प्रासंगिक

जब मंटो जलियांवाला बाग़ में घंटों बैठकर अंग्रेज़ी हुकूमत के तख़्तापलट के सपने देखा करते थे

जलियांवाला बाग़ नरसंहार ने मंटो को बदल दिया था. मंटो तब सात साल के थे, जब बाग़ का ख़ूनी दृश्य देखा और उसको कहीं अपने भीतर महसूस किया. बचपन की ये कैफ़ियत उनके परिपक्व होने तक भी नहीं निकल पाई. इसके बहुत बाद में जब वे अपने साहित्यिक जीवन की पहली कहानी ‘तमाशा’ लिख रहे थे, तब शायद उसी यातना से गुज़र रहे थे.

Jallianwala Bagh Manto Wiki

फोटो साभार: विकीपीडिया/विकीमीडिया कॉमन्स

मंटो की हर ‘नई पढ़त’ हैरान करती है, मतलब उनकी मामूली कहानियां भी हैरत-कदे (House of wonder) की तरह हैं. हालांकि वो अपने आपको ‘अव्वल दर्जे का फ्रॉड’ कहते थे. और शायद ये उनका रचा हुआ ‘फ्रॉड’ ही था जो आलोचकों ने उनको औरत, सेक्स, तवायफ़ और किसी हद तक विभाजन की त्रासदी का क़िस्सागो मशहूर कर दिया.

इस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया कि मंटो को अपने समय की सियासी करवटों से एक अलग तरह की दिलचस्पी थी. ऐसे में मुझे मंटो का लिखा याद आ रहा है कि- ‘मंटो को सियासत से कोई दिलचस्पी नहीं है.’

तो सियासत और सियासी करवट में तमीज़ किए बिना कोई ये कह सकता है कि मंटो ने अपने बारे में सच ही लिखा है, यहां कोई फ्रॉड नहीं है. लेकिन मुझे लगता है कि मंटो ने अपने ज़माने की हर सियासी करवट पर कहानियां लिखीं. आप चाहें तो यूं कह लें कि उस समय के हर सियासी डिस्कोर्स ने ख़ुद ही उनकी कहानियों में जगह बनाई.

हां, जब कभी मंटो ऐसा नहीं कर पाए तो- ‘हिंदुस्तान को लीडरों से बचाओ’ या ‘एक अश्क आलूद अपील’ जैसी तहरीरें पेश कर दीं, जिसमें उन्होंने नेताओं को खटमल कहा तो कभी दंगों से बेज़ार होकर देश के नागरिकों को उनकी मानवता याद दिलाई और ये बताने की कोशिश की कि दंगों में हिंदू-मुस्लिम नहीं मरते इंसान मरते हैं.

इन बातों की चर्चा यहां इसलिए कि मंटो जो आवारागर्दी करते थे, घर वालों की नज़र में उनके ‘लक्षण’ अच्छे नहीं थे और जो ख़ुद अपने बारे में कहते थे कि अगर वो कहानी नहीं लिख रहे होते तो- ‘चोरी डकैती के जुर्म में कहीं सज़ा काट रहे होते’, वही मंटो अपनी लेखनी में इतने हस्सास और संवेदनशील कैसे नज़र आते हैं?

इस सवाल के जवाब अनेक हो सकते हैं, लेकिन उनके जीवन को अमृतसर और जलियांवाला बाग़ के संदर्भ में देखा जाए तो कई बातें समझ में आने लगती हैं. जिनमें पहली बात ये है कि हिंदुस्तान की आज़ादी के संघर्षों में जिस अमृतसर का अपना इतिहास है, जो शहर कभी कारोबार की एक बड़ी मंडी हुआ करता था और जहां अंग्रेज़ी सरकार के विरोध में ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद’ के नारे लगते थे, वहां मंटो पैदा हुए.

उसी अमृतसर के कूचा वकीलां में 1935 तक (दस वर्षों तक) घर पर प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की. उसके बाद गवर्नमेंट मुस्लिम हाई स्कूल में चौथी क्लास से मैट्रिक और कॉलेज की अधूरी तालीम तक पढ़ाई से जी चुराते रहे. इसी शहर में जब वो 7 साल के थे तब जलियांवाला बाग़ का ख़ूनी दृश्य देखा और उसको कहीं अपने भीतर महसूस किया.

कहते हैं भारतीय इतिहास की इस हिंसा और नरसंहार ने मंटो को बदल दिया. लिखने वाले लिख गए हैं और मंटो के बारे में अपनी गवाही दर्ज कर गए हैं कि वो उस ज़माने में खोया-खोया रहता था. उसका जी उचाट हो चुका था. एक तरह की बेचैनी थी.

वो क़ब्रिस्तान में घूमता था और घंटों जलियांवाला बाग़ में बैठकर ऐसे इंक़लाबी सपने देखता था जो एक झटके में अंग्रेज़ी हुकूमत का तख़्ता पलट देना चाहती थी. मंटो के बचपन की ये कैफ़ियत उनके परिपक्व होने के दौरान भी अपनी उम्र के सातवें साल से बहुत दिनों तक निकल नहीं पाई.

ऐसा लगता है मंटो उस नरसंहार की मानसिक यातना से निकले ही नहीं और जब अपने साहित्यिक जीवन की पहली कहानी- ‘तमाशा’ लिखी तो उसी यातना से गुज़र रहे थे. बहुत बाद में जब वो कुछ ऐसी ही कहानियों को अपनी किताब- ‘आतिश-पारे’ में शामिल कर रहे थे तो प्रस्तावना में इन कहानियों को ‘दबी हुई चिंगारियों’ के नाम से पढ़ने वालों के सामने पेश कर दिया और कहा कि इसको शोला बनाना पढ़ने वालों का काम है.

दिलचस्प बात ये है कि उनकी कहानी ‘तमाशा’ भी उस समय के राजनीतिक पक्ष को सामने रखती है कि कैसे उस ज़माने में ब्रिटिश सरकार का खौफ़ तारी था. उन्हीं के शब्दों में कहें तो- ‘तमाशा जो जलियांवाला बाग़ के ख़ूनीं हादिसे से मुत्तालिक़ था. मैनें अपने नाम से नहीं छपवाया. यही वजह है कि पुलिस से बच गया.’

यहां इस कहानी की चर्चा हो ही रही है तो इस बात का ज़िक्र भी होना चाहिए कि अमृतसर में ही मंटो को बारी अलीग जैसे ‘गुरु’ मिले, जिनकी पत्रिका ‘ख़ल्क़’ में ‘तमाशा’ छपी और बाद में अंग्रेज़ी सरकार के डर से बारी साहब ने अपनी पत्रिका ही बंद कर दी.

ये वही बारी अलीग हैं जो भगत सिंह के गांव से थे और उनके परिचित भी थे, मगर मंटो के कहे के मुताबिक़ वो बुज़दिल और डरपोक थे. खैर उनकी सरपरस्ती में ही मंटो ने लिखना शुरू किया था.

अमृतसर में ही मंटो ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर इंक़लाबी साहित्य के अनुवाद को छापा और शहर भर में इश्तिहार भी लगाए. एक बार इश्तिहार लगाने के जुर्म में गिरफ्तार होते-होते बचे.

बारी साहब ने ही मंटो के कमरे को दारुल-अहमर (लाल-घर) का नाम दिया था जिसमें भगत सिंह की तस्वीर लगी थी और बारी साहब के ख़याल में- मंटो में भगत सिंह बनने की सारी ख़ूबियां थीं. एक तरह से ये चंद फ्री थिंकर्स की मंडली थी जो मुल्क के सियासी हालात पर बात करते थे और बेमतलब की भी हांकते थे.

तमाशा लिखने से पहले मंटो अच्छी नज़र से नहीं देखे जाते थे, लेकिन इस कहानी और अपनी कथित ख़ुफ़िया सरगर्मियों की वजह से उनको ये लगने लगा था कि अब लोग उनको अलग नज़र से देखेंगे मगर बदला कुछ भी नहीं. अब भी जहां पान-सिगरेट वाले मंटो से पैसों का तक़ाज़ा करते थे, वहीं घर वालों के लिए भी वो एक ग़ैर-ज़िम्मेदार इंसान थे.

इन बातों से इतर कला की दृष्टि से ‘तमाशा’ एक साधारण कहानी है, लेकिन इस कहानी के किरदार ख़ालिद की उम्र को नज़र में रखें तो महसूस होता है कि मंटो ने उसी बच्चे की नज़र से जलियांवाला नरसंहार को देखा जिसकी आंखों के सामने एक बच्चे को पुलिस ने गोली मार दी थी. और ये बच्चा कोई और नहीं ख़ुद मंटो है.

कहानी में मंटो ने ख़ालिद के मासूम ज़ेहन में उस दुश्मन और सरकार के ख़िलाफ़ शदीद नफ़रत की भावना पैदा कर दी है जिसको उसने देखा तक नहीं. एक तरह से ये कहानी मंटो के अपने बचपन का अनुभव है और इसमें वही बेचैनी है जिसके मद्देनज़र मंटो ने लिख दिया कि- ‘मेरा हाल भी उन दिनों दिगर गूं था. जी चाहता था कहीं से पिस्तौल हाथ आ जाए तो एक दहशतगर्द पार्टी बनाई जाए.’

मंटो ने तमाशा के 25 साल बाद अपनी इस कैफ़ियत का इज़हार जलियांवाला बाग़ और स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में लिखी दूसरी कहानी- ‘स्वराज के लिए’ में किया. इस कहानी में मंटो ने अपने अलावा अपने दोस्त ग़ुलाम अली को किरदार बनाया है.

इस कहानी में मंटो ने उस समय को भी याद किया है जब वो स्कूल से भाग कर जलियांवाला बाग़ में भटका करते थे और क्रांति के सपने देखा करते थे. इसमें मंटो ने बताया है कि अमृतसर के सियासी हालात ने उनके मित्र को इतना बदल दिया कि वो क्रांति की राह पर चल पड़ा. वो लोगों का आइडियल बन गया.

मंटो के शब्दों में कहें तो- ‘ये कहानी लिखते हुए मैं जब ग़ुलाम अली की तक़रीर (भाषण) का तसव्वुर करता हूं तो मुझे सिर्फ़ एक जवानी बोलती हुई दिखाई देती है, जो सियासत से बिलकुल पाक थी.’

मंटो ने लिखा है कि शहज़ादा ग़ुलाम अली की आवाज़ में दीवानगी थी, एक सिरफिरी-सी जवानी, अल्हड़ जज़्बा, ऐसी तक़रीर की हल्की गूंज भी मुझे कभी सुनाई नहीं दी. अब जो तक़रीर सुनाई देती है उसमें ठंडी संजीदगी, बूढ़ी सियासत और शायराना होशमंदी में लिपटी हुई.

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फोटो: विकीमीडिया कॉमन्स

दरअसल मंटो हमें ये बताना चाहते हैं कि उस वक़्त देश प्रेम का जज़्बा सियासी नहीं था. हर आदमी मर मिटने को तैयार था.

उसी माहौल का चित्रण मंटो ने इस तरह किया कि -‘शहज़ादा ग़ुलाम अली ने तक़रीर ख़त्म की तो सारा जलियांवाला बाग़ तालियों और नारों का दहकता हुआ अलाव बन गया. उसका चेहरा दमक रहा था. जब मैं उससे अलग जाकर मिला और मुबारकबाद देने के लिए उसका हाथ दबाया तो वो कांप रहा था. ये गर्म कंपकपाहट उसके चमकीले चेहरे से भी नुमायां थी.’

मंटो ने बयान किया है कि उसका दोस्त औरतों के बीच इतना मक़बूल हो गया था कि एक मुस्लिम लड़की निगार उसके प्रेम में पड़ गई. ख़ास बात ये है कि इस कहानी में मंटो ने बाबाजी के किरदार में गांधीजी को पेश किया है और उनके त्याग की भावना और आदर्शों पर अली और निगार के प्रेम के माध्यम से बड़ा सवाल खड़ा किया.

असल में ये गांधीजी के आश्रम में उस प्रेमी जोड़े की सच्ची कहानी से प्रभावित है जिसमें उन लोगों ने ये फ़ैसला किया था कि जब तक वो मुल्क को आज़ाद नहीं करा लेते मियां बीवी की तरह नहीं रहेंगे. मंटो ने इस कहानी में ये भी बताया है कि निगार पहली ऐसी मुस्लिम लड़की थी जिसने पर्दा उतारकर आज़ादी की मुहिम में हिस्सा लिया था.

खैर यहां मंटो जहां गांधीजी से अपनी अक़ीदत को पेश करते हैं वहीं वो इस तरह के त्याग को ग़लत बताते हैं. बात ये भी है कि मंटो गांधीजी को पसंद करते थे लेकिन उनके हीरो भगत सिंह थे.

इन बातों को रेखांकित करते हुए मंटो ने बताया है कि एक मामले में अली को जेल जाना पड़ता है और वो जब 7 महीने के बाद वापस आता है तो शहर का जोश ठंडा पड़ चुका था. हुकूमत अपने हथकंडों से लोगों के हौसले तोड़ चुकी थी.

इन सब के बीच अपने आदर्श में फंसा अली अपने मज़हब के सहारे अपनी बीवी से रिश्ता क़ायम करता है और उसको इस तरह से सही ठहरता है कि-

‘मैंने जो कुछ हासिल किया है वो ये है कि फ़ितरत की ख़िलाफ़वर्ज़ी हर्गिज़ हर्गिज़ बहादुरी नहीं है. ये कोई कारनामा नहीं है कि तुम फ़ाक़ाकशी करते करते मर जाओ या जिंदा रहो. क़ब्र खोद कर उसमें गड़ जाना और कई-कई दिन तक उसके अंदर दम साधे रखना, नोकीली कीलों के बिस्तर पर महीनों लेटे रहना, एक हाथ बरसों ऊपर उठाए रखना, हत्ता कि वो सूख कर लकड़ी हो जाए- ऐसे मदारीपने से न खुदा मिल सकता है न स्वराज. और मैं समझता हूं हिंदुस्तान को स्वराज सिर्फ़ इसलिए नहीं मिल रहा है कि यहां मदारी ज़्यादा हैं और लीडर कम.’

इस कहानी में उस समय का सियासी पक्ष विस्तार से सामने आता है और आदर्शों में फंसे प्रेम के सहारे मंटो इंसान को इंसान ही बने रहने पर ज़ोर देता नज़र आता है.

इस कहानी से अलग मंटो ने जलियांवाला बाग़ के इर्द-गिर्द तीसरी कहानी- ‘1919 की एक बात’ लिखी. इसमें जलियांवाला बाग़ के ठीक पहले के हालात को पेश किया गया है.

गांधीजी की पलवल में गिरफ्तारी, हड़ताल की घोषणा और 9 अप्रैल को डॉक्टर सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की हिरासत, सड़कों पर अवाम की तोड़-फोड़ और उसी सियासी उठापटक में एक तवायफ़ की औलाद थैला कंजर की कहानी में मंटो ने दिखाया है कि मुल्क के लिए एक ऐसा आदमी भी समाज में हीरो बन गया जिसको लोग आमतौर से गालियां दिया करते थे.

दरअसल थैला अपनी बहनों की तथाकथित नाजायज़ आमदनी से हिस्सा वसूल करता था. लेकिन यही कंजर जो हर तरह की ज़िल्लत को सहने का आदी था मुल्क की ज़िल्लत को बर्दाश्त नहीं कर पाया और बाग़ी हो गया.

ऐसा बाग़ी जिसने अवाम को लीड किया और जब लोग ब्रिटिश मलिका का बुत तोड़ने के लिए आगे बढ़ रहे थे तो उसने आवाज़ दी- ‘मत ज़ाया करो अपना जोश. इधर आओ मेरे साथ…चलो गोरों को मारें जिन्होंने हमारे बेक़सूर आदमियों की जान ली है और उन्हें ज़ख़्मी किया है… ख़ुदा की क़सम हम सब मिलकर उनकी गर्दन मरोड़ सकते हैं… चल!’

मंटो ने इस कंजर के बारे में लिखा कि उसको गोलियों से छलनी कर दिया गया था- ‘मैंने देखा नहीं, पर सुना है जब थैले की लाश गोरे से जुदा की गई तो उसके दोनों हाथ उसकी गर्दन में इस बुरी तरह पैवस्त थे कि अलहिदा नहीं होते थे… गोरा जहन्नुम वासिल हो चुका था…’

इस कहानी में एक अहम मोड़ उस वक़्त आता है जब थैला की मौत के बाद और जलियांवाला बाग़ नरसंहार से पहले उसकी दो बहनों को अंग्रेज़ नृत्य के लिए बुलाते है हालांकि अभी कुछ दिन पहले ही उसके भाई को गोली मारी गई थी.

लेकिन वो गईं और- ‘अपनी ज़र्क़-बर्क़ पिशवाज़ें नोच डालीं और अलिफ़ नंगी हो गईं और कहने लगीं… लो देख लो… हम थैले की बहनें हैं…उस शहीद की जिसके ख़ूबसूरत जिस्म को तुमने सिर्फ़ इसलिए अपनी गोलियों से छलनी-छलनी किया था कि उसमें वतन से मोहब्बत करने वाली रूह थी… हम उसी की ख़ूबसूरत बहनें हैं…आओ! अपनी शहवत के गर्म-गर्म लोहे से हमारा ख़ुशबूओं में बसा हुआ जिस्म दागदार करो… 7मगर ऐसा करने से पहले सिर्फ़ हमें एक बार अपने मुंह पर थूक लेने दो…’

मंटो कहानी को इसी तरह पेश करना चाहते हैं लेकिन फिर उनको लगता है कि ये बातें बनावटी लग रही हैं तो वो इस तरह कहानी को समाप्त करते हैं- ‘ जी हां… उन हराम… वो गाली देते देते रुक गया… ‘उन्होंने अपने शहीद भाई के नाम पर बट्टा लगा दिया.’

असल में मंटो किसी तरह का आदर्श गढ़ना नहीं चाहते इसलिए अपनी सोची हुई कहानी को बदल देते हैं. दिलचस्प बात ये है कि इन कहानियों में मंटो ख़ुद एक किरदार हैं इसलिए इसमें उनका कमिटमेंट नज़र आता और उनका शहर अमृतसर उनकी मौत से पहले तक उनकी कहानियों में अपनी मौजूदगी का एहसास करवाता है.

इन कहानियों में मंटो ने अंग्रेजों से नफ़रत के लिए आम तौर से जिन किरदारों को हीरो बना कर पेश किया है वो सबके सब समाज के पिछड़े और साधरण लोग थे, मंटो की यही अंग्रेज़ दुश्मनी बाद में उनकी कहानी- ‘नया क़ानून’ के मंगू कोचवान में पूरी शिद्दत के साथ नज़र आती है.

मंटो की इन कहानियों को अपने समय के इतिहास के साथ पढ़ने की ज़रूरत है क्योंकि इनमें हिंदुस्तान की आज़ादी के संघर्षों को आम लोगों के जज़्बे और हौसले के साथ पेश किया गया है.