कैंपस

राष्ट्रीय ओवरसीज़ छात्रवृत्ति योजना से चुनिंदा विषयों को हटाना ब्राह्मणवादी सोच का नतीजा है

समाज कल्याण और अधिकारिता मंत्रालय की राष्ट्रीय ओवरसीज़ छात्रवृत्ति योजना के तहत अनुसूचित जाति/ जनजाति और भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों से आने वाले छात्रों को उच्च-रैंकिंग वाले विदेशी विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है. इस साल बिना हितधारकों से चर्चा किए योजना से मानविकी व समाज विज्ञान विषयों को हटा दिया गया है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

समाज कल्याण और अधिकारिता मंत्रालय की राष्ट्रीय ओवरसीज छात्रवृत्ति योजना के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और भूमिहीन कृषि श्रमिक परिवारों से आने वाले छात्रों को उच्च-रैंकिंग वाले विदेशी विश्वविद्यालयों में स्नातकोत्तर शिक्षा (मास्टर्स और डॉक्टरेट स्तर) के लिए आर्थिक सहायता दी जाती है.

इस योजना की शुरुआत करीब सात दशक पहले, 1954 में हुई थी. बहुत कम बजट वाली इस योजना (2021 में 20 करोड़ रुपये का बजट) के अंतर्गत हर साल 100 छात्रों को छात्रवृत्ति दी जाती रही है (इस साल इसे बढ़ाकर 125 कर दिया गया है). लेकिन पिछले 5-6 सालों में यह छात्रवृत्ति सिर्फ 50-70 छात्रों को ही मिल पाई है.

समाज कल्याण और अधिकारिता मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि हर साल छात्रवृत्ति के लिए चुने गए छात्रों की संख्या और अंत में दी जाने वाली छात्रवृत्तियों में बड़ा फर्क होता है, जो नीचे दी गई तालिका से स्पष्ट हो जाता है.

विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, करीब 5.53 लाख भारतीय छात्र विदेश में अध्ययन के लिए जाते हैं. इसकी तुलना में राष्ट्रीय ओवरसीज छात्रवृत्ति योजना का कुल लक्ष्य सिर्फ सौ छात्रों की सहायता करना है.

इस योजना की विकृत रूपरेखा और अप्रभावी कार्यान्वयन के साथ-साथ अव्यवहारिक शर्तों के चलते सौ छात्रों का यह छोटा लक्ष्य भी पूरा नहीं किया जा सका है. उदाहरण के तौर पर, एम.फिल की पढ़ाई कर रहे छात्रों को मिलने वाली छात्रवृत्ति को भी उनकी ‘आय’ में शामिल किया जाता है, जिसके चलते उनकी कुल पारिवारिक आय, योजना के तहत तय की गई अधिकतम आय को पार कर जाती है, जिसके कारण उन्हें इस छात्रवृत्ति के लिए अयोग्य माना जाता है.

इसी वजह से हमारे कुछ छात्रों को भी योजना के तहत छात्रवृत्ति पाने के लिए बिना किसी आमदनी के एक साल तक का इंतज़ार करना पड़ा है.

पिछले साल तक इस योजना में  सभी प्रमुख विषय शामिल थे. लेकिन, इस साल जारी किए गए नए दिशानिर्देशों के तहत ‘भारतीय संस्कृति/विरासत/इतिहास/भारत संबंधी समाज विज्ञान से जुड़े विषयों/कार्यक्रमों’ को इस योजना से बाहर कर दिया गया है.

सिर्फ यही नहीं, कौन-सा शोध विषय इन श्रेणियों में आता है और कौन-सा नहीं, इसका अंतिम फैसला योजना की चयन-व-जांच समिति द्वारा किया जाएगा.

यह बड़ा बदलाव आवेदन की आखिरी तारीख के सिर्फ दो महीने पहले किया गया है, इसने उन सभी छात्रों की उम्मीदों को चकनाचूर कर दिया है जो आने वाले अकादमिक वर्ष में इस छात्रवृत्ति के सहारे विश्वविद्यालयों में अध्ययन का सपना देख रहे थे.

हमारे अपने संस्थान (आईआईएम, बेंगलुरु) के दो छात्रों को यूरोप के उच्च रैंकिंग वाले संस्थानों में दाखिला मिला है और वे इस योजना के जरिये छात्रवृत्ति पाकर अपना अध्ययन पूरा करने की उम्मीद में थे. इतना महत्वपूर्ण निर्णय लेने के पहले प्रभावित छात्रों या सार्वजनिक रूप से मंत्रालय द्वारा कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया.

जब 1954-55 में इस योजना की शुरुआत की गई, तब इसके अंतर्गत सिर्फ विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अभियांत्रिकी के विषयों के लिए ही छात्रवृत्ति दी जाती थी. मानविकी और समाज विज्ञान से जुड़े विषयों को वर्ष 2012 में शामिल किया गया.

वर्ष 2006 में जब संसदीय स्थायी समिति ने समाज विज्ञान जैसे विषयों को योजना से बाहर रखे जाने के कारणों को जानना चाहा, तो मंत्रालय का जवाब था कि ‘जिन विषयों के लिए भारत में ही पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं, उन्हें ओवरसीज छात्रवृत्ति की विषय सूची में शामिल नहीं किया गया है.’

इस तर्क में यह मान लिया गया है कि हाशिए के समुदाय से आने वाले छात्रों के विदेश में जाकर अध्ययन करने के पीछे का कारण सिर्फ उन विश्वविद्यालयों में मिलने वाली बेहतर सुविधाएं हैं. वंचित समुदायों से आने वाले कई छात्रों को भारतीय कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से भेदभाव का अनुभव करना पड़ता है, यह अब जगजाहिर है.

यही नहीं, विदेश के उच्च रैंकिंग वाले विश्वविद्यालयों से डॉक्टरेट करने वाले छात्रों को भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाने के बेहतर अवसर मिलते हैं. और सबसे ज़रूरी, कुछ हद तक विदेश के प्रख्यात विश्विद्यालयों से मिली डिग्री ‘मेरिट न होने’ के उस लांछन की काट होती है जो हाशिये के समुदायों के छात्रों का हमेशा पीछा करती रहती है. (उनका भी जिन्होंने आरक्षण का सहारा नहीं लिया है)

एक स्तर पर सरकार का यह कदम चौंकाने वाला भी नहीं है क्योंकि इस सरकार ने समाज विज्ञान और मानविकी विषयों पर तथ्यपरक शोध के प्रति लगातार तिरस्कार और उपेक्षा का रवैया अपनाया है. लेकिन, दलित और आदिवासी छात्रों से छात्रवृत्ति के अवसरों को छीने जाने के इस कदम को सिर्फ राष्ट्रवाद के नाम पर ज्ञान के राजनीतिकरण के पीछे की कायरता के नज़रिये से नहीं समझा जा सकता.

पिछले कुछ महीनों में अमेरिका और अन्य देशों के मुखर दलित मध्यम वर्ग ने कई संस्थानों को भारत की जाति व्यवस्था के गंभीर प्रभावों पर गौर करने पर मजबूर किया है. फॉर्च्यून 500 कंपनियों की सूची में शामिल एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के खिलाफ जाति-आधारित भेदभाव का मामला दर्ज किया गया है और कई विश्वविद्यालय में जाति को एक ‘संरक्षित श्रेणी’ के रूप में शामिल करने की पहल की गई है.

भारत के बाहर बसे दलित विचारकों का लगातार आग्रह रहा है कि वैश्विक ब्राह्मणवाद को ख़त्म किए बिना ‘वैश्विक हिंदुत्व का खात्मा’ संभव नहीं है. इसी प्रवासी दलित समुदाय ने इस तथ्य का भी पर्दाफाश किया है कि अमेरिकी शैक्षणिक संस्थानों में भारतीय छात्रों को मिलने वाले विविधता और आरक्षण संबंधी नीतियों का लगभग पूरा लाभ ‘उच्च जाति’ के छात्रों के हिस्से गया है. समाज विज्ञान और मानविकी क्षेत्र पर प्रभुत्वशाली जाति समुदायों का लगभग पूरा एकाधिकार है.

इन विषयों के भारतीय मूल के सबसे सफल विद्वानों की अगर सूची बनाई जाए, तो इसमें उन लोगों का दबदबा साफ़ दिखेगा जिन्होंने उच्च-स्तरीय अधिकारियों के साथ अपने पारिवारिक रिश्तों के लाभ से किए गए शोध के आधार पर अकादमिक क्षेत्र में अपनी साख जमाई है.

मुखर प्रवासी दलित समुदाय ने इन्हीं ब्राह्मणवादी पारिवारिक तंत्रों की पोल खोलने का काम किया है, जिसके बारे में चर्चा करने से वैश्विक संस्थानों की चौकीदारी करने वाले भारतीय मूल के विद्वान अक्सर कन्नी काट जाते हैं. श्वेत विशेषाधिकारों (White privilege) को चुनौती देते समय उन ब्राह्मणवादी विशेषाधिकारों पर अक्सर चुप्पी साध ली जाती जिनको सीढ़ी बनाकर यह विद्वान अपने मौजूदा स्थानों पर पहुंचे हैं.

प्रवासी दलित समुदाय ने प्रमुख भारतीय शैक्षणिक संस्थाओं में लगभग पूरी तरह मौजूद ब्राह्मणवादी वर्चस्व पर भी रोशनी डाली है. उदाहरण के तौर पर, हमारे अनुमान के अनुसार भारतीय प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम) में 80% प्राध्यापक सिर्फ दो जाति समूहों से आते हैं, देश की आबादी में जिनका अनुपात सिर्फ 7% है.

हमारे अपने संस्थान भारतीय प्रबंधन संस्थान (बेंगलुरु) में एक ब्राह्मण प्राध्यापक सार्वजनिक संस्थान की सुविधाओं का इस्तेमाल करते हुए अपने निजी यूट्यूब चैनल पर ‘सत्संग’ प्रसारित करते हैं. विश्व के बेहतरीन संस्थानों में प्रक्षशित आत्मविश्वास भरे बहुजन विद्वान गहरी पैठ जमा चुकी प्रभुत्व वाली इस संस्थागत संस्कृति के लिए खतरा हैं.

अपने प्रतिद्वंद्वियों पर लगातार हमला करते रहना हर फासीवादी रणनीति का हिस्सा होता है. भारतीय गणतंत्र पर हो रहे प्रत्यक्ष हमलों के बीच कुछ मुट्ठी भर छात्रों को प्रभावित करने वाले इस सरकारी दिशानिर्देश की अनदेखी करना आसान हो सकता है, लेकिन ऐसा करना एक बड़ी गलती होगी.

आधुनिक साम्राज्यों को दी गई सबसे सफलतापूर्वक चुनौतियां उन व्यक्तियों और समूहों से आई हैं जो उन साम्राज्यों की ही ‘भाषा’ बोलना जानते थे. गांधी, आंबेडकर और नेहरू सभी ब्रिटिश साम्राज्य के केंद्रों में पढ़े थे. सैकड़ों सालों से चले आ रहे दमन को चुनौती देने में सक्षम बहुजन विचारकों की एक पूरी पीढ़ी ब्राह्मणवादी साम्राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा है, और ध्यान रहे कि मौजूदा सत्ता इस ब्राह्मणवादी साम्राज्य की हर कीमत पर रक्षा करने के लिए कटिबद्ध है.

बड़ोदा सरकार द्वारा आंबेडकर को कोलंबिया विश्वविद्यालय में अध्ययन के लिए दी गई आर्थिक मदद ने आधुनिक भारत के इतिहास का रुख बदल दिया था. मौजूदा सत्ताधारी किसी और आंबेडकर का उद्भव नहीं चाहते.

यही वजह है कि भारत के सबसे बेहतरीन शैक्षणिक संस्थानों पर लगातार हमले- जिनमें शारीरिक हमले भी शामिल हैं, किए जा रहे हैं. रोहित वेमुला का अंतिम पत्र इसी ब्राह्मणवादी किले की बुनियाद पर प्रहार का प्रतीक है.

सिद्धार्थ जोशी आईआईएम बेंगलुरु में फेलो हैं और दीपक मलघाण आईआईएम, बेंगलुरु में प्राध्यापक हैं.

(मूल अंग्रेज़ी लेख से सिद्धार्थ जोशी द्वारा अनूदित)