सौ से ज़्यादा प्रतिष्ठित नागरिकों ने सांसदों से संसद में जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे का मुद्दा उठाने का आग्रह किया

देश के तीन संगठनों और 124 प्रतिष्ठित नागरिकों ने संसद सदस्यों को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि वे संसद के मानसून सत्र में जम्मू-कश्मीर को तत्काल और पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग करें. पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व नौकरशाह, पूर्व सैनिक, कार्यकर्ता, शिक्षाविद, वकील और पत्रकार शामिल हैं.

संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: देश के तीन संगठनों और 124 प्रतिष्ठित नागरिकों ने संसद सदस्यों को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि वे संसद के इस मानसून सत्र में जम्मू-कश्मीर को तत्काल और पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग करें.

पत्र में कहा गया है, ‘हमें यह जानकर खुशी हुई है कि इस सत्र में पहलगाम आतंकवादी हमले और उसके बाद की स्थिति, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर भी शामिल है, पर पूरी चर्चा हुई है. इस मामले में कई महत्वपूर्ण और उचित प्रश्न सार्वजनिक रूप से उठाए गए हैं. ये प्रश्न राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक मामलों, पुलिस और प्रशासन, और जम्मू-कश्मीर की समस्याओं का राजनीतिक समाधान न ढूंढ पाने से संबंधित हैं. हमें उम्मीद है कि सत्र के दौरान इनमें से कई समस्याओं का समाधान किया जाएगा, ताकि पहलगाम और आतंकवाद से उत्पन्न खतरे पर एक द्विदलीय राजनीतिक सहमति बनाई जा सके, साथ ही इस बेहद अशांत क्षेत्र में लोकतंत्र के भविष्य को भी सुनिश्चित किया जा सके, जहां बड़ी संख्या में लोग अभी भी अलग-थलग महसूस करते हैं और उनके साथ बुरा व्यवहार किया जाता है.’

एक दिन पहले संसद में विपक्षी सदस्यों ने पूछा था कि पहलगाम हमले के 100 दिन बाद भी हमलावरों को क्यों नहीं पकड़ा गया है और मांग की थी कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इसकी जिम्मेदारी लें.

27 जुलाई के पत्र के लेखकों ने कहा कि इस संदर्भ में उनके मन में एक महत्वपूर्ण प्रश्न है.

पत्र में कहा गया है, ‘इस संदर्भ में हम आग्रह करते हैं कि चर्चा के दौरान एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न, राज्य का दर्जा छिनना और जम्मू-कश्मीर का दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजन होना, अनदेखा न किया जाए. राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए आप और आपकी पार्टी के सहयोगियों द्वारा एक सशक्त अपील की अत्यंत तत्काल आवश्यकता है.’

पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व नौकरशाह, पूर्व सैनिक, कार्यकर्ता, शिक्षाविद, वकील और पत्रकार शामिल हैं. पत्र में सांसदों को यह याद दिलाने का प्रयास किया गया है कि जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल करना एक ऐसी चीज़ है जिसके लिए केंद्र सरकार पहले से ही प्रतिबद्ध है.

उन्होंने कहा कि यह न केवल जम्मू-कश्मीर में शांति स्थापना के लिए, बल्कि हमारे संविधान के संघीय ढांचे में विश्वास बहाल करने के लिए भी महत्वपूर्ण है.

उन्होंने पत्र में लिखा, ‘यह अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि हमारे गणराज्य के सभी राज्य हमारी राजनीति में केंद्रीकरण और सत्तावादी प्रवृत्तियों के उदय के प्रति संवेदनशील हो सकते हैं. ऐसी स्थिति को रोकने के लिए हम प्रस्ताव करते हैं कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 और/या 3 में एक खंड जोड़ा जाए जो यह निर्धारित करे कि किसी भी मौजूदा राज्य को केंद्र शासित प्रदेश नहीं बनाया जा सके.’

सौ सदस्यों वाली हस्ताक्षर सूची में लिखा है कि राज्य के दर्जे की मांग के लिए सांसदों का समर्थन जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक नेतृत्व और विधायकों के साथ सांसदों की एकजुटता को प्रदर्शित करेगा.

उन्होंने आगे कहा, ‘राज्य का दर्जा असंवैधानिक रूप से समाप्त करने का मुद्दा छह साल से लंबित है. इसे संघीय भारत के मूल ढांचे को बाधित करने की मिसाल नहीं बनने देना चाहिए.’

मालूम हो कि अगस्त, 2019 को केंद्र सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को निरस्त कर राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों- जम्मू कश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था.