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आरटीआई एक्ट की सूचना देने से छूट प्राप्त धाराओं का बिना सोचे समझे उल्लेख करना गलत: सीआईसी

सीआईसी ने एक मामले की सुनवाई के दौरान डीओपीटी को कड़ी फटकार लगाते हुए ये टिप्पणी की. आयोग ने कहा, ऐसा करना आरटीआई कानून की भावना का गला घोटने जैसा है.

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केंद्रीय सूचना आयोग.

नई दिल्ली: केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत सूचना देने से छूट प्राप्त धाराओं का मनमाने तरीके से उल्लेख करना गलत प्रचलन को बढ़ावा देता है.

डीओपीटी आरटीआई कानून को सही तरीके से लागू करने की जिम्मेदारी वाली नोडल एजेंसी है. आरटीआई कार्यकर्ता कोमोडोर लोकश बत्रा ने सीआईसी में शिकायत दर्ज कर आरोप लगाया था कि आरटीआई एक्ट को लागू करने की नोडल एजेंसी होने के बावजूद डीओपीटी बिना सोचे समझे आरटीआई एक्ट की सूचना देने से छूट प्राप्त धाराओं का उल्लेख करते हुए सूचना देने से मना कर रहा है.

उन्होंने अपनी शिकायत में कहा कि अगर डीओपीटी बार-बार ऐसा करता है तो ये बेहद गलत चलन को बढ़ावा देगा और अन्य सरकारी विभाग भी ऐसा करने लगेंगे. ये सूचना का अधिकार अधिनियम के लिए बेहद बुरा कदम साबित हो सकता है.

केंद्रीय सूचना आयुक्त दिव्य प्रकाश सिन्हा ने बत्रा की दलीलों से सहमति जताई और डीओपीटी को कड़ी फटकार लगाते हुए आगे से ऐसा नहीं करने की चेतावनी दी.

दरअसल लोकेश बत्रा ने पिछले साल आठ फरवरी 2018 को आरटीआई दायर कर डीओपीटी और प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के बीच आदान-प्रदान किए गए उन सभी दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां मांगी थी, जिसके आधार पर डीओपीटी द्वारा दो सितंबर 2016 को ‘सीआईसी में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति’ के लिए अधिसूचना जारी की गई थी.

डीओपीटी ने आरटीआई एक्ट की धारा 8(1)(आई) का उल्लेख करते हुए सूचना देने से मना कर दिया. जबकि, धारा 8(1)(आई) के तहत कैबिनेट पेपर्स से संबंधित कुछ जानकारियों का खुलासा करने से छूट दी गई है.

बत्रा ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि डीओपीटी पारदर्शिता के सिद्धांत का उल्लंघन कर रहा है और उन सूचनाओं का भी खुलासा करने से मना कर रहा है जो आम जनता के लिए हैं.

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सीआईसी के फैसले का अंश.

जब आयोग ने डीओपीटी से जानकारी नहीं देने के संबंध में जवाब मांगा तो उन्होंने कहा कि चूंकि नियुक्ति प्रक्रिया उस समय चल रही थी और उन दस्तावेजों को सर्च कमेटी के पास जमा किया जाना था, इसलिए जानकारी नहीं दी गई थी.

हालांकि सूचना आयुक्त दिव्य प्रकाश सिन्हा ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि धारा 8(1)(आई) के तहत सूचना देने से मना करना बिल्कुल गलत था. उन्होंने कहा, ऐसा करना सरासर बहानेबाजी है और ये आरटीआई आवेदन के तहत बिना सोचे समझे जवाब देने के दृष्टिकोण को दर्शाता है.

सूचना आयुक्त ने कहा, ‘शिकायतकर्ता ने बिल्कुल सही ओर इशारा किया है कि डीओपीटी द्वारा आरटीआई के तहत सूचना देने से छूट प्राप्त धाराओं का मनमानी तरीके से उल्लेख कर जानकारी न देना आरटीआई की नोडल एजेंसी की प्रतिबद्धता पर बहुत गंभीर सवाल खड़ा करता है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘ये कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस सूचना को देने से मना किया गया है वो सूचना आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित है, जिन्हें पारदर्शिता के शासन को सुरक्षित रखने की कानूनी जिम्मेदारी दी गई है.’

दिव्य प्रकाश सिन्हा ने अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता की ये बात सही है कि ऐसा करना आरटीआई आवेदन में अड़ंगा लगाने और आरटीआई कानून की भावना का गला घोटने जैसा है.

गैरजरूरी अपारदर्शिता का सहारा लेकर डीओपीटी अन्य सरकारी विभागों के सामने गलत उदाहरण पेश कर रहा है और इसके साथ ही ये आरटीआई लागू करने की नोडल एजेंसी होने का अपमान करना भी है.

आयोग ने डीओपीटी के जनसूचना अधिकारी को चेताया और अगली बार से मनमानी तरीके से किसी धारा का उल्लेख न करने की चेतावनी दी. केंद्रीय सूचना आयोग ने डीओपीटी के सचिव को भी निर्देश दिया कि वे आयोग के फैसले का संज्ञान लें.