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आईआईटी कानपुर: उत्पीड़न की शिकायत करने वाले दलित शिक्षक की पीएचडी रद्द की जा सकती है

आईआईटी कानपुर के शिक्षक सुब्रमण्यम सदरेला ने संस्थान के चार सहकर्मियों पर भेदभाव और उत्पीड़न का आरोप लगाया था. संस्थान की तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में चारों सहकर्मियों को उत्पीड़न का दोषी भी पाया था.

आईआईटी कानपुर. (फोटो साभार: ट्विटर)

आईआईटी कानपुर. (फोटो साभार: ट्विटर)

नई दिल्लीः भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर ने एक दलित शिक्षक की पीएचडी थीसिस रद्द करने की सिफारिश की है, जिन्होंने पिछले अपने चार सहकर्मियों के खिलाफ उत्पीड़न का आरोप लगाया था.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, दलित शिक्षक ने साहित्यिक चोरी (प्लेजरिज्म) के आरोपों पर पिछले साल अपने चार सहकर्मियों के खिलाफ उत्पीड़न और भेदभाव की शिकायत की थी. इसके बाद अब खबर आई है कि शिकायतकर्ता दलित शिक्षक की पीएचडी थीसिस रद्द की जाएगी.

हालांकि संस्थान के एकेडमिक एथिक्स सेल को पीएचडी थीसिस रद्द करने का कोई कारण नजर नहीं आया.

15 अक्टूबर 2015 को भेजे गए एक गुमनाम ईमेल के जरिए दलित शिक्षक सुब्रमण्यम सदरेला के खिलाफ प्लेगरिज्म के आरोप लगाए गए थे. ये मेल संस्थान के कई फैकल्टी सदस्यों को भेजे गए थे.

दो महीने बाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जज द्वारा की गई जांच में चार शिक्षकों को आईआईटी कानपुर के आचरण नियमों और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण के नियमों के उल्लंघन का दोषी पाया था.

सीनेट के सुझावों को जल्द ही संस्थान के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (बीओजी) के समक्ष रखे जाने की उम्मीद है. आईआईटी कानुपर की सीनेट अकादमिक और सभी फैकल्टी सदस्यों संबंधी मामलों पर फैसला करने वाली सर्वोच्च इकाई है. इसके प्रमुख संस्थान के निदेशक होते हैं.

अगर बीओजी ने इस सुझाव को स्वीकार कर लिया गया तो सदरेला की पीएचडी रद्द कर दी जाएगी, इस वजह से उन्हें आईआईटी कानपुर में अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ सकता है.

सदरेला ने हैदराबाद के जवाहरलाल नेहरू टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी से संबद्ध इंस्टीट्यूट ऑफ एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग से बीटेक की और आईआईटी कानपुर से एमटेक और पीएचडी की थी.

एक जनवरी 2018 को आईआईटी कानपुर के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग से जुड़े सदरेला ने 12 जनवरी 2018 को संस्थान के चार सहकर्मियों पर भेदभाव और उत्पीड़न का आरोप लगाया था. उस समय आईआईटी कानपुर के निदेशक द्वारा बनाई गई तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में चारों सहकर्मियों को उत्पीड़न का दोषी पाया था. यह रिपोर्ट आठ मार्च 2018 को जमा की गई थी.

इलाहाबाद हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त जज की ओर से की गई जांच में भी शिक्षक दोषी पाए गए. यह रिपोर्ट 17 अगस्त 2018 को दर्ज की गई. छह सितंबर 2018 को बीओजी की बैठक में इसके निष्कर्षों पर चर्चा की गई. बोर्ड ने फैसला किया कि शिक्षकों ने आचरण नियमों का उल्लंघन किया है, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का नहीं.

सदरेला ने 18 नवंबर 2018 को शिक्षकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी, जिस पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रोक लगा दी थी. सदरेला के खिलाफ की गई एक अनाम शिकायत में आरोप लगाया गया कि उनकी पीएचडी के कुछ हिस्से तीन अन्य लोगों के काम से चुराए गए हैं.

आईआईटी कानपुर के निदेशक अभय करंदीकर ने इस शिकायत को एकेडमिक एथिक्स सेल को जांच के लिए भेजा, जिसमें पाया गया कि शिकायत प्रथम दृष्टया सही थी.

हाालंकि पिछले साल नवंबर में एथिक्स सेल द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट में कहा गया, ‘शोधकर्ता के शोध कार्य में किसी तरह की साहित्यिक चोरी (प्लेजरिज्म) का आरोप नहीं है. समिति को लगता है कि उनके शोध कार्य को रद्द करने की जरूरत नहीं है.’

समिति ने कहा कि सदरेला अपने शब्दों में पैसेज को दोबारा लिखे और संशोधित शोध को एक महीने में जमा करें और संस्थान के निदेशक से लिखित में माफी मांगे. हालांकि बावजूद इसके उनकी पीएचडी थीसिस रद्द करने की सिफारिश की गई.

बता दें कि 14 मार्च को सीनेट की बैठक में जब इन सिफारिशों को रखा गया तो सदरेला की पीएचडी वापस लेने को लेकर वोटिंग हुई थी.