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छत्तीसगढ़: 2017 के बुरकापाल नक्सली हमले में गिरफ़्तार 121 आदिवासियों को अदालत ने किया बरी

छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले में बुरकापाल गांव के क़रीब 24 अप्रैल 2017 को नक्सलियों ने केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के एक दल पर घात लगाकर हमला किया था, जिसमें 25 जवानों की मौत हो गई थी. आदिवासियों की वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता बेला भाटिया ने सवाल उठाया कि उन्होंने जो अपराध नहीं किया, उसके लिए उन्हें इतने साल जेल में क्यों बिताने पड़े. इसकी भरपाई कौन करेगा.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

दंतेवाड़ा: छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले की एक विशेष अदालत ने वर्ष 2017 में बुरकापाल नक्सली हमला मामले में गिरफ्तार 121 आदिवासियों को आरोप मुक्त कर दिया है. इस घटना में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के 25 जवान शहीद हुए थे.

अदालत का यह आदेश शनिवार (16 जुलाई) को उपलब्ध हुआ.

आदेश में कहा गया है, ‘अभियोजन द्वारा दर्ज कोई सबूत या बयान यह स्थापित करने में सक्षम नहीं था कि आरोपी नक्सल समू​ह के सदस्य थे और अपराध में शामिल थे. अभियोजन पक्ष यह साबित करने में भी विफल रहा कि आरोपियों के कब्जे से कोई हथियार और गोला-बारूद बरामद किया गया था.’

आदिवासियों की ओर से अधिवक्ता बेला भाटिया ने बताया कि विशेष न्यायाधीश (एनआईए अधिनियम/अनुसूचित अपराध) दीपक कुमार देशलरे की अदालत ने शुक्रवार (15 जुलाई) को बुरकापाल नक्सली हमले के आरोपी आदिवासियों को आरोप मुक्त कर दिया.

भाटिया ने बताया कि अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि आरोपियों के खिलाफ जिन गवाहों को पेश किया गया, उनमें से किसी का भी बयान यह विश्वास किए जाने योग्य नहीं है कि आरोपी प्रतिबंधित नक्सली संगठन के सक्रिय सदस्य हैं तथा घटना में संलिप्त रहे हैं.

अदालत ने कहा कि इन आरोपियों के पास से कोई घातक आयुध एवं आग्नेय शस्त्र भी बरामद नहीं हुआ है. ऐसी स्थिति में इन आरोपियों पर लगाए गए अभियोग को प्रमाणित करने के लिए पुख्ता सबूत नहीं हैं.

गौरतलब है कि 24 अप्रैल 2017 को नक्सलियों ने सुकमा जिले के बुरकापाल गांव के करीब केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के एक दल पर घात लगाकर हमला किया था, जिसमें 25 जवानों की मौत हुई थी. सीआरपीएफ की टीम बुरकापाल और जगरगुंडा के बीच के इलाके की सुरक्षा कर रही थी, जहां सड़क का निर्माण हो रहा था.

दंतेवाड़ा के ताडेमेटला वन क्षेत्र में 2010 में सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या के बाद बस्तर क्षेत्र में यह दूसरा सबसे घातक हमला था.

क्षेत्र में मानवाधिकार के लिए कार्य करने वाली भाटिया ने बताया कि घटना के बाद सुरक्षा बलों ने एक महिला समेत 121 आदिवासियों को गिरफ्तार कर लिया था. अधिकांश गिरफ्तारियां वर्ष 2017 में हुई थीं, जबकि कुछ 2018 और 2019 में हुई थी. सभी को विभिन्न धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया था.

इन लोगों को छह गांवों बुरकापाल, गोंडापल्ली, चिंतागुफा, तलमेटला, कोराइगुंडम और तोंगुडा से गिरफ्तार किया गया था.

उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), शस्त्र अधिनियम, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, छत्तीसगढ़ विशेष सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था.

आदिवासियों के बरी होने फैसले को लेकर भाटिया ने कहा, ‘हालांकि उन्हें न्याय मिल गया है, फिर भी उन्होंने जो अपराध नहीं किया, उसके लिए उन्हें इतने साल जेल में क्यों बिताने पड़े. इसकी भरपाई कौन करेगा.’

बेला भाटिया ने हिंदुस्तान टाइम्स से बातचीत में कहा कि आरोपियों को सुनवाई के दौरान केवल दो बार अदालत में पेश किया गया था, जबकि हर सुनवाई में आरोपी को व्यक्तिगत रूप से पेश करना अनिवार्य होता है.

उन्होंने कहा, ‘इससे पहले हाईकोर्ट के साथ जिला स्तर पर एनआईए अदालत में उनकी जमानत से इनकार कर दिया गया था.’

उन्होंने सवाल उठाया, ‘क्या राज्य पुलिस पर नक्सलियों के खिलाफ लड़ाई में आम ग्रामीणों को बलि का बकरा बनाने की आपराधिक साजिश का आरोप नहीं लगाया जाना चाहिए? क्या राज्य उन्हें उनके खोए हुए समय या इस दौरान उनकी प्रभावित कमाई की भरपाई करेगा?’

आरोपियों में से एक हेमाला अयातु ने बताया कि उन्हें बिना किसी कारण के दंडित किया गया था.

उन्होंने कहा, ‘मुझे पुलिस ने सुकमा से उठाया था. मैंने सब कुछ खो दिया. मैंने कुछ नहीं किया था, लेकिन मुझे गिरफ्तार कर लिया गया. जेल में पांच साल के अपने दर्द को बयां करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं.’

बस्तर क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक पी. सुंदरराज ने कहा कि अदालत के आदेश के अनुपालन में जगदलपुर केंद्रीय जेल में बंद 110 और दंतेवाड़ा जिला जेल में तीन सहित 113 आरोपियों को रिहा किया जाएगा.

सुंदरराज ने कहा कि शेष आठ आरोपियों को रिहा नहीं किया जाएगा, क्योंकि वे कुछ अन्य विचाराधीन मामलों में न्यायिक हिरासत में हैं.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)