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कर्नाटक: एनईपी के तहत मिड-डे मील से अंडे-मीट बाहर रखने, मनुस्मृति पढ़ाने का प्रस्ताव

कर्नाटक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत विशेषज्ञों की एक समिति द्वारा दिए गए पोजीशन पेपर में कहा गया है कि मिड-डे मील में अंडे और मांस के नियमित सेवन से स्कूली बच्चों में जीवनशैली संबंधी विकार पैदा हो सकते हैं. एक समिति के प्रस्ताव में पाइथागोरस प्रमेय को ‘फ़र्ज़ी’ बताते हुए कहा गया है कि न्यूटन के सिर पर सेब गिरने की ‘अप्रमाणिक’ बात प्रोपगैंडा है.

Allahabad: Children attend a class at a Government school on the occasion of 'World Literacy Day', in Allahabad, Saturday, Sept 8, 2018. (PTI Photo) (PTI9_8_2018_000090B)

(प्रतीकात्मक तस्वीर: पीटीआई)

बेंगलुरु: कर्नाटक में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत एक स्थिति पत्र (पोजीशन पेपर) में कहा गया है कि स्कूली बच्चों को मिड-डे मील (मध्याह्न भोजन) में अंडा परोसने से उनके अंदर जीवनशैली संबंधी विकार पैदा हो सकते हैं.

द हिंदू की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रीय शिक्षा नीति के स्वास्थ्य और कल्याण संबंधी स्थिति पत्र में कहा गया है कि मिड-डे मील में स्कूली बच्चों को अंडे परोसने से छात्रों के बीच भेदभाव होगा और भारतीयों के छोटे शारीरिक ढांचे को देखते हुए अंडे और मांस के नियमित सेवन से उन्हें कोलेस्ट्रॉल से मिलने वाली अतिरिक्त ऊर्जा उनके अंदर जीवनशैली संबंधी विकारों को जन्म देगी.

इस स्थिति पत्र को बेंगलुरु के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और तंत्रिका विज्ञान संस्थान (निमहंस) में बाल और किशोर मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर और प्रमुख जॉन विजय सागर की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने तैयार किया है.

समिति का कहना है, ‘समान कक्षा के छात्रों को अलग-अलग खाना परोसने से बच्चों में पोषक तत्वों के वितरण में असंतुलन पैदा हो जाएगा. उदाहरण के लिए, समान कक्षा के छात्रों को अन्य व्यंजन या खाना परोसना, जैसे अंडा बनाम दालें या अंडा बनाम केला, बच्चों में पोषक तत्वों के असंतुलन को बढ़ावा देगा.’

समिति ने साथ ही यह भी कारण दिया कि बच्चों में ऐसे मनोभाव विकसित होंगे जिनका परिणाम दोस्तों के बीच भावनात्मक बाधा लाएगा.

समिति ने कहा, ‘सभी बच्चों के साथ बिना भेदभाव के समान व्यवहार करना असली भारतीय दर्शन या धर्म है.’

समिति ने सिफारिश की है कि ‘सात्विक भोजन’ जैसे कि मूंगफली, तिल के लड्डू या गुड़ की चिक्की ‘प्राकृतिक भोजन’ हैं. यह अवरुद्ध विकास और एनीमिया को दूर करने में मदद करते हैं.

एनईपी के कार्यान्वयन के लिए एनसीईआरटी की वेबसाइ़ट पर स्थिति पत्र (पोजीशन पेपर) अपलोड करना अनिवार्य है. शिक्षा मंत्रालय इन पत्रों का इस्तेमाल प्रत्येक विषय को संकलित करने, सुझाव लेने और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम ढांचे का निर्माण करने के दौरान करेगा.

राज्य सरकार ने स्कूली शिक्षा में विभिन्न विषयों पर स्थिति पत्र तैयार करने और एनसीईआरटी को सौंपने के लिए 26 समितियां गठित की हैं, डॉ. सागर पोषण के क्षेत्र में सिफारिशें देने वाली समिति के अध्यक्ष हैं.

उन्होंने अपनी सिफारिशों में अन्य देशों के अध्ययन का हवाला देते हुए कहा है कि पशु-आधारित भोजन मनुष्यों में हार्मोन संबंधी क्रियाकलापों में हस्तक्षेप करते हैं.

उन्होंने जीन-डाइट यानी डीएनए संबंधी आहार दिए जाने पर जोर दिया है भारतीय नस्ल की प्राकृतिक पसंद पर विचार करने की जरूरत है.

समिति ने यह भी सिफारिश की है, ‘भीम और हनुमान की खाने की आदतों संबंधी कहानियां सही भोजन खाने को वीरता, साहस और सफलता से जोड़ने में बच्चों की मदद करती हैं.’

दूसरी तरफ, एक तथ्य यह भी है कि राज्य सरकार शासकीय और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के बच्चों पहले से ही उबले अंडे और केले बांट रही है.

कल्याण कर्नाटक के सात जिलों और कर्नाटक पब्लिक स्कूल के प्री-प्राइमरी स्कूल के उन बच्चों जिनकी उम्र 6 से 15 साल के बीच है और वे कुपोषण, एनीमिया व प्रोटीन की कमी से जूझ रहे हैं उन्हें उबले अंडे और केले दिए जाते हैं. इस कार्यक्रम को सरकार पूरे राज्य में विस्तारित करने की योजना बना रही है.

स्थिति पत्रों में भारत का ज्ञान (नॉलेज ऑफ इंडिया), वैल्यू एजुकेशन, सामाजिक विज्ञान शिक्षा, पूर्व-विद्यालयी शिक्षा और  फाउंडेशन लिट्रेसी और गणना कौशल, हेल्थ एंड वेल बीइंग एन्वॉयरमेंटल एजुकेशन और अन्य शामिल थे.

स्थिति पत्रों में किए गए कुछ प्रस्तावों पर विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की है.

‘पाइथागोरस प्रमेय फर्जी, न्यूटन के सिर पर सेब गिरने की बात प्रोपगैंडा’

नॉलेज फॉर इंडिया के लिए गठित समिति, जिसकी अध्यक्षता आईआईटी (बीएचयू) केवी रामनाथन ने की थी, ने बताया कि पाइथागोरस प्रमेय ‘फर्जी’ है और न्यूटन के सेब की ‘अप्रमाणिक कहानी प्रोपगैंडा’ है.

समिति ने सभी बच्चों को संस्कृत को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाने और मनुस्मृति सिखाने की वकालत की है और भूत-सांख्य जैसी प्राचीन संख्यात्मक प्रणालियों को शुरू करने का भी प्रस्ताव दिया है. पेपर में यह भी कहा गया है कि गुरुत्वाकर्षण और पाइथागोरस की जड़ें वैदिक गणित में हैं. साथ ही, कई गणितीय सिद्धांतों की उत्पत्ति कुछ प्राचीन संतों ने की थी.

डॉ. अजक्कला गिरीशा भट की अध्यक्षता वाली भाषा शिक्षा समिति ने कक्षा 1 से 12 तक कन्नड़ को अनिवार्य करने के साथ एक त्रिभाषा नीति लाने का प्रस्ताव रखा है. पेपर में कहा गया है कि पांचवीं कक्षा तक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा या स्थानीय भाषा या कन्नड़ होनी चाहिए. जब कक्षा में ऐसे बच्चे हों जिनकी मातृभाषा अंग्रेजी हो या अन्य राज्यों के बच्चे, जो स्थानीय भाषा नहीं जानते हैं, तो शिक्षण के लिए मातृभाषा, स्थानीय भाषा या कन्नड़ के अलावा अंग्रेजी का उपयोग किया जा सकता है.

आगे कहा गया है कि अन्य कक्षाओं के लिए शिक्षा का माध्यम द्विभाषी होना चाहिए. शिक्षकों को मातृभाषा या कन्नड़ और अंग्रेजी का उपयोग करना चाहिए. यह भी जोड़ा गया है कि बच्चों को इनमें से किसी भी भाषा में परीक्षा लिखने की अनुमति दी जा सकती है. यह सीबीएसई, आईसीएसई और अंतरराष्ट्रीय स्कूलों सहित सभी बोर्डों पर लागू होगा.