‘असम ट्रिब्यून’ अख़बार का सीएम हिमंता व भाजपा की आलोचना वाला कॉलम छापने से इनकार

असम में मानवाधिकारों के उल्लंघन और बांग्ला भाषी मुसलमानों के 'अमानवीयकरण' पर असम ट्रिब्यून को अपना कॉलम भेजने के कुछ ही घंटों बाद वरिष्ठ पत्रकार पेट्रीशिया मुखीम को अखबार ने बताया कि प्रबंधन इस लेख को प्रकाशित नहीं करेगा. पेट्रीशिया ने कहा कि यह बताया जाना कि क्या लिखना है और कैसे लिखना है, तानाशाही शासन की निशानी है.

/
पैट्रिसिया मुखीम (फोटो साभारः फेसबुक)

नई दिल्ली: असम में मानवाधिकारों के उल्लंघन और बांग्ला भाषी मुसलमानों के ‘अमानवीयकरण’ पर राज्य के दैनिक ‘असम ट्रिब्यून’ को अपना द्विमासिक कॉलम भेजने के कुछ ही घंटों बाद वरिष्ठ पत्रकार पेट्रीशिया मुखीम को 6 अगस्त को अखबार ने बताया कि प्रबंधन ने इस लेख को प्रकाशित न करने का फैसला किया है.

अख़बार की तरफ से शिलॉन्ग टाइम्स की संपादक रह चुकीं मुखीम को केवल मेघालय पर ध्यान केंद्रित करने की नसीहत भी दी गई.

लगभग दो दशकों से शिलॉन्ग टाइम्स की संपादक रही पेट्रीशिया ने 2014 के आसपास पूर्वोत्तर के सबसे ज़्यादा बिकने वाले अंग्रेज़ी दैनिकों में से एक- असम ट्रिब्यून के लिए लिखना शुरू किया था. बुधवार को उन्होंने ट्रिब्यून को अपना लेख भेजा, जो अगले दिन 7 अगस्त को प्रकाशित होना था.

अस्वीकृति की सूचना मिलने के तुरंत बाद पद्मश्री विजेता पत्रकार ने असम ट्रिब्यून से अपने संबंध तोड़ने और आगे से अखबार में योगदान न करने का फैसला किया. उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट में इसकी घोषणा की.

इस घटनाक्रम पर अपनी निराशा व्यक्त करते हुए मेघालय में रहने वाली पत्रकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लिखा, ‘यह बताया जाना कि क्या लिखना है और कैसे लिखना है, एक तानाशाही शासन की निशानी है. बंधनों में बंधने और अपने विचारों को कैद करने से बेहतर है कि आप स्वतंत्र रहें.’

‘केवल मेघालय पर ध्यान केंद्रित करें’

6 अगस्त को असम ट्रिब्यून के एक कर्मचारी ने पेट्रीशिया को एक टेक्स्ट मैसेज भेजा, जिसमें लिखा था, ‘प्रबंधन ने आपके लेख – ‘राजनीतिक शुद्धिकरण की आवश्यकता है’ – को पढ़ा है और मुझे इसे प्रकाशित न करने का निर्देश दिया है. इसलिए, अब से आपसे विनम्र अनुरोध है कि आप केवल मेघालय पर ध्यान केंद्रित करें.’

उन्होंने यह भी कहा कि वे पत्रकार को ‘केवल वही बता रहे हैं जो प्रबंधन ने कहा था’ – कि उन्हें ‘केवल मेघालय पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.’ टेक्स्ट मैसेज में आगे लिखा था, ‘इस संबंध में किसी भी प्रश्न के लिए आप कार्यकारी संपादक से बात कर सकती हैं.’

पेट्रीशिया ने बताया कि जब उन्होंने 2014 के आसपास इस अख़बार में लिखना शुरू किया था, तो उन्हें इस बारे में कोई निर्देश नहीं दिया गया था कि उन्हें किस विषय पर लिखना चाहिए और किस पर नहीं. उन्होंने कहा, ‘मैं इस क्षेत्र में घूमती रही हूं और इसके सामाजिक-राजनीतिक और भू-रणनीतिक उतार-चढ़ावों का गहन समीक्षक हूं.’

उन्होंने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा, ‘तब मुझे अहसास हुआ कि जो होना था वह हो चुका है… वर्तमान शासन के विपरीत चलने वाली किसी भी बात को मुख्यधारा की मीडिया द्वारा नहीं दिखाया जाएगा, सिवाय कुछ बहादुर लोगों के जो अपनी बात पर अड़े हुए हैं और सत्तारूढ़ शासन के चाटुकार बनने से इनकार कर रहे हैं.’

‘बांग्ला भाषी मुसलमानों को अमानवीय बनाने की अथक कोशिश’

स्क्रॉल द्वारा दो दिन बाद प्रकाशित उक्त ‘अस्वीकृत’ लेख इस ओर ध्यान आकर्षित करता है कि कैसे ‘बांग्ला भाषी मुसलमानों, जिनमें से हज़ारों अब बेघर हैं, को निकाल फेंकने की अथक कोशिश ने असम में राजनीतिक विमर्श से ‘मानवाधिकारों’ को गायब कर दिया है.’

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के 1981 के उद्घाटन भाषण का हवाला देते हुए, जिसमें उन्होंने प्रसिद्ध टिप्पणी की थी, ‘वर्तमान संकट में सरकार हमारी समस्याओं का समाधान नहीं है. सरकार ही समस्या है.’ पेट्रीशिया लिखती हैं कि असम में आज ‘एक-व्यक्ति ही सरकार’ है.

वह आगे कहती हैं, ‘हमें ऐसी कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही जो इस अराजकता को शांत कर सके. ऐसा लगता है जैसे मुख्यमंत्री ने मीडिया को संबोधित करने का एकमात्र अधिकार अपने ऊपर ले लिया है. असम का समाज आज बंगाली मुसलमानों और बंगाली हिंदुओं के बीच पूरी तरह से बंटा हुआ है.’

यहां यह जोड़ना ज़रूरी है कि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा के नेतृत्व में असम में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच गया है और बांग्ला भाषी मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत और हिंसा की घटनाएं तेज़ी से बढ़ रही हैं.

जुलाई में शर्मा ने अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ ‘लड़ाई’ को उचित ठहराया था, भले ही वे ‘विदेशी’ न हों, जब उन्होंने एक एक्स पोस्ट में लिखा था, ‘हमें अपने हक़ के लिए लड़ने से मत रोको. हमारे लिए यह हमारे अस्तित्व की आखिरी लड़ाई है.’

इससे पहले मई में हिमंता के नेतृत्व वाली कैबिनेट ने मुस्लिम बहुल इलाकों में रहने वाले ‘मूल निवासियों’ को बंदूक के लाइसेंस देने की योजना लाई थी. इस कदम को उचित ठहराते हुए, शर्मा ने कहा था, ‘बंदूक ज़रूरी है. बंदूक के बिना, आप दक्षिण सलमारा और मनकाचर जैसी जगहों पर कैसे रह पाएंगे? जब आप वहां जाएंगे तो आपको समझ आ जाएगा.’

मालूम हो कि सलमारा-मनकाचर ज़िले की लगभग 95% आबादी मुसलमान है. दूसरे शब्दों में राज्य के संवैधानिक प्रमुख शर्मा ने इस बात को लेकर कोई संकोच नहीं किया कि उन्हें लगता है कि हिंदुओं को मुसलमानों से अपनी रक्षा के लिए बंदूकों की ज़रूरत है.

यह ध्यान देने योग्य है कि 11 अगस्त को असम के मुख्यमंत्री कार्यालय ने असम ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट साझा की, जिसमें शर्मा ने बंदूक नीति को उचित ठहराते हुए कहा था कि संवेदनशील इलाकों में बंदूक ज़रूरी है.

रिपोर्ट में कहा गया है, ‘मुख्यमंत्री ने कहा कि नई नीति केवल उन इलाकों तक सीमित है जहां राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताएं हैं, खासकर बांग्लादेश से लगती असम की अंतरराष्ट्रीय सीमा पर. हथियार लाइसेंस जारी करने के लिए जिन इलाकों पर विचार किया जा रहा है, उनमें धुबरी, दक्षिण सलमारा, बारपेटा, मोरीगांव और नागांव शामिल हैं.’

अपने लेख में पेट्रीशिया ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि कैसे मीडिया असम की भाजपा सरकार के साथ मिलकर समाज का ध्रुवीकरण कर रहा है.

‘आज, राजनीति पूरी तरह से विभाजन और नफ़रत से प्रेरित है. दिन-ब-दिन टीवी चैनल और यूट्यूबर मुसलमानों के ख़िलाफ़ ऐसा क्रूर अभियान चलाते हैं मानो वे जीने के लायक ही न हों. हज़ारों मुसलमान, उनके साथ किए जाने वाले सबसे अमानवीय व्यवहार के चलते बस एक फैसले की डोर से लटके हुए हैं,’ उन्होंने लिखा था.

यह बेहद विडंबनापूर्ण है कि इस लेख में ही पेट्रीशिया बार-बार सत्ता से सवाल करने की घटती गुंजाइश का ज़िक्र करती हैं.

‘आज हम इस देश में उस मुकाम पर पहुंच गए हैं जहां सत्ता से कड़े सवाल पूछना आपको पाकिस्तान समर्थक या ‘राष्ट्र-विरोधी’ बना देता है. पहले कभी नहीं, यहां तक कि आपातकाल के दौरान भी नहीं, हमने आज जैसा दमन महसूस किया है.’

पेट्रीशिया ने कहा कि हालात इतने खराब हो गए हैं कि असम के मुख्यमंत्री ‘टेक्नोलॉजी और मैनेजमेंट विश्वविद्यालय को बंद करने पर तुले हुए हैं’, जो संस्थान उनके राज्य में नहीं बल्कि मेघालय में स्थित है, ‘सिर्फ इसलिए क्योंकि इसका चांसलर और संस्थापक एक मुस्लिम है.’

‘मुझे यहां जातिगत पूर्वाग्रह का आभास होता है’

ऑल्ट न्यूज़ से बात करते हुए पूर्वोत्तर की सबसे प्रतिनिधि आवाज़ों में से एक मानी जाने वाली वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि 2014 के आसपास तत्कालीन कार्यकारी संपादक पीजे बरुआ के ‘निजी आग्रह’ से ही असम ट्रिब्यून के साथ उनका जुड़ाव शुरू हुआ था. ‘उन्होंने मुझसे मेरे कॉलम का नाम रखने को कहा. मैंने इसे ‘रफ़ एंड टम्बल’ नाम दिया. उन्होंने मुझे पूरी आज़ादी दी और हमें कभी कोई शिकायत नहीं हुई.’

वर्तमान संपादकीय टीम ने उनके साथ जिस तरह का व्यवहार किया, उसके बारे में पेट्रीशिया ने कहा कि उन्हें इसमें जातिगत पूर्वाग्रह की भावना आ रही है. ‘एक दशक से भी ज़्यादा समय तक असम ट्रिब्यून में योगदान देने के बाद मेरे लेख को न छापने का संदेश अख़बार के एक कनिष्ठ कर्मचारी द्वारा दिया गया. मुझे यहां जातिगत पूर्वाग्रह की भावना आ रही है क्योंकि मैं एक आदिवासी हूं और इसलिए मुझे असमिया लोगों से जुड़े मुद्दों पर टिप्पणी या लेखन नहीं करना चाहिए, जिन्होंने 1971 तक मेघालय और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों पर शासन किया, जब तक कि हमें अपने मामलों को स्वयं संभालने के लिए राजनीतिक रूप से परिपक्व नहीं माना गया.’

पेट्रीशिया ने जनजातियों को स्वायत्तता देने के प्रति असमिया अभिजात वर्ग की ऐतिहासिक अनिच्छा का ज़िक्र करते हुए बताया कि उन्हें क्यों लगता है कि अख़बार ने उनके साथ जो व्यवहार किया, वह उनके जवाब जितना ही समस्याग्रस्त है.

उन्होंने कहा, ‘जब मेघालय की जनजातियों ने आदिवासी प्रथाओं और शासन व्यवस्था के लिए छठी अनुसूची की मांग की, तब संविधान-निर्माण निकाय में हुई बहस को उस समय असमिया अभिजात वर्ग के विचारों को समझने के लिए दोबारा पढ़ा जाना चाहिए. वे जनजातियों को छठी अनुसूची देने के ख़िलाफ़ थे, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे अलगाववाद को बढ़ावा मिलेगा. इन्हीं पृष्ठभूमियों के चलते असमिया और आदिवासियों के बीच संबंध आज तक कायम हैं. समीकरण हमेशा से असमान रहे हैं.’

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)