नई दिल्ली: तमिलनाडु में वैगई नदी के तट पर स्थित कीलाडी इस समय सुर्खियों में है. इसकी प्रमुख वजह उत्तर बनाम दक्षिण की लड़ाई है, जिसे भारत की सभ्यता और इतिहास की जड़ों से जोड़कर देखा जा रहा है.
कीलाडी की खुदाई ने ऐसे कई रहस्य उजागर किए हैं, जिनमें आधुनिक भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक कल्पना को झकझोरने की क्षमता है. यहां मिले प्राचीन द्रविड़ शहरी संस्कृति के साक्ष्य उत्तर भारत की वैदिक-केंद्रित प्रस्तावना को चुनौती देते हैं.
द हिंदू के अनुसार, कीलाडी की खुदाई एक नियमित पुरातात्विक उत्खनन के रूप में शुरू हुई थी और फिर धीरे-धीरे एक राष्ट्रीय विवाद में बदल गई. इस खुदाई में मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े या टूटी हुई ईंट की दीवारों से कहीं अधिक देश के इतिहास से जुड़ी सामग्री भी मिली है.
इस उत्खनन से 600 ईसा पूर्व तक की परिष्कृत, शहरी, साक्षर सभ्यता के साक्ष्य मिले हैं, जो संगम युग को और भी प्राचीन बना देते हैं. इस उत्खनन के अनुसार उत्तर भारतीय वैदिक सभ्यताओं के पनपने से बहुत पहले, तमिल क्षेत्र में एक उन्नत समाज का विकास हुआ था, जिसमें शहरी नियोजन, ईंट की संरचनाएं, जल निकासी व्यवस्थाएं और तमिल-ब्राह्मी लिपि में शिलालेख शामिल थे.
इसमें चौकोर आकार की खाइयों में कालिख और राख वाली भट्टियों के अवशेष मिले हैं, जो इस बात की पुष्टि करते हैं कि कीलाडी क्वार्ट्ज, कार्नेलियन, कांच, एगेट और अन्य सामग्रियों से बने मोतियों के निर्माण का केंद्र था. फरवरी 2017 में साइट पर मिले चारकोल की कार्बन डेटिंग से यह स्थापित हुआ कि यह बस्ती 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व की है.
इस खुदाई से वैदिक सभ्यता की अहमियत पर प्रश्न लग खड़े हो गए हैं, जिसका उत्तर भारत के लोग दबदबे के रूप में अक्सर बखान करते हैं. इस खुदाई में इस बात के पुख्ता सबूत मिले हैं कि संगम युग के दौरान तमिलनाडु में शहरी सभ्यता मौजूद थी. खुदाई में मिले अवशेष सिंधु घाटी सभ्यता के साथ व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का भी संकेत देते हैं.
मालूम हो कि तमिलनाडु के राजनेताओं, खास तौर पर सत्तारूढ़ द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) के नेताओं के लिए इस खोज ने उनकी राजनीति को बड़ा आधार प्रदान किया है.
मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने इस साल जनवरी में सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को समझने में सफल होने वाले विशेषज्ञों या संगठनों के लिए 1 मिलियन डॉलर के पुरस्कार की घोषणा की थी, जिसमें बताया गया था कि तमिलनाडु में पाए गए 60% भित्तिचित्र चिह्न सिंधु मुहरों पर पाए गए प्रतीकों के समान थे.
लंबे समय से चला आ रहा विवाद
कीलाडी की खोजों ने लंबे समय से चली आ रही आर्यन-द्रविड़ खाई को और गहरा करने का काम किया है. यही कारण है कि कुछ लोग कीलाडी के निष्कर्षों को लेकर संदेह व्यक्त करते हैं.
इस खुदाई में प्रमुख मोड़ उस वक्त आया, जब साल 2017 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पुरातत्वविद् अमरनाथ रामकृष्ण का असम में स्थानांतरण कर दिया गया. अमरनाथ रामकृष्ण ने इस खुदाई के पहले दो चरणों का नेतृत्व किया था.
रामकृष्ण ने 2017 में अपने निष्कर्षों को सार्वजनिक किया था, जिससे विवाद खड़ा हो गया. इस निष्कर्ष में कुछ शिलालेख सिंधु घाटी की लिपियों के साथ संबंधों की ओर इशारा कर रहे थे, और संभावना थी कि तमिल ब्राह्मी का उद्गम 6वीं शताब्दी ईसा पूर्व (दो पुरातत्वविदों के दावे के अनुसार 580 ईसा पूर्व) तक हो सकता है, जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की अशोक की प्राकृत ब्राह्मी से भी पुराना होगा. इसका मतलब यह होगा कि स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाए जाने वाले भारतीय (विशेष रूप से दक्षिण भारतीय) इतिहास पर प्रश्न लग जायेंगे, क्योंकि तमिल की प्राचीनता और भी अधिक होगी.
रामकृष्ण के तबादले के बाद तीसरे चरण की देखरेख एक अन्य पुरातत्वविद् पीएस श्रीरामन ने की, जिन्होंने बताया कि ईंटों की संरचनाओं में कोई निरंतरता नहीं है.
इसके बाद मामला अदालत पहुंचा और मद्रास उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद खुदाई फिर से शुरू हुई. इस बार तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग ने भी इस परियोजना को हाथ में लिया और अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि कीलाडी कभी शहरी सभ्यता का स्थान था.
यह दावा अब तक पुरातत्वविदों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है.
जो लोग शहरी बस्ती के दावे पर विवाद करते हैं, वे गुजरात में हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और अन्य स्थलों का हवाला देते हैं, जिनके बारे में उनका तर्क है कि ये ‘शहरी सभ्यता के अस्तित्व के साक्ष्य हैं’, जबकि कीलाडी उनके अनुसार मात्र एक उत्खनन की जगह है, जिसके पास शहरी केंद्र होने के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं हैं.
इस मामले में एएसआई के अधिकारी अमरनाथ रामकृष्ण की 982 पन्नों की रिपोर्ट पर खुद उनकी संस्था द्वारा उठाये गए प्रश्नों ने एक नए विवाद को जन्म दिया. तमिलनाडु में इस कदम को दक्षिण से उभरने वाली खोजों के खिलाफ भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के पूर्वाग्रह का संकेत माना जाता रहा है.
केंद्र की मौजूदा सरकार इंडो-आर्यन विरासत से किसी अन्य बेहतर सभ्यता को स्वीकार करने के लिए अनिच्छुक दिखाई देती है. भारतीय संस्कृति, भाषा और धर्म पर केंद्र के रुख को देखते हुए, रामकृष्ण को एएसआई का निर्देश और उसके बाद उनका तबादला संदेह की दृष्टि से देखा जाता है.
मुख्यमंत्री स्टालिन ने इसे तमिल संस्कृति पर हमला बताया है. राज्य के एक अन्य मंत्री थंगम तेन्नरसु ने कहा है कि कीलाडी रिपोर्ट को नकारना तमिलों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाए रखने का षड्यंत्र है.
तमिलनाडु सरकार के आरोपों का जवाब देते हुए केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा कि उत्खनन रिपोर्ट जारी करने में किसी को आपत्ति नहीं है, परंतु तमिलनाडु की विरासत का सम्मान विभाजनकारी भावनाएं भड़काने के बजाय बौद्धिक ईमानदारी से होना चाहिए. असंतुष्ट द्रमुक अमरनाथ के तबादले को भी षड्यंत्र बता रही है.
कुल मिलाकर देखें, तो ये मामला वैदिक बनाम तमिल का बन गया है, जो पहले से ही चल रही उत्तर बनाम दक्षिण की लड़ाई को एक नई दिशा दे रहा है.
इसके पुरातात्विक पहलू से ज्यादा राजनीतिक विवाद पर सबकी नज़रें हैं, क्योंकि ये केंद्र की सत्ता में बैठी भाजपा नेतृत्व वाली एडीए सरकार की मान्यताओं को चुनौती दे रही है.
