नई दिल्ली: 11वीं शताब्दी के सैयद सालार मसूद गाजी, जिन्हें गजनवी शासक महमूद गजनवी का भतीजा माना जाता है, की दरगाह पर हर साल लगने वाला सदियों पुराना जेठ मेला इस साल नहीं लगेगा, क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने इसकी अनुमति देने से इनकार कर दिया है.
हालांकि, अधिकारियों ने कहा कि मेले के लिए अनुमति न देने का निर्णय कानून और व्यवस्था, विशेष रूप से पहलगाम हमले के बाद के माहौल के दृष्टिकोण से लिया गया है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि तब तैयार हो गई थी, जब मार्च में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मसूद गाजी का परोक्ष संदर्भ देते हुए कहा था कि एक ‘आक्रमणकारी’ का ‘महिमामंडन’ देशद्रोह की नींव को मजबूत करने के समान है.
मार्च में ही यूपी के कई जिलों में पुलिस ने गाजी मियां (जैसा कि वह लोकप्रिय रूप से जाना जाता है) से जुड़े मेलों और त्योहारों पर प्रतिबंध लगा दिया था. संभल में पुलिस ने वार्षिक नेजा मेले के लिए अनुमति देने से इनकार कर दिया था, यह कहते हुए कि एक आक्रमणकारी, लुटेरे और हत्यारे के सम्मान में एक कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, भले ही यह पारंपरिक रूप से हर साल आयोजित किया जाता हो.
अब सरकार ने मध्य-पूर्वी उत्तर प्रदेश में भारत-नेपाल सीमा के पास स्थित बहराइच जिले में गाजी मियां की दरगाह पर आयोजित होने वाले सबसे बड़े और सबसे लोकप्रिय वार्षिक मेले को अनुमति देने से इनकार कर दिया है. हर साल लाखों लोग – हिंदू और मुसलमान दोनों, पारंपरिक रूप से इसमें शामिल होते रहे हैं और इसे क्षेत्र की मिली-जुली संस्कृति का उदाहरण माना जाता है.
गाजी मियां को खलनायक के रूप में पेश करने का संघ परिवार का संगठित प्रयास
पिछले कुछ दशकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सहयोगी संगठनों ने गाजी मियां की कहानी को मौजूदा राजनीति में थोपने की कोशिश की है और उन्हें एक खलनायक के रूप में पेश किया है, जिनकी हत्या पिछड़ी जाति के हिंदू योद्धा महाराजा सुहेलदेव ने की थी, जिन्हें आज राजभर और पासी समुदाय अपना आदर्श मानते हैं.
गाजी मियां की कहानी को सांप्रदायिक रूप देने का हिंदुत्ववादी वर्जन उनकी दरगाह पर निभाई जाने वाली सद्भाव की संस्कृति के विपरीत है.
मुसलमान गाजी मियां को संत मानते हैं, जबकि हिंदू इस दरगाह पर जाते हैं क्योंकि उनका मानना है कि वहां प्रार्थना करने से उनकी मनोकामना पूरी होती है. कुछ समुदाय गाजी मियां की बारात भी निकालते हैं क्योंकि उनका मानना है कि उनकी शादी से ठीक पहले उनकी हत्या कर दी गई थी.
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने दलितों और ओबीसी को मुसलमानों के खिलाफ खड़ा करने के लिए एक महान भर सरदार सुहेलदेव की कहानी का इस्तेमाल करने की कोशिश की है. आरएसएस की कल्पना में सुहेलदेव एक आदर्श हिंदुत्व के सिपाही थे जिन्होंने 150 वर्षों तक क्षेत्र के इस्लामीकरण को रोका.
अब तक भाजपा ने गाजी मियां की विरासत को छुपाने के लिए सुहेलदेव का महिमामंडन करने के कई कदम उठाए हैं, लेकिन गाजी मियां से जुड़े मेलों और त्योहारों को रद्द करना, सीधे तौर पर इस दरगाह को हाशिए पर डालने की एक नई प्रवृत्ति की शुरुआत लगती है.
बहराइच की सिटी मजिस्ट्रेट शालिनी प्रभाकर ने बताया कि गाजी मियां की दरगाह की प्रबंध समिति ने इस साल के जेठ मेले के बारे में डीएम को पत्र लिखा है. प्रशासन ने पुलिस और जिला अधिकारियों सहित विभिन्न स्रोतों से रिपोर्ट मांगी है. प्रभाकर ने कहा, ‘उनकी रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कानून और व्यवस्था की दृष्टि से तथा विभिन्न अन्य परिस्थितियों के कारण मेले के लिए अनुमति नहीं दी जानी चाहिए.’
पुलिस उपाधीक्षक पहुप सिंह ने कहा कि चूंकि मेले में लाखों लोग आते हैं, इसलिए शांति एवं सुरक्षा की दृष्टि से मंजूरी नहीं दी जा सकती.
अधिकारी ने बताया कि पहलगाम आतंकी हमले, वक्फ विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन और पिछले साल संभल में हुई हिंसा के कारण ‘विरोध और आक्रोश’ की स्थिति बनी हुई है.
मार्च में नेजा मेला विवाद शुरू होने तक बहराइच जिले की आधिकारिक वेबसाइट, जहां गाजी का मकबरा स्थित है, में इस स्थल को पर्यटकों की रुचि के एक समन्वित स्थान के रूप में प्रचारित किया. इसमें उनकी याद में आयोजित होने वाले वार्षिक मेले को क्षेत्र में मनाए जाने वाले प्रमुख त्योहारों में से एक के रूप में दर्ज किया.
बहराइच जिले की आधिकारिक वेबसाइट ने गाजी को समर्पित दरगाह की दो तस्वीरें भी लगाई हुई हैं, जिसमें उन्हें ‘ग्यारहवीं शताब्दी का प्रसिद्ध इस्लामी संत और सैनिक’ बताया गया है.
वेबसाइट पर कहा गया है, ‘हजरत गाजी सैय्यद सालार मसूद ग्यारहवीं सदी के एक प्रसिद्ध इस्लामी संत और सैनिक थे. उनकी दरगाह मुसलमानों और हिंदुओं दोनों के लिए श्रद्धा का स्थान है. इसे फिरोज शाह तुगलक ने बनवाया था. ऐसा माना जाता है कि इस दरगाह के पानी में स्नान करने वाले लोग सभी त्वचा रोगों से मुक्त हो जाते हैं. दरगाह पर होने वाले वार्षिक उत्सव (उर्स) में देश के दूर-दराज के इलाकों से हजारों लोग आते हैं.’
हालांकि, 4 मई को अंतिम बार जांचने पर ऐसा प्रतीत हुआ कि ये विवरण वेबसाइट से हटा दिए गए हैं.
इस साल 20 मार्च को मुख्यमंत्री आदित्यनाथ बहराइच में थे, जहां उन्होंने गाजी मियां को हराने के लिए सुहेलदेव की ‘बहादुरी और साहस’ की सराहना की, तथा गाजी मियां को विदेशी आक्रमणकारी बताया.
गाजी मियां की विरासत के जश्न का परोक्ष संदर्भ देते हुए आदित्यनाथ ने कहा कि एक ‘आक्रमणकारी’ का ‘महिमामंडन’ करने का मतलब ‘देशद्रोह की नींव को मजबूत करना’ है.
आदित्यनाथ ने कहा, ‘स्वतंत्र भारत ऐसे गद्दार को स्वीकार नहीं करेगा. जो कोई भी भारत के प्रतीकों का अपमान करता है और उन आक्रमणकारियों का महिमामंडन करता है जिन्होंने भारत की संस्कृति और परंपरा को रौंदा, हमारी बहनों और बेटियों के सम्मान को निशाना बनाया और हमारी आस्था पर हमला किया, यह नया भारत इसे स्वीकार करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है.’
फैसले की आलोचना
बहराइच से समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व विधायक यासर शाह ने मेले को अनुमति न देने के प्रशासन के फैसले की आलोचना की.
शाह ने कहा, ‘सदियों से बहराइच का दरगाह मेला न केवल इस शहर की पहचान रहा है, बल्कि यहां के लोगों की भी पहचान रहा है – चाहे उनका धर्म या जाति कुछ भी हो. यह मेला हमारी एकता, आस्था और साझा विरासत का उदाहरण है.’
पूर्व विधायक ने आदित्यनाथ सरकार पर ‘इस पहचान को मिटाने की कोशिश’ करने का आरोप लगाया.
शाह ने कहा, ‘जिले के भाजपा नेता चुप हैं. सबको पता है कि उन पर कितना दबाव है, लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने भी कभी न कभी उस दरगाह पर माथा टेका है, दुआ मांगी है और अपनी आस्था दिखाई है.’
उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि ‘सामाजिक सौहार्द का प्रतीक’ यह मेला आठ सौ सालों से लग रहा है, लेकिन इस स्थल पर कभी भी कानून-व्यवस्था की कोई समस्या नहीं आई.
शाह ने पूछा, ‘क्या राज्य सरकार यह स्वीकार करती है कि वह अब जनता को सुरक्षा देने की स्थिति में नहीं है और क्या राज्य के हर जिले में कमोबेश यही स्थिति है? क्या ऐसी सरकार जो अपने नागरिकों को सुरक्षा नहीं दे सकती, उसके सत्ता में बने रहने का कोई नैतिक आधार है?’
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