नई दिल्ली: 15 जून, 2025 को लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तर प्रदेश पुलिस की ‘अब तक की सबसे बड़ी भर्ती प्रक्रिया’ के अंतर्गत चुने गए 60,244 सिपाहियों को नियुक्ति पत्र सौंपे.
उन्होंने इस भर्ती को पूरी तरह पारदर्शी बताते हुए दावा किया कि न तो कोई सिफारिश चली, न रिश्वत और न ही जाति-बिरादरी देखी गई — सिर्फ योग्यता के आधार पर चयन हुआ.
यह दावा कितना सही है?
गृह मंत्री का दावा कई स्तरों पर प्रश्नांकित हो जाता है.
पहला, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में दावा करते वक्त अमित शाह भूल गए कि पिछले साल ठीक इसी परीक्षा, यानी ‘आरक्षी नागरिक पुलिस सीधी भर्ती-2023’ पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप लगे थे और इसकी जांच यूपी एसटीएफ ने की थी. वे भूल गए कि साल भर पहले पेपर लीक होने की वजह से उत्तर प्रदेश सरकार को यह परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी.
उसके बाद फिर दोबारा परीक्षा हुई थी जिसके बाद अब जाकर भर्तियां हुई हैं. इस दूसरी परीक्षा की पारदर्शिता का दावा करने से पहले पिछले साल रद्द हुई परीक्षा का ज़िक्र करना बेहतर होता जिसने असंख्य अभ्यर्थियों का जीवन दांव पर लगा दिया था.
दूसरा, अमित शाह ने अनदेखा कर दिया कि इस परीक्षा को आयोजित करवाने वाली कंपनी एडुटेस्ट सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड को बिहार सरकार ने एक अन्य पेपर लीक प्रकरण में बहुत पहले प्रतिबंधित कर दिया था. इसके बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने इस कंपनी को फिर से परीक्षा आयोजित करने का ठेका दे दिया था.
तीसरा, अमित शाह भूल गए कि यह कंपनी दरअसल गुजरात की है और इसके भाजपा नेताओं से संबंध रहे हैं.
चौथा, उन्होंने यह भी ध्यान नहीं दिया कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 20 जून, 2024 को ब्लैकलिस्ट किए जाने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली संस्था सीएसआईआर (वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद) ने सेक्शन ऑफिसर (एसओ) और असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर (एएसओ) के पदों पर भर्ती के लिए एडुटेस्ट की सेवाओं को लेना जारी रखा, जिसमें भीषण अनियमितता के आरोप लगे.
यानी, जिस परीक्षा को देश के गृह मंत्री ने पारदर्शी बताया, न सिर्फ़ उसका इतिहास पेपर लीक और भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है, बल्कि उस परीक्षा को आयोजित करवाने वाली कंपनी प्रतिबंधित होती रही है–और इन प्रतिबंधों के बावजूद यह कंपनी तमाम परीक्षाएं आयोजित करवाती रही है.
पेपर लीक के इतिहास वाली परीक्षा
उत्तर प्रदेश पुलिस में कॉन्स्टेबल भर्ती के लिए 17 और 18 फ़रवरी 2024 को परीक्षा आयोजित की गई थी. 48 लाख से अधिक युवाओं ने हिस्सा लिया था. लेकिन प्रश्न-पत्र लीक होने के आरोप के बाद दोबारा परीक्षा कराने की मांग उठने लगी.
इस केस में राज्य के विभिन्न हिस्सों से 120 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया. ये लोग नकल करते पकड़े गए थे. कुछ लोगों को असली अभ्यर्थियों की जगह परीक्षा में बैठने के आरोप में गिरफ्तार किया गया, जबकि कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अभ्यर्थियों के साथ धोखाधड़ी की थी.
तत्कालीन पुलिस महानिदेशक प्रशांत कुमार ने कहा था, ‘कुल 122 गिरफ्तार लोगों में से 15 को एटा में, नौ-नौ को मऊ, प्रयागराज और सिद्धार्थनगर में, आठ को गाज़ीपुर में, सात को आज़मगढ़ में, छह को गोरखपुर में, पांच को जौनपुर में, चार को फिरोजाबाद में, तीन-तीन को कौशांबी और हाथरस में, दो-दो को झांसी, वाराणसी, आगरा और कानपुर में, और एक-एक को बलिया, देवरिया और बिजनौर से गिरफ्तार किया गया है.’
स्पष्ट है कि इस परीक्षा में हो रहा भ्रष्टाचार राज्यव्यापी था, एकाध शहरों तक सीमित नहीं था.
प्रश्नपत्र लीक के आरोप के बाद राज्य सरकार ने फरवरी 2024 में एसटीएफ गठित की थी. एसटीएफ ने मार्च 2024 में बलिया निवासी नीरज यादव को गिरफ्तार किया था. उस पर आरोप था कि उसने उम्मीदवारों को वॉट्सऐप पर उत्तर भेजे थे.
इसके अलावा भी कई गिरफ्तारियां हुई थीं.
रद्द हुई परीक्षा, लेकिन फिर उठे कंपनी पर प्रश्न
राज्यभर से अभ्यार्थियों ने लखनऊ पहुंचकर प्रतिरोध प्रदर्शन किया. अंततः योगी आदित्यनाथ ने परीक्षा रद्द करने की घोषणा की.
गुजरात की जिस एजेंसी एडुटेस्ट को यह परीक्षा आयोजित करने की ज़िम्मेदारी दी गई थी, उसे राज्य सरकार ने पेपर लीक के आरोप के बाद 20 जून, 2024 को ब्लैकलिस्ट कर दिया.
यह पहली बार नहीं था जब इस कंपनी पर सवाल उठे थे.
पिछले साल तीन भागों में प्रकाशित द वायर हिंदी ने अपनी विस्तृत रिपोर्ट में लिखा था कि यूपी में पुलिस भर्ती परीक्षा का टेंडर पाने से पहले एडुटेस्ट बिहार में परीक्षा प्रक्रियाओं में अनियमितताओं के कारण ब्लैकलिस्ट हो चुकी थी.
ब्लैकलिस्ट कंपनी की भाजपा नेताओं से करीबी
बार-बार विवादों में घिरने के बावजूद इसे भाजपा शासित राज्यों और ख़ुद नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सीएसआईआर से ठेके मिलते रहे. इस कंपनी का पंजीकरण गुजरात में हुआ था.
द वायर हिंदी की रिपोर्ट ने बताया था कि इस कंपनी को न केवल कई बार ब्लैकलिस्ट किया गया, बल्कि उसके संस्थापक निदेशक के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत तमाम बड़े भाजपा नेताओं से अच्छे संबंध हैं.
दरअसल एडुटेस्ट के संस्थापक निदेशक सुरेशचंद्र आर्य एक प्रमुख हिंदू संगठन ‘सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा’ के अध्यक्ष हैं. सभा ने साल 2018 में चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन आयोजित किया था, जिसमें भाजपा और संघ के कई वरिष्ठ नेताओं ने शिरकत की थी. महासम्मेलन के उद्घाटन समारोह में तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद पहुंचे थे और सुरेशचंद्र आर्य ने स्वागत भाषण दिया था.
फरवरी, 2023 में नई दिल्ली में दयानंद सरस्वती की 200वीं जयंती समारोह का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्घाटन किया था. आर्य समाज के इस कार्यक्रम के दौरान सुरेशचंद्र आर्य पीएम मोदी साथ मंच पर मौजूद थे. मोदी ने अपने भाषण में सुरेशचंद्र का उल्लेख भी किया था.

प्रधानमंत्री की संस्था की परीक्षा पर भी उठे प्रश्न
सुरेशचंद्र के बेटे यानी एडुटेस्ट के प्रबंध निदेशक विनीत आर्य को 2017 में परीक्षा से जुड़ी अनियमितता के मामले में जेल हुई थी, लेकिन इसके बावजूद प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली केंद्र सरकार की संस्था सीएसआईआर और कई राज्यों की भाजपा सरकारों ने एडुटेस्ट को परीक्षा आयोजित करवाने के ठेके दे दिए थे.
सीएसआईआर के सेक्शन ऑफिसर (एसओ) और असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर (एएसओ) की भर्ती परीक्षा के विभिन्न चरण में अनियमितता सामने आई थी. पहले चरण की परीक्षा पांच से 20 फरवरी 2024 के बीच देश के अलग-अलग केंद्रों पर ऑनलाइन हुई थी. आठ फरवरी, 2024 को उत्तराखंड पुलिस ने एक परीक्षा केंद्र पर छापा मार अभियुक्त अंकित धीमान को गिरफ्तार किया था, जिसने स्वीकार किया कि उसने एक अभ्यर्थी का पेपर हल कराया था.
ऐसे तमाम आरोपों के बाद अभ्यर्थियों ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (सीएटी) का रुख किया था. लेकिन वहां कोई फैसला होता उससे पहले ही 7 जुलाई, 2024 को देश के प्रमुख महानगरों में आयोजित दूसरे चरण की परीक्षा में भी कुव्यवस्था और गड़बड़ियां सामने आ गईं.
ज़ाहिर है, अगर अमित शाह ने उत्तर प्रदेश की पुलिस भर्ती परीक्षा के अतीत और इस परीक्षा को आयोजित करने वाली कंपनी के इतिहास को टटोला होता, तो शायद वे ‘भ्रष्टाचारविहीन प्रक्रिया’ का दावा करने के बजाय खुद उनकी सरकारों द्वारा हुई चूक का उल्लेख करते.
