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केंद्रीय विद्यालयों में ‘हिंदू प्रार्थनाओं’ के ख़िलाफ़ याचिका को संविधान पीठ के पास भेजा

सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में केंद्रीय विद्यालयों में होने वाली प्रार्थनाओं पर हिंदू धर्म से जुड़े होने का आरोप लगाते हुए कहा गया है कि बच्चों की आस्था और विश्वास का ख़्याल किए बिना इन्हें थोपा जा रहा है.

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय विद्यालयों में सुबह की प्रार्थना सभा में बच्चों को हिंदी और संस्कृत में प्रार्थना करवाए जाने के खिलाफ दायर जनहित याचिका को सुनवाई के लिए संविधान पीठ के पास भेज दिया है. शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया है कि याचिका पर उचित पीठ के गठन के लिए मामले को चीफ जस्टिस के सामने रखा जाएगा.

इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार, ‘मध्य प्रदेश के एक वकील वीनायज शाह द्वारा दायर याचिका में केंद्रीय विद्यालयों में होने वाली प्रार्थनाओं को हिंदू धर्म पर आधारित बताया गया है और कहा गया है कि इसे बच्चों पर उनकी आस्था और विश्वास का ख़्याल किए बना थोपा जा रहा है.

2013 में लागू हुए केंद्रीय विद्यालयों के संशोधित शिक्षा संहिता के अनुसार, सुबह की सभा में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति अनिवार्य होती है, जहां उन्हें प्रार्थनाओं का पाठ करना होता है.

याचिका में यह भी बताया गया है, ‘प्रार्थना संस्कृत और हिंदी में करवाई जाती है और छात्र-छात्राओं को उनकी आस्था और विश्वास के बावजूद अपनी आंखें बंद करके और हाथ जोड़कर प्रार्थना को सम्मानजनक तरीके से करना होता है. सभी शिक्षक इस प्रार्थना सभा की निगरानी करते हैं और यह सुनिश्चित किया जाता है कि हर बच्चा अपना हाथ जोड़े रहे और आंखों को बंद किए रहे.

याचिका में यह भी आरोप लगाया है, ‘अगर कोई भी बच्चा ऐसा नहीं करता है तो उसे पूरे विद्यालय के सामने दंडित और अपमानित किया जाता है.’

शाह ने याचिका में प्रार्थनाओं का हवाला दिया और बताया है कि इन प्रार्थनाओं को पूरे देश के सभी स्कूलों में लागू किया जा रहा है. जिसकी वजह से अल्पसंख्यक समुदायों सहित नास्तिक, तर्कवादी व अन्य (जो प्रार्थना की इस प्रणाली से सहमत नहीं हैं) के माता-पिता और बच्चों के लिए यह संवैधानिक रूप से अनुचित हैं.’

याचिका में दावा किया गया है कि प्रार्थनाओं का अध्ययन से पता चलता है कि यह हिंदू धर्म पर आधारित है और यह अन्य धार्मिक/गैर-धार्मिक झुकावों की प्रार्थना से बहुत अलग  है.’

उन्होंने कहा कि इससे यह सवाल उठता है कि क्या शासन पूरे देश में छात्र-छात्राओं और शिक्षकों पर समान प्रार्थना लागू कर सकता है?

जब जस्टिस फली नरीमन और नवीन सिन्हा की पीठ ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के विचार मांगे तब मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने जवाब दिया कि विद्यालय एक स्वायत्त संस्था है और अनिवार्य प्रार्थना करवाने के विषय में उसका कोई लेना-देना नहीं है.

एनडीटीवी की ख़बर के अनुसार, ‘केंद्रीय विद्यालयों में संस्कृत और हिंदी में प्रार्थना क्या हिंदू धर्म का प्रचार है, इस पर सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की बेंच ने कहा कि इस मामले को संविधान पीठ को सुनना चाहिए. पीठ ने कहा कि यह धार्मिक महत्व का मसला है और दो जजों की पीठ ने उचित बेंच के गठन के लिए मामले को चीफ जस्टिस के पास भेज दिया है.’

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और केंद्रीय विद्यालयों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा यह बहुत गंभीर संवैधानिक मसला है, जिस पर विचार जरूरी है.

याचिका में कहा गया है कि केंद्रीय विद्यालयों में 1964 से संस्कृत और हिंदी में सुबह की प्रार्थना हो रही है जो कि पूरी तरह असंवैधानिक है. ये संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 के खिलाफ है और इसे इजाजत नहीं दी जा सकती है.