नई दिल्ली: इस वर्ष का जानकीपुल शशिभूषण द्विवेदी स्मृति सम्मान युवा कथाकार मिथिलेश प्रियदर्शी को उनके कहानी संग्रह ‘लोहे का बक्सा और बंदूक’ के लिए प्रदान किया गया है.
इस सम्मान की ज्यूरी-अनुकृति उपाध्याय, आशुतोष भारद्वाज और गिरिराज किराडू ने सर्वसम्मति से निर्णय करते हुए अपनी संस्तुति में कहा, ‘मिथिलेश प्रियदर्शी की कहानियां जीवन और यथार्थ को व्यक्तिगत, सामाजिक और राजनीतिक सच्चाइयों में विभक्त नहीं करती. ख़ुद कहानियों के भीतर भी इन सच्चाइयों के लिए अलग-अलग प्रसंग और शैलियां नहीं हैं. हर विवरण और हर वाक्य में तीनों सच्चाइयां एक साथ उपस्थित होती रहती हैं. मिथिलेश के कहानी संग्रह ‘लोहे का बक्सा और बंदूक’ की प्रत्एक कहानी हर पल एक साथ मौजूद इन सच्चाइयों के परस्पर तनाव और मेल को हर बार एक अलग सामाजिक परिवेश में घटित करते हुए अपना ख़ास शिल्प पाती है.’
झारखंड के चतरा में जन्में मिथिलेश जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से मीडिया में पीएचडी करने के बाद कुछ समय बिलासपुर सेंट्रल यूनिवर्सिटी में मीडिया और सिनेमा के प्राध्यापक रहे. उनकी पहली कहानी ‘लोहे का बक्सा और बंदूक’ को वागर्थ का 2007 का नवलेखन पुरस्कार मिला. इसी शीर्षक से कहानी संग्रह ‘लोहे का बक्सा और बंदूक ‘ वर्ष 2022 में लोकभारती प्रकाशन से प्रकाशित हुआ. उनकी कहानियां उड़िया, बांग्ला, पंजाबी औरमराठी में अनुदित हुई हैं.
मिथिलेश फिलहाल मुंबई में स्क्रीनप्ले राइटिंग में सक्रिय हैं.
पुरस्कृत संग्रह की कहानियों की मुख्य विषयवस्तु हिंसा है
उनके पुरस्कृत संग्रह की कहानियों की मुख्य विषयवस्तु हिंसा है. राज्य की हिंसा, राज्य द्वारा प्रायोजित हिंसा, क्रांतिकारी हिंसा, विचारधारात्मक हिंसा, सामाजिक हिंसा, व्यक्तिगत हिंसा और अंतर्वैयक्तिक हिंसा के कई संस्करण इन कहानियों में हत्या और अपराध की गहरी, आस्तित्विक छानबीन की प्रक्रिया में आते हैं.
हिंसा के स्रोतों – राज्य, विचारधारा, और धर्म को करीब से प्रश्नांकित करती यह कहानियां कहती हैं कि शांति और प्रेम का सहज, सामान्य जीवन जी पाना भी बिना योजना और रणनीति बनाए असंभव हो गया है. संग्रह की एक कहानी के रूपक में कहें तो हिंसा और प्रेम एक ही पहाड़ के इस तरफ़ और उस तरफ़ रहते हैं और दोनों का नाम जोवाकिम लिंडा है.

इस सम्मान पर मिथिलेश का कहना है, ‘शशिभूषण द्विवेदी की कहानियां गंडक नदी के पानी जैसी हैं, बाहर से शांत, आम नदियों की तरह. लेकिन भीतर गहरा और तेज ‘अंडरकरंट’ लिए हुए. आपको अनुमान नहीं होता और आप बह जाते हैं. आप जिनकी कहानियां पसंद करते हों, एक रोज़ उनके साथ नाम जुड़ना, ये वाकई सम्मानित महसूस करने की तरह है.’
‘जिस आदमी से साक्षात मिलने की ख्वाहिश थी, उनसे इस तरह मिलना बेचैन करता है’
उन्होंने आगे कहा, ‘शशिभूषण द्विवेदी स्मृति सम्मान के पोस्टर पर नज़र पड़ी तो थोड़ा अजीब लगा. जिस आदमी से साक्षात मिलने की ख्वाहिश थी, उनसे इस तरह मिलना बेचैन करता है.’
मिथिलेश ने अपनी स्मृति साझा करते हुए कहा, ‘2006 का समय था. वर्धा के हॉस्टल में हम साथी मैदान की सारी घास चर जाने को आतुर बकरियों की तरह दिन भर लाइब्रेरी में जमे रहते थे. एमए पूरा होने को था कि ब्रह्महत्या तथा अन्य कहानियों के जरिए शशिभूषण द्विवेदी से टकराया था. किताब के खत्म होते ही बेचैन कर देने वाली, सवालों से लैस, थोड़ी धूसर, थोड़ी डार्क कहानियों ने ऐसा मारक असर पैदा किया था कि उन्हें पोस्टकार्ड लिखने बैठ गया था, जिसका जवाब डेढ़ साल बाद सिक्कों वाले टेलीफोन बूथ पर तब मिला था, जब मेरी पहली कहानी ‘लोहे का बक्सा…’ आई थी.
उन्होंने कहा, ‘अच्छा लिखते हो…लिखते रहना, छोड़ मत देना. कभी मिलेंगे.’
मिथिलेश ने आगे बताया, ‘लगभग अठारह सालों बाद मुलाकात हुई. यहां, इस पोस्टर पर…’ .
उल्लेखनीय है कि यह सम्मान चालीस वर्ष से कम उम्र के हिंदी कथाकारों की रचनाशीलता पर केंद्रित है. इस वर्ष सम्मान के लिए 25 लेखकों की 28 पुस्तकों के वैध नामांकन प्राप्त हुए थे. पहले चरण में प्राप्त सभी वैध प्रविष्टियों की सूची को सार्वजनिक किया गया था. दूसरे चरण में 12 किताबों की एक सूची जून में और तीसरे चरण में 6 किताबों की एक शॉर्टलिस्ट जुलाई के पहले हफ्ते में सार्वजनिक की गई थी.
गौरतलब है कि ‘एक बूढ़े की मौत’, ‘कहीं कुछ नहीं’, ‘खेल’, ‘खिड़की’, ‘छुट्टी का दिन’ और ‘ब्रह्महत्या’ जैसी कहानियों से हिंदी कथा साहित्य को समृद्ध करने वाले कथाकार शशिभूषण द्विवेदी का जन्म 26 जुलाई, 1975, सुल्तानपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था. उनकी कथा पुस्तकों ‘ब्रह्महत्या तथा अन्य कहानियां’ और ‘कहीं कुछ नहीं’ को समकालीन हिंदी कथा लेखन में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है.
7 मई 2020 को हृदयाघात से हुए आकस्मिक निधन के बाद उनके लेखन का महत्व हिंदी साहित्य जगत और पाठकों में बना हुआ है. एक युवा लेखक के तौर पर उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ के ‘नवलेखन पुरस्कार’ से पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
उनकी कहानियां ‘कथाक्रम’, ‘सहारा समय कथाचयन’ में भी चुनी गई. उनकी स्मृति में ‘जानकीपुल शशिभूषण द्विवेदी स्मृति सम्मान’ की स्थापना ‘जानकीपुल ट्रस्ट’ ने 2023 में की थी और उस वर्ष का सम्मान कथाकार दिव्या विजय को प्रदान किया गया था.
