दिल्ली के एम्स में एक तिहाई से अधिक फैकल्टी पद ख़ाली, दो सालों से कोई भर्ती नहीं: रिपोर्ट

एक आरटीआई आवेदन के जवाब में एम्स, दिल्ली ने बताया है कि संस्थान में फैकल्टी के 1,235 स्वीकृत पदों के मुकाबले 430 सीटें रिक्त हैं. साथ ही 2023 से इस साल मार्च तक नियमित फैकल्टी पदों के लिए कोई भर्ती नहीं हुई है.

(फोटो: श्रुति शर्मा/द वायर हिंदी)

नई दिल्ली: देश के प्रमुख अस्पतालों में से एक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली में लगभग 35% फैकल्टी पद खाली हैं.

समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, सूचना के अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत दायर आवेदन के जवाब में एम्स-दिल्ली के फैकल्टी सेल के प्रशासनिक अधिकारी ने बताया कि संस्थान में फैकल्टी के 1,235 स्वीकृत पदों के मुकाबले 430 सीटें रिक्त हैं.

उक्त आवेदन आरटीआई कार्यकर्ता एमएम शुजा ने बीते जनवरी महीने  में दायर किया था, जिसमें उन्होंने एम्स, दिल्ली के कामकाज के बारे में जानकारी मांगी थी.

18 मार्च को दिए जवाब में संस्थान ने बताया  किया कि उसने 2019 में सहायक प्रोफेसरों के 172 पदों के लिए विज्ञापन दिया था, लेकिन केवल 110 उम्मीदवार ही शामिल हुए. इसके बाद साल 2021 और 2022 में नर्सिंग कॉलेज में 270 रिक्त पदों के लिए विज्ञापन दिया गया था, लेकिन केवल 173 सहायक प्रोफेसर और तीन एसोसिएट प्रोफेसरों ने ही संस्थान जॉइन किया.

आगे बताया गया है कि 2020, 2023, 2024 और इस वर्ष के पहले तीन महीनों में नियमित फैकल्टी पदों के लिए कोई भर्ती नहीं हुई है.

एम्स में सब ठीक नहीं!

उल्लेखनीय है कि एम्स, दिल्ली के कामकाज पर सवालों को लेकर द वायर हिंदी ने एक श्रृंखला ‘एम्स के स्याह गलियारे प्रकाशित की है, जिसमें संस्थान में हुई विभिन्न अनियमितताओं को दर्ज किया गया है.

इसके पहले भाग में एम्स में सर्जिकल ग्लव्स की खरीद में हुई अनियमितताओं के बारे में बताया गया है. आरोप है कि एम्स प्रशासन ने सस्ती दरों पर उपलब्ध दस्तानों को नज़रअंदाज किया और कहीं ऊंचे दाम पर उनकी आपूर्ति की अनुमति दी, जिससे सरकारी खजाने को काफ़ी नुकसान पहुंचा.

स्वास्थ्य मंत्रालय पिछले पंद्रह महीनों में दो बार एम्स को ग्लव्स की इस खरीद को लेकर पत्र लिख चुका है, लेकिन निदेशक ने कोई जवाब तक नहीं दिया है.

श्रृंखला के दूसरे भाग में ऐसे प्रकरण की पड़ताल है, जहां एम्स के जय प्रकाश नारायण एपेक्स ट्रॉमा सेंटर ने सरकार को करीब पचास लाख रुपये का नुकसान पहुंचाया, एम्स के एक वरिष्ठ अधिकारी पर ‘रिश्वत’ मांगने और ‘बदले की भावना’ से प्रेरित होकर काम करने के आरोप लगे, लेकिन इस बार भी एम्स ने स्वास्थ्य मंत्रालय के नोटिस का जवाब नहीं दिया.

तीसरी रिपोर्ट एम्स की महिला स्टाफ के यौन उत्पीड़न पर केंद्रित है, जिन्होंने लंबी लड़ाई लड़ी, लेकिन उन्हें अब तक न्याय नहीं मिला.

मामला एम्स-झज्जर में कार्यरत हरियाणा की एक दलित फार्मासिस्ट से जुड़ा था, जिन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत की थी. संस्थान की जांच समिति ने आरोपी के कृत्यों की पुष्टि की, पर एम्स ने कार्रवाई करने की बजाय उन्हें प्रमोशन दे दिया.  अब महिला के पिता इंसाफ के लिए दर-दर भटक रहे हैं, स्वास्थ्य मंत्रालय और राष्ट्रीय महिला आयोग भी एम्स के निदेशक से जवाब मांग रहे हैं, लेकिन देश का प्रमुख चिकित्सा संस्थान खामोश है.