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एएमयू को लेकर विवाद ज़रूर नया है पर षड्यंत्र वही पुराना है

इस समय इरादा मुसलमानों से जुड़ी हर जगह को संदिग्ध बनाने का है. उसका तरीक़ा है उन्हें विवादित बनाना. एक बार कुछ भी विवादित हो जाए तो उसमें दूसरा पक्ष जायज़ हो जाता है, जैसे बाबरी मस्जिद को विवादित बनाकर अब संघ के संगठन एक जायज़ पक्षकार बन बैठे हैं.

अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के गेट पर एक विरोध प्रदर्शन (फाइल फोटो: पीटीआई)

अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के गेट पर एक विरोध प्रदर्शन (फाइल फोटो: पीटीआई)

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) नया निशाना है. जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आ रहे हैं, उन मुसलमान जगहों की तलाश तेज़ हो गई है जिन्हें अभी भी फ़तह किया जाना बाक़ी है.

यह विजय अभियान, जो बाबरी मस्जिद को ढहाकर उस जगह पर मुजरिमाना क़ब्ज़ा करके आरंभ किया गया था, हरेक ऐसी जगह भगवा झंडा फहराकर ही पूरा किया जा सकता है. लेकिन चूंकि अब तिरंगा को ही नए राष्ट्रवादियों ने हथिया लिया है, वे इसका इस्तेमाल के बदले कर रहे हैं.

यह वह चालाकी है, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में शुरू से ही पाई जाती है. उसकी पूरी परियोजना राजनीतिक है, लेकिन वह उसे सांस्कृतिक कहता है और दूसरों को भी वही मानने को मजबूर करता है.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में एक के बाद एक स्वयंसेवक संघ की ओर से भेजे गए लोग महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किए जाते हैं लेकिन हमें कहा जाता है कि उसे हम अराजनीतिक संगठन मानें.

दिलचस्प यह है कि भारत के बुद्धिजीवी जाने किस बाध्यता से यह अंतर ख़ुद ही करते रहते हैं. प्रणब बाबू भी इसी उदार कारण से नागपुर पहुंच गए थे.

लेकिन क्या एएमयू बिल्कुल नया निशाना है? क्या हमें पिछले बरस यूनिवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर को लेकर जो विवाद खड़ा किया गया था, उसकी याद नहीं है?

इस विवाद को मीडिया ने भी मज़े लेकर लंबा खींचा ताकि हिंदुओं के दिमाग़ में यह बैठाया जा सके कि कैसे अब तक भारत में पाकिस्तान के शैदाई बैठे हुए हैं.

लेकिन उसके भी पहले भाजपा और संघ के नेताओं के उन बयानों को याद कर लें जो एएमयू में अनुसूचित जाति आदि के लिए आरक्षण की मांग करने के बहाने इसके अल्पसंख्यक दर्जे को ख़त्म करने की मांग करते हुए दिए गए.

रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद बार-बार भाजपा के नेताओं ने कहा कि वेमुला जैसे दलित लोग एएमयू में आरक्षण की मांग क्यों नहीं करते! इस तरह मुसलमान और दलितों के हितों के बीच एक अनिवार्य विरोध स्थापित करने की कोशिश की गई.

कहा गया कि जो यह मांग नहीं करते, वे नकली दलित हैं और दलितों की शक्ल में माओवादी हैं जिनका जिहादियों के साथ गठजोड़ है.

हर वैसी जगह, जो मुसलमान बहुल है या जिसकी पहचान मुसलमान है, को जिहादियों या भारत विरोधियों के अड्डे के तौर पर प्रचारित किया गया. एक आम हिंदू दिमाग को, जो यह भी मान लेता है कि मस्जिदों में हथियार जमा किए जाते हैं, आखिर इस प्रचार के असर से कैसे बचाया जा सकता है?

कासगंज की घटना को याद करें. तिरंगा लेकर मुसलमान मोहल्ले में जब चाहे घुस जाने को राष्ट्रवादी अधिकार माना गया. उसके बाद दिल्ली की जामा मस्जिद में पंद्रह अगस्त को तिरंगा लेकर चढ़ जाने या ईद के रोज़ वहां नमाज़ पढ़ने इकट्ठा हुए मुसलमानों के हाथ जबरन तिरंगा थमाने की कोशिश की प्रतीकात्मकता को भी समझने की कोशिश करें.

कहा जाएगा कि अगर हम दुर्गा पूजा या कांवर यात्रा में तिरंगा लेकर चल सकते हैं तो आखिर आपको मस्जिद में तिरंगे से क्या ऐतराज़ है?

पिछले चार वर्षों में मुसलमानों के पवित्र स्थलों के राष्ट्रीयकरण या भारतीयकरण की कोशिशें की जाती रही हैं. मदरसों को पंद्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी मनाने, राष्ट्रगान गाने के आदेश में इसके सबूत भी जमा करने को कहा गया.

दिल्ली विश्वविद्यालय के परिसर में भी कोई बिना अनुमति कैमरा लेकर नहीं आ सकता. अभी हाल में एक पत्रकार जब मुझसे इंटरव्यू लेने परिसर आईं तो सुरक्षा अधिकारी ने मना कर दिया. पत्रकार ने भी जिद नहीं की.

फिर क्यों कर एएमयू में बार-बार सुरक्षा अधिकारी के विनम्रतापूर्वक अनुरोध के बावजूद रिपब्लिक टीवी की पत्रकार वहां अड़ी रहीं? यह किसी भी तरह उनका पत्रकारीय अधिकार नहीं है.

एएमयू को लेकर संघ के मन में पुरानी कुंठा भी है. यह मुसलमानों को आधुनिक शिक्षा देनेवाला प्रतिष्ठित संस्थान है. वहां मुसलमानों को आत्मविश्वासपूर्ण मुखरता प्राप्त होती है.

उसका कोई ऋण पक्ष नहीं, यह बात नहीं ,लेकिन यह तो है कि ऐसे संस्थान मुसलमानों में नेतृत्व पैदा कर सकते हैं. यही बात है जो संघ को परेशान करती है.

एएमयू का प्रतीकात्मक महत्व साधारण जनता के लिए बहुत अधिक है. वैसे ही जैसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का, इसलिए इनकी प्रतिष्ठा को तहस-नहस किए बिना मुसलमानों को पूरी तरह ख़ामोश नहीं किया जा सकता.

इरादा मुसलमानों से जुड़ी हर जगह को संदिग्ध बनाने का है. उसका तरीक़ा है उन्हें विवादित बनाने का. एक बार कुछ भी विवादित हो जाए तो उसमें दूसरा पक्ष जायज़ हो जाता है. जैसे बाबरी मस्जिद को विवादित बनाकर अब संघ के संगठन एक जायज़ पक्षकार बन बैठे हैं.

उसी तरह एएमयू के मामले में भाजपा के सांसद पक्षकार बनने की साज़िश में लगे हैं. यह सब कुछ एक क़ानूनी प्रक्रिया के साथ हो रहा है. वह यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक चरित्र को चुनौती देने का प्रसंग है जो उच्चतम न्यायालय के पास है.

अल्पसंख्यक चरित्र के औचित्य की बात समझना इतना सरल नहीं. इसे इस तरह पेश किया जाता है मानो यह मुसलमानों का इस देश में आज़ादी हासिल करने का एक रास्ता हो.

जिस तत्परता से पुलिस ने मात्र एक भाजपा के नेता के कहने पर विश्वविद्यालय के छात्रों के ख़िलाफ़ राजद्रोह का मुक़दमा दायर किया है, उससे पुलिस और प्रशासन में लंबे वक़्त से जड़ जमाए मुसलमान विरोध का एक और प्रमाण मिलता है.

भाजपा की सत्ता में यह पूर्वाग्रह अपने सबसे क्रूर और नग्न रूप में प्रकट होता है. चुनाव एक वजह है लेकिन वही कारण नहीं. एएमयू को लेकर एक नया विवाद ज़रूर हैं लेकिन यह वही पुराना मुसलमान विरोधी षड्यंत्र है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)