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यूजीसी ने नए दिशानिर्देश जारी किए, उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ाने के लिए पीएचडी अनिवार्य नहीं

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, किसी उच्च शिक्षण संस्थान में फैकल्टी के स्वीकृत पदों में से 10 फीसदी पद ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ के हो सकते हैं, जिन पर विभिन्न क्षेत्रों में 15 वर्ष का अनुभव रखने वाले पेशेवरों की नियुक्ति की जा सकती है.

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा शुक्रवार को जारी दिशानिर्देशों के अनुसार, अब उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ नाम से एक फैकल्टी पद होगा जो औपचारिक शैक्षणिक योग्यता के बिना भी उद्योग और पेशेवर विशेषज्ञों द्वारा भरा जा सकता है.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, नियम कहते हैं कि एक उच्च शिक्षण संस्थान में स्वीकृत पदों में से 10 प्रतिशत तक ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ के पद हो सकते हैं, जिनका अधिकतम कार्यकाल चार साल का होगा.

योग्य उम्मीदवारों को कम से कम 15 साल की सेवा या अनुभव होना चाहिए, जिन्होंने विज्ञान और प्रौद्योगिकी और सामाजिक विज्ञान से लेकर मीडिया और सशस्त्र बलों तक व अन्य क्षेत्रों में अपने पेशे में उल्लेखनीय योगदान दिया हो.

वर्तमान में नियमित प्रोफेसर या एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में भर्ती के लिए पीएचडी की आवश्यकता होती है.

दिशानिर्देशों में कहा गया है कि इस नए पद के लिए, ‘औपचारिक शैक्षणिक योग्यता को अनिवार्य नहीं माना गया है, यदि इसके बदले में उनके पास अनुकरणीय पेशेवर अनुभव हो तो. इन विशेषज्ञों को प्रोफेसर स्तर पर फैकल्टी सदस्यों की भर्ती के लिए प्रकाशनों (publications) की आवश्यकता और अन्य योग्यता मापदंडों से भी छूट दी जाएगी. हालांकि, उनके पास संबंधित अनुभाग में कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को पूरा करने का कौशल होना चाहिए.’

यूजीसी ने कहा कि यह कदम विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में ‘फैकल्टी को बढ़ाने’ में मदद करेगा, साथ ही कक्षाओं में जरूरी कौशल की कमी वाले छात्र वास्तविक दुनिया के अनुभवों से रूबरू होंगे।

दिशानिर्देशों में कहा गया है, ‘अब कई उद्योग स्नातक किए विद्यार्थियों को नियुक्ति देते हैं और उन्हें नौकरी देने से पहले पर्याप्त प्रशिक्षण देते हैं. शिक्षण में उद्योग के विशेषज्ञों को शामिल करने से उद्योग और उच्च शिक्षण संस्थाओं दोनों को लाभ होगा.’

बताया गया है कि अब पदों के लिए तीन नई श्रेणियां बनाई गई हैं: उद्योग द्वारा वित्त पोषित ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’, उच्च शिक्षण संस्थानों द्वारा अपने संसाधनों से वित्त पोषित ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ और मानद आधार पर ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’.

दिशानिर्देशों के मुताबिक, ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ पाठ्यक्रम के विकास और उसे डिजाइन करने में शामिल होंगे, और ‘संस्थागत नीतियों के अनुसार’ व्याख्यान भी देंगे. उनसे उद्योग-अकादमिक सहयोग को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने की भी उम्मीद की जाएगी.

दिशानिर्देशों में कहा गया है कि किसी संस्थान में सेवा की अधिकतम अवधि तीन साल से अधिक नहीं होनी चाहिए, जिसे असाधारण मामलों में एक साल तक बढ़ाया जा सकता है.

सरकार द्वारा जुलाई में लोकसभा में साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 6,549 फैकल्टी के पद खाली हैं.