भारत

पूर्व नौकरशाहों का सुप्रीम कोर्ट से ज़किया की याचिका पर ‘अनावश्यक टिप्पणी’ वापस लेने का आग्रह

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगा मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और 63 अन्य लोगों को एसआईटी द्वारा क्लीनचिट दिए जाने को चुनौती देने वाली ज़किया जाफ़री की याचिका बीते 24 जून को ख़ारिज कर दी थी. पूर्व नौकरशाहों ने अपने पत्र में कहा है कि इस निर्णय का सबसे ख़तरनाक हिस्सा यह है कि अदालत एक सिद्धांत के साथ सामने आई है, जो राज्य को उन व्यक्तियों को गिरफ़्तार कर मुक़दमा चलाने का आदेश देता है, जो जांच एजेंसियों के निष्कर्षों पर सवाल उठाने का साहस करते हैं.

ज़किया जाफ़री. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: पूर्व नौकरशाहों के एक समूह ने गुजरात में 2002 के सांप्रदायिक दंगों में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को विशेष जांच दल (एसआईटी) की क्लीनचिट को बरकरार रखते हुए सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़, पूर्व पुलिस अधिकारियों आरबी श्रीकुमार और संजीव भट्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की ‘अनावश्यक टिप्पणी’ वापस लेने का बुधवार को अनुरोध किया.

समूह ने एक ‘खुले पत्र’ में शीर्ष अदालत से इस आशय का स्पष्टीकरण जारी करने को भी कहा कि यह उनका इरादा नहीं था कि सीतलवाड़ को गिरफ्तारी का सामना करना चाहिए, जिसे फैसले के एक दिन बाद हिरासत में लिया गया था और अगले दिन गुजरात पुलिस ने दंगों के मामलों के संबंध में सबूत गढ़ने के आरोप में गिरफ्तार किया था.

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से सीतलवाड़ को बिना शर्त रिहा करने का आदेश देने का आग्रह किया.

92 पूर्व नौकरशाह द्वारा हस्ताक्षरित खुले पत्र में कहा गया है, ‘हर एक दिन की चुप्पी अदालत की प्रतिष्ठा को कमतर करती है और संविधान के मूल सिद्धांत को बनाए रखने के उसके दृढ़ संकल्प के बारे में सवाल उठाती है, जो कि राज्य के संदिग्ध कार्यों के खिलाफ जीवन और स्वतंत्रता के मूल अधिकार की रक्षा करना है.’

बयान में सवाल उठाया गया है, ‘क्या अदालतों का दरवाजा खटखटाने के संवैधानिक अधिकार के साथ इतना लापरवाह और बदला लेने वाला व्यवहार किया जा सकता है कि न्याय की मांग करने वाले लोगों को सलाखों के पीछे डाल दिया जाए?’

आगे कहा गया, ‘निर्णय का सबसे खतरनाक हिस्सा यह है कि अदालत एक सिद्धांत के साथ सामने आई है, जो राज्य को उन व्यक्तियों को गिरफ्तार करने और मुकदमा चलाने का आदेश देता है, जो जांच एजेंसियों के निष्कर्षों पर सवाल उठाने का साहस करते हैं.’

हस्ताक्षरकर्ताओं ने अदालत से इस आदेश और इसमें की गई टिप्पणियों को वापस लेने का आग्रह किया है, खासकर तब जब अदालत ने पहले ही गुजरात में 2002 की सांप्रदायिक हिंसा से संबंधित मामलों की जांच करते समय सरकारी एजेंसियों की ढिलाई पर ध्यान आकर्षिक कराया है.

हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई, पूर्व विदेश सचिव सुजाता सिंह, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह, पूर्व स्वास्थ्य सचिव के सुजाता राव, पूर्व आईपीएस अधिकारी एएस दुलत और पूर्व आईएएस अधिकारी अरुणा रॉय शामिल हैं.

बयान में कहा गया है कि जकिया एहसान जाफरी बनाम गुजरात राज्य मामले में हाल ही में तीन न्यायाधीशों की पीठ के फैसले ने नागरिकों को पूरी तरह से परेशान और निराश किया.

उन्होंने कहा कि लोग केवल अपील खारिज होने से ही नहीं बल्कि पीठ द्वारा अपीलकर्ताओं, उनके वकील और समर्थकों के बारे में ‘अनावश्यक टिप्पणी’ से हैरान हुए.

बयान में फैसले के पैरा 88 का हवाला देते हुए कहा गया है, ‘सबसे आश्चर्यजनक टिप्पणी में सुप्रीम कोर्ट ने विशेष जांच दल के अधिकारियों की सराहना की, जिन्होंने राज्य का बचाव किया है और एसआईटी के निष्कर्षों को चुनौती देने वाले अपीलकर्ताओं की आलोचना की.’

सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के गुजरात दंगा मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और 63 अन्य लोगों को विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा क्लीनचिट दिए जाने को चुनौती देने वाली जकिया जाफरी की याचिका बीते 24 जून को खारिज कर दी थी.

न्यायालय ने इसके साथ ही कहा था कि इन आरोपों के समर्थन में पुख्ता तथ्य उपलब्ध नहीं हैं कि 2002 के गोधरा दंगों को गुजरात में सर्वोच्च स्तर पर रची गई आपराधिक साजिश के कारण पूर्व-नियोजित घटना कहा जाए.

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा था, ‘अंत में हमें यह प्रतीत होता है कि गुजरात राज्य के असंतुष्ट अधिकारियों के साथ-साथ अन्य लोगों का एक संयुक्त प्रयास खुलासे करके सनसनी पैदा करना था, जो उनके अपने ज्ञान के लिए झूठे थे. वास्तव में, प्रक्रिया के इस तरह के दुरुपयोग में शामिल सभी लोगों को कटघरे में खड़ा होना चाहिए और कानून के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए.’

इसके बाद अहमदाबाद पुलिस की क्राइम ब्रांच ने सीतलवाड़, श्रीकुमार और भट्ट के खिलाफ बीते 25 जून को एक एफआईआर दर्ज की थी. तीनों पर 2002 के सांप्रदायिक दंगों के मामलों के संबंध में गलत सबूत गढ़कर कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की साजिश रचने का आरोप लगाया गया है.

एफआईआर में तीनों पर झूठे सबूत गढ़कर कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने की साजिश रचने का आरोप लगाया गया है, ताकि कई लोगों को ऐसे अपराध में फंसाया जा सके जो मौत की सजा के साथ दंडनीय हो.

सीतलवाड़ के एनजीओ ने जकिया जाफरी की कानूनी लड़ाई के दौरान उनका समर्थन किया था. जाफरी के पति एहसान जाफरी, जो कांग्रेस के सांसद भी थे, दंगों के दौरान अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसाइटी में हुए नरसंहार में मार दिए गए थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में सीतलवाड़ और उनका एनजीओ जकिया जाफरी के साथ सह-याचिकाकर्ता थे.

पूर्व नौकरशाहों ने कहा, ‘हम सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों से अपने आदेश की समीक्षा करने और पैरा 88 में निहित टिप्पणियों को वापस लेने का आग्रह करेंगे. हम उनसे उनकी बिरादरी के एक प्रतिष्ठित पूर्व सदस्य, जस्टिस मदन लोकुर द्वारा उल्लेखित कदम को अपनाने का भी अनुरोध करेंगे.’

पूर्व नौकरशाहों के मुताबिक, क्या सर्वोच्च न्यायालय ने अब यह निर्णय लिया है कि उसके समक्ष अपीलकर्ताओं और उनके वकील के खिलाफ केवल उनकी अपील को जारी रखने के लिए कार्यवाही की जानी चाहिए? एनएचआरसी की रिपोर्ट और न्यायमित्र राजू रामचंद्रन की रिपोर्ट का क्या, जिसमें कहा गया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका की जांच के लिए पड़ताल की आवश्यकता थी?

उनके अनुसार, एसआईटी द्वारा उठाए गए दृष्टिकोण पर सवाल उठाने के लिए ये वजनदार आधार थे और इसलिए वे उस याचिका को पर्याप्त महत्व देंगे जो एसआईटी के निष्कर्षों को चुनौती देने की मांग करती है. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट की अपनी पिछली टिप्पणियों में स्पष्ट रूप से राज्य सरकार के अधिकारियों की शिथिलता का उल्लेख है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)