बार 2018, यह एक संयोग ही है कि जब-जब भी कांग्रेस चुनाव हारी, तब-तब वे भी मुख्यमंत्री रहते हुए चुनाव हारे हैं.

राजधानी आईजोल शहर की 11 व इस जिले की कुल 13 सीटों में से कांग्रेस को इस बार एक भी नहीं मिली. उत्तर-मिज़ोरम में कांग्रेस को मात्र एक सीट मिली. अल्पसंख्यक चकमा क्षेत्र की 2 सीट में से कांग्रेस व भाजपा को एक-एक सीट मिली हैं.

यह जानकर रोचक लगता है ये दोनों सीट चकमा स्वायत्त जिला परिषद में आती है, जहां इसी साल जुलाई में भाजपा व कांग्रेस ने साझा-सरकार भी बनायी थे. कांग्रेस- भाजपा के इस प्रकार की राजनीति की देशभर में खूब चर्चा हुई थी.

हालांकि राज्य के चर्च संगठनों ने इस पर नाराजगी प्रकट की थी. कांग्रेस के नेता व सत्ता से बाहर हुए मुख्यमंत्री लालथनहवला ने इसको अपनी और पार्टी की हार का एक कारण भी माना हैं. इस बार लालथनहवला खुद भी दो सीट से चुनाव हार गये.

चुनावों से एक-दो महीने पहले बना 7 दलों का क्षेत्रीय गठबंधन जेडपीएम के नेता ललदूहोमा जो 15 साल बाद दो सीटों से चुनाव जीते हैं. एमएनएफ के नेता व पूर्व मुख्यमंत्री जोरामथांगा ने भी दस साल बाद इस बार दो सीट से चुनाव जीते है.

त्रिपुरा के शरणार्थी शिविरों से 20 साल बाद पहली बार ब्रू-समुदाय के हजारों मतदाता मिज़ोरम में मतदान करने आये, उनके प्रभाव वाली एक सीट से भाजपा को जीतने की उम्मीद थी लेकिन निराशा हुई, इन दोनों सीट पर कांग्रेस व एमएनएफ ने एक-एक जीती है. दक्षिण मिज़ोरम में कांग्रेस को 4 सीटों पर ही जीत मिली हैं.

उत्तर-पूर्व लोकतांत्रिक गठबंधन (नेडा) के तीन सहयोगी दल- भाजपा, एमएनएफ और मेघालय में सत्तारूढ़ नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था, लेकिन पहली बार चुनाव लड़ने वाले एनपीपी को मिज़ोरम में एक भी सीट नहीं मिली.

कांग्रेस छोड़कर एमएनएफ और भाजपा में शामिल हुए 5 वरिष्ठ नेताओं में से 3 को जीत मिली हैं. इनमें कांग्रेस के पूर्व उपाध्यक्ष व गृहमंत्री रहे श्री लालजिरलिआना, पूर्व मंत्री बीडी चकमा व एक विधायक श्री लालरिआना साइलो शामिल हैं.

चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए बीडी चकमा ने भाजपा को राज्य में पहली बार जीत दिलायी हैं, लेकिन भाजपा को राज्य के दक्षिण में मारा-जनजातीय क्षेत्र की 2 सीट में से एक सीट पर जीत दर्ज करने की उम्मीद को धक्का लगा हैं.

मिजोरम में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की एक रैली (फोटो साभार: twitter/@AmitShah

मिजोरम में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की एक रैली (फोटो साभार: twitter/@AmitShah)

इस क्षेत्र की प्रभावशाली पार्टी मारा डेमाक्रेटिक फ्रंट-एमडीएफ का इसी साल भाजपा में विलय हुआ था और विधानसभा स्पीकर, जो मारा जनजातीय समुदाय के प्रभावशाली नेता भी हैं, भाजपा से चुनाव लड़ें लेकिन उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी  के हाथों हार का सामना करना पड़ा.

भाजपा ने राज्य की 40 में से 39 सीट पर उम्मीदवार उतारे थे. काफी जोर-शोर से चुनावी प्रचार भी किया था. राज्य में इस बार भाजपा ने अल्पसंख्यक समुदाय- चकमा व जनजातीय समुदाय ब्रू व मारा को अपने पक्ष में ध्रुवीक्रत करने की कोशिश की थी लेकिन भाजपा को इस ध्रुवीकरण से ज्यादा फायदा नहीं हुआ.

मिज़ोरम में भाजपा पहली बार अपना खाता खोलने के साथ-साथ अपने ‘कांग्रेस-मुक्त पूर्वोत्तर’ चुनावी राजनीतिक मिशन में कामयाब हो गयी, लेकिन राज्य के ईसाई बहुल मतदाताओं ने भाजपा को पूरी तरह से नकार दिया. पूर्वोत्तर के 8 राज्यों में कांग्रेस की एकमात्र सरकार मिज़ोरम में थी, जो मिज़ोरम के नतीजों के साथ ही कांग्रेस के हाथ से निकल गई.

कांग्रेस के नेता व मुख्यमंत्री लालथनहवला को पार्टी में परिवारवाद को बढ़ावा देने और दूसरे नेताओं की पार्टी में उपेक्षा होने को पार्टी कार्यकर्ताओं एवं मतदाताओं ने सही नहीं माना. लालथनहवला 77 साल के हो गये हैं और अब पार्टी की कमान अपने छोटे भाई को देने की राजनीतिक कयास को शहरी व युवा मतदाताओं ने गंभीरता से लिया.

राज्य के युवा व शहरी वर्ग के मतदाताओं के साथ-साथ कांग्रेस नेताओं में लालथनहवला व पार्टी के प्रति मोहभंग होने तथा शहरी क्षेत्रों में करारी हार होने में यह भी एक कारण रहा.

पिछली बार कांग्रेस ने आईजोल जिले की 13 में से 10 सीट जीती थी. इस बार इन सीट पर युवा, तटस्थ व नए मतदाता वर्ग में जेडपीएम के पक्ष में जोरदार हवा होने के कारण कांग्रेस की ऐतिहासिक हार हुई. राज्य में 2008 से कांग्रेस की सरकार थी, लेकिन आईजोल नगर निगम में एमएनएफ का कब्जा है.

मिजोरम में कांग्रेस की एक चुनावी रैली (फोटो साभार: ट्विटर/कांग्रेस)

मिजोरम में कांग्रेस की एक चुनावी रैली (फोटो साभार: ट्विटर/कांग्रेस)

इस बार कांग्रेस ने 10 नए चेहरों को इन चुनावों में उतारा था, लेकिन ये नए चेहरे भी इस बार पार्टी को शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी करारी हार से नहीं बचा पाये. एमएनएफ को कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का पूरा फायदा हुआ.

शहरी, युवा व तटस्थ मतदाताओं ने खासकर आईजोल में चुनाव से पहले 7 दलों का नए क्षेत्रीय गठबंधन-जेडपीएम को कांग्रेस व एमएनएफ की जगह एक विकल्प के तौर पर चुना हैं.

राज्य के शहरी क्षेत्रों के मतदाताओं ने इन दोनों प्रतिद्वंद्वी दलों की सरकारों के शासन व राजनीति को देखा है, शायद इसलिये इस बार तीसरे विकल्प के रूप में जेडपीएम को भरपूर समर्थन मिला और यह एक नए, तीसरे विकल्प के तौर पर उभरा.

आईजोल शहर की 11 में से 6 सीट पर जेडपीएम को जीत मिली, लेकिन ग्रामीण मतदाताओं ने इस तीसरे विकल्प को स्वीकार नहीं किया. कांग्रेस को 10 साल की सरकार के दौरान किए गए विकास कार्यो का फल नहीं मिला.

इस बार राज्य में और पहली बार मिज़ोरम विश्वविद्यालय के 6 प्रोफेसर ने एमएनएफ पार्टी से चुनाव जीता हैं. आइजोल फुटबाल क्लब के मालिक रॉबर्ट रोमोया ने भी एमएनएफ पार्टी से चुनाव जीता.

राज्य में महिला मतदाता पुरुष मतदाताओं से ज्यादा होने के बावजूद भी इस बार एक भी महिला प्रत्याशी चुनाव नहीं जीत पायी. इस बार कुल 209 प्रत्याशियों में 15 महिलाएं थी. 27 साल बाद राज्य में 2014 के एक सीट के उपचुनाव में पहली महिला ने विधानसभा का चुनाव जीता था.

राज्य में बेरोजगारी, खराब सड़कें, सत्ता विरोधी लहर, क्षेत्रीय पहचान की राजनीतिक विचारधारा बनाम हिंदू राष्ट्र विचारधारात्मक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे व कारक चुनावी राजनीति में प्रभावी रहे.

(सुवालाल जंगु मिज़ोरम विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं.)