लोकसभा: मणिपुर में राष्ट्रपति शासन को रात दो बजे मात्र 40 मिनट में मंज़ूरी दी गई

बीते फरवरी में मणिपुर में सीएम एन. बीरेन सिंह के इस्तीफ़े के बाद राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था. अनुच्छेद 356 के अनुसार, राष्ट्रपति शासन लागू होने के दो महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा इसे मंज़ूरी मिलनी चाहिए. बुधवार को देर रात 40 मिनट की चर्चा के बाद लोकसभा में इसे मंज़ूर किया गया.

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फाइल फोटो: लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह. (स्क्रीनग्रैब साभार: यूट्यूब/संसद टीवी)

नई दिल्ली: पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में जातीय हिंसा भड़कने के 23 महीने बाद और राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होने के लगभग दो महीने बाद बुधवार (3 अप्रैल) को तड़के 2 बजे लोकसभा में मणिपुर में राष्ट्रपति शासन की घोषणा के वैधानिक संकल्प पर चर्चा शुरू हुई.

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इस मुद्दे को तब उठाया, जब सदन में 12 घंटे की बहस के बाद वक्फ संशोधन अधिनियम, 2025 पारित कर दिया गया. इस समय घड़ी में 2 बजे बजने को थे.

मालूम हो कि ये चर्चा लगभग 40 मिनट तक चली, जिसमें सांसदों ने जल्दबाजी में भाषण दिए.

विपक्षी सदस्यों ने इतनी देर से चर्चा शुरू किए जाने पर विरोध जताया, लेकिन अध्यक्ष बिरला ने इस विषय पर चर्चा जारी रखी. चर्चा करीब 30 मिनट तक चली, जिसके बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने करीब 10 मिनट तक अपना जवाब दिया.

ज्ञात हो कि अनुच्छेद 356 के अनुसार राष्ट्रपति शासन लागू होने के दो महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा इसे मंज़ूरी मिलनी चाहिए. संसद का चालू बजट सत्र 4 अप्रैल को समाप्त होने वाला है.

‘अपना काम नहीं किया’

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने इस बहस की शुरुआत करते हुए कहा कि देर होने के कारण उन्हें यह कहना पड़ रहा है कि ‘कभी न से देर भली है.’

उन्होंने कहा, ‘मुझे कहना चाहिए कि मैं इस समय यह कहने के लिए बहुत उत्सुक हूं कि कभी न होने से देर बेहतर है. हम सभी ने मणिपुर की भयावहता देखी है. 2023 में अशांति शुरू होने के बाद से यह धीरे-धीरे बढ़ी है, जो राष्ट्रपति शासन की घोषणा से पहले 21 महीने तक जारी है. इस दौरान हमने कम से कम 200 लोगों को मरते, 6.5 लाख गोला-बारूद लूटते, 70,000 से अधिक लोगों को विस्थापित होते और हज़ारों लोगों को राहत शिविरों में रहने के लिए मजबूर होते देखा है. और यह ऐसे समय में हो रहा है जब स्पष्ट रूप से कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार लोगों ने अपना काम नहीं किया है.’

थरूर ने कहा कि मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू करने का यह 11वां मामला है, उन्होंने कहा कि यह स्थिति राष्ट्र की अंतरात्मा पर एक धब्बा है.

उन्होंने कहा कि इस मामले में ‘करीब दो साल तक कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं की गई’ और राष्ट्रपति शासन केवल मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफ़े के बाद लगाया गया.

अपने जवाब में केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने कहा कि राज्य में हिंसा की वजह ‘दंगे या आतंकवाद’ नहीं था. उन्होंने मणिपुर उच्च न्यायालय के 2023 के निर्देश का हवाला देते हुए कहा, ‘यह उच्च न्यायालय के आदेश की व्याख्या के कारण दो समूहों के बीच जातीय हिंसा थी.’

उन्होंने राज्य सरकार को मेईतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने पर विचार करने के लिए कहा.

‘विपक्ष के शासन काल का क्या?’

अमित शाह ने कहा कि वह विपक्षी शासन या भाजपा के शासन में हुई जातीय हिंसा की सूची नहीं देना चाहते थे, लेकिन फिर उन्होंने 1993 से शुरू हुई हिंसा की तीन घटनाओं को सूचीबद्ध किया.

उन्होंने कहा, ‘हमें लगता है कि हमारे शासन में कोई घटना नहीं होनी चाहिए. लेकिन हमने इसे नियंत्रित किया. हाईकोर्ट के फैसले के बाद जिन 260 लोगों की दुर्भाग्यपूर्ण मौतें हुईं, उनमें 80 फीसदी लोग हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद पहले एक महीने के दौरान मारे गए. जबकि हिंसा की तीन घटनाएं, पांच साल और छह महीने तक, यूपीए गठबंधन सरकारों के तहत हुईं.’

शाह ने कहा कि राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद सभी समुदायों के बीच बैठकें हुई हैं और इस मुद्दे का ‘राजनीतिकरण’ नहीं किया जाना चाहिए.

उन्होंने आगे कहा, ‘पिछले चार महीनों से मणिपुर में हिंसा नहीं हुई है. मैं यह नहीं कहता कि स्थिति संतोषजनक है, लेकिन यह नियंत्रण में है. मैं राष्ट्रपति शासन का अनुमोदन लेने आया हूं. कांग्रेस के पास इतने सांसद नहीं हैं कि वे अविश्वास प्रस्ताव ला सकें. पहले राष्ट्रपति शासन इसलिए नहीं लगाया गया क्योंकि हमारे मुख्यमंत्री अविश्वास प्रस्ताव का सामना नहीं कर रहे थे. जब हमारे मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दे दिया और कोई अन्य पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी, तो राष्ट्रपति शासन लगाया गया. सरकार शांति चाहती है और घावों को भरना चाहती है.’

‘ईमानदारी से बोलने का समय’

चर्चा के दौरान समाजवादी पार्टी के सांसद लालजी वर्मा ने कहा कि विपक्ष की लगातार मांग के बावजूद भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने मणिपुर में राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया.

उन्होंने कहा, ‘जब राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की जा रही थी, तब भाजपा सरकार ने अपनी जिद के चलते अल्पसंख्यकों को डराया और राष्ट्रपति शासन नहीं लगाया. जिस तरह अल्पसंख्यकों को डराने के लिए वक्फ बिल लाया गया, उसी तरह मणिपुर में भी अल्पसंख्यकों को डराया गया और हिंसा रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया. सभी विपक्षी दलों ने एकजुट होकर राष्ट्रपति शासन की मांग की थी. हम इस प्रस्ताव के साथ हैं, लेकिन सरकार को सामान्य स्थिति सुनिश्चित करनी चाहिए और लोगों को अपनी सरकार चुनने का मौका देना चाहिए.’

डीएमके सांसद कनिमोझी ने कहा कि मणिपुर में शांति लाने के लिए कुछ नहीं किया गया है और मणिपुर में एक निर्वाचित सरकार की वापसी होनी चाहिए, जो शांति और सद्भाव सुनिश्चित करे.साथ ही वहां एक ऐसी सरकार हो, जो लोगों को एक साथ लाए न कि उनके बीच विभाजनकारी राजनीति करे.

कनिमोझी ने आगे कहा, ‘यह समय आपके लिए ईमानदार होने और इस देश के लोगों को जवाब देने का है.’

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