क्यों ज़रूरी है आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण

यदि कोई बच्चा उस उम्र तक चल नहीं पा रहा या बोल नहीं पा रहा है, जिस उम्र तक अधिकांश बच्चे ऐसा करने लगते हैं, तो यह किसी विकासात्मक देरी या अक्षमता का लक्षण हो सकता है, जिसे प्रारंभिक पहचान से समझा जा सकता है. इसके लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ता एक बेहद अहम भूमिका निभाती हैं.

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के कई कार्यों में से एक महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभिक पहचान भी है, जिसके लिए सरकार विभिन्न कार्यक्रम चला रही है. (प्रतीकात्मक फोटो साभार: Public Services International/Flickr (CC BY-NC 2.0)

मध्य प्रदेश के विदिशा ज़िले में एक आंगनवाड़ी केंद्र में एक बच्ची से मुलाकात हुई, जिसके मानसिक विकास में उसकी उम्र के अन्य बच्चों की तुलना में कुछ अंतर नज़र आ रहा था. इस बच्ची की मां और आंगनवाड़ी केंद्र की कार्यकर्ता भी यह महसूस कर रही थीं कि बच्ची में कुछ अलग है, लेकिन वे यह समझ नहीं पा रही थीं कि वह ‘अलग’ क्या है, बच्ची को किस तरह की सहायता की आवश्यकता है, और इसके लिए उन्हें कहां जाना चाहिए या किससे संपर्क करना चाहिए.

यह उलझन सिर्फ़ उस एक केंद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में कई आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और परिवार ऐसे हो सकते हैं जो ऐसी स्थिति से गुजर रहे हों, जहां बच्चों का व्यवहार उनकी उम्र के अन्य बच्चों से कुछ भिन्न दिखाई देता है, लेकिन यह समझ पाना मुश्किल हो कि कहीं यह किसी विकासात्मक देरी या अक्षमता (कोई कमी या विकलांगता) का संकेत तो नहीं.

क्यों हैं ज़रूरत

जन्म से 6 वर्ष तक की आयु एक बच्चे के पूरे जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है. इस उम्र में बच्चों का जैसा मानसिक और शारीरिक विकास होता है, वह तय कर सकता है कि उनका जीवन आगे कैसा होगा. कई बार इस आयु में बच्चों में विकासात्मक देरी या अक्षमता के लक्षण नजर आने लगते हैं.

ऐसे में यह आवश्यक होता है कि इन लक्षणों की सही पहचान की जाए और जल्द से जल्द बच्चों को ज़रूरी सहायता प्रदान की जाए, जिससे विकासात्मक देरी या अक्षमता से निवारण प्राप्त हो सके या उनके बावजूद भी बच्चों का समुचित विकास और शिक्षा जारी रह सके.

बच्चों में अक्षमता के लक्षणों की जल्द पहचान की प्रक्रिया को प्रारंभिक पहचान (Early Identification) कहा जाता है. उदाहरण के लिए, यदि कोई बच्चा उस उम्र तक चल नहीं पा रहा या बोल नहीं पा रहा है, जिस उम्र तक अधिकांश बच्चे ये काम करने लगते हैं, तो यह किसी विकासात्मक देरी या अक्षमता का लक्षण हो सकता है, जिसे प्रारंभिक पहचान के माध्यम से समझा जा सकता है. इस प्रक्रिया को ज़मीनी स्तर पर लागू करने और अधिक से अधिक बच्चों तक पहुंचाने करने के लिए, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता एक बेहद अहम भूमिका निभाती हैं.

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार, भारत में करीब 14 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं, जो देश के हर कोने में बाल विकास, पोषण और प्रारंभिक शिक्षा संबंधी सुविधाएं प्रदान करती हैं. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के कई कार्यों में से एक महत्वपूर्ण कार्य प्रारंभिक पहचान भी है, जिसके लिए सरकार विभिन्न कार्यक्रम चला रही है.

इन कार्यक्रमों के अंतर्गत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को प्रारंभिक पहचान के लिए विशेष प्रशिक्षण (ट्रेनिंग) भी दिया जाता है. इस विषय में दो प्रमुख सरकारी कार्यक्रम हैं: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित ‘राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम’, 2014 (आरबीएसके) और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया ‘दिव्यांग बच्चों के लिए आंगनवाड़ी प्रोटोकॉल’, 2023. आरबीएसके के अंतर्गत आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को जन्मजात विकार, कमियां, बचपन में होने वाले रोग और विकासात्मक देरी की प्रारंभिक पहचान के लिए ट्रेनिंग प्रदान की जाती है.

आंगनवाड़ी प्रोटोकॉल के अंतर्गत दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 में मान्यता प्राप्त 21 प्रकार की अक्षमताओं की प्रारंभिक पहचान के लिए आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को ट्रेन किया जाता है.

इन दोनों कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता बच्चों में अक्षमता और विकासात्मक देरी के प्रारंभिक संकेतों को पहचानें और शक होने पर आशा कार्यकर्ताओं या नजदीकी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) तक रैफ़र करें, ताकि प्रभावित बच्चों को समुचित उपचार और आवश्यक हस्तक्षेप समय पर मिल सके.

क्या हो रहा है अमल

जब आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की भूमिका प्रारंभिक पहचान जैसे महत्वपूर्ण विषय में इतनी केंद्रीय है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या वे इस कार्य को प्रभावी रूप से निभा पा रही हैं?

वर्ष 2020 में नीति आयोग द्वारा किए गए एक अध्ययन में यह सामने आया कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ता अक्सर आवश्यक जानकारी और योग्यता से वंचित रह जाती हैं, क्योंकि उन्हें सही तरीके से ट्रेनिंग नहीं मिल पातीं है. इसी तरह, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD) की 2018 की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि दिल्ली में लगभग 50% आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को कभी भी अनिवार्य जॉब ट्रेनिंग प्राप्त नहीं हुई.

विशेष रूप से यदि हम प्रारंभिक पहचान की बात करें, तो कई सर्वेक्षणों और अध्ययनों में यह पाया गया है कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को इस विषय पर अलग से कोई ट्रेनिंग नहीं दी गई है और वे इससे संबंधित जानकारी से भी अक्सर अनजान होती हैं.

उदाहरण के तौर पर, राजस्थान के करौली ज़िले में एक अध्ययन किया गया, जिसमें यह जांचा गया कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं में बौद्धिक अक्षमता वाले बच्चों को लेकर कितनी जागरूकता है. यह अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वर्तमान स्थिति ठीक नहीं है और इसमें सुधार की आवश्यकता है (International Journal of Creative Research Thoughts, 2022).

इसी प्रकार, अमृतसर में बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं और उनकी प्रारंभिक पहचान को लेकर एक अध्ययन किया गया, जिसमें यह सामने आया कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के पास इस विषय में पर्याप्त जानकारी नहीं है (AMEI Current Trends in Diagnosis and Treatment, 2018).

विदिशा के जिस आंगनवाड़ी केंद्र का उल्लेख पहले किया गया, वहां भी यह देखने को मिला कि न केवल आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिका ने सरकार द्वारा प्रारंभिक पहचान से जुड़े किसी कार्यक्रम के बारे में सुना था, बल्कि उन्हें इस विषय में कोई ट्रेनिंग भी प्रदान नहीं की गई थी.

इसके बाद, यदि कहीं प्रशिक्षण दिया भी जा रहा है, तो वह यह सुनिश्चित नहीं कर पाता कि प्रारंभिक पहचान की प्रक्रिया व्यापक ढंग से हो सके. इसका एक मुख्य कारण यह है कि अधिकांश आंगनवाड़ी केंद्रों में जो पहचान की प्रक्रिया अपनाई जा रही है, वह आरबीएसके के अंतर्गत होती है.

उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021-22 में 8 करोड़ से अधिक बच्चों की जांच आरबीएसके के अंतर्गत की गई थी. हालांकि, आरबीएसके में दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 में मान्यता प्राप्त 21 प्रकार की सभी अक्षमताएं शामिल नहीं हैं, जिसके कारण केवल कुछ ही प्रकार की अक्षमताओं की पहचान हो पाती है.

इसके अलावा, आरबीएसके के तहत की जाने वाली यह पहचान पूरी तरह से चिकित्सकीय (medical) शब्दों पर आधारित होती है, जो अक्षमता को केवल एक मेडिकल स्थिति मानती है और सामाजिक कारणों या संदर्भों को ध्यान में नहीं रखती. ऐसे में, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, एक ओर जहां आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के पास प्रारंभिक पहचान से संबंधित जानकारी सीमित है, वहीं यदि यह पहचान प्रक्रिया केवल आरबीएसके जैसे कार्यक्रमों तक सीमित रहेगी, तो यह न तो समावेशी (inclusive) हो पाएगी और न ही प्रभावी. परिणामस्वरूप, कई बच्चे अब भी पहचान और आवश्यक सहायता से वंचित रह जाएंगे.

आंगनवाड़ी प्रोटोकॉल

इन्हीं कमियों को दूर करने के उद्देश्य से सरकार ने आंगनवाड़ी प्रोटोकॉल तैयार किया है. यह प्रोटोकॉल खासतौर पर प्रारंभिक पहचान के लिए बनाया गया है, और यह इस पर ज़ोर देता है कि सभी प्रकार की अक्षमताओं को समझा जाए और आगे की प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट जानकारी दी जाए. इसका दृष्टिकोण सिर्फ़ मेडिकल स्थिति पर नहीं है, बल्कि यह सामाजिक पहलुओं को भी ध्यान में रखता है. इसी कारण यह प्रोटोकॉल आरबीएसके की कुछ कमियों को पूरा करने में मदद करता है.

हालांकि, यदि यह प्रोटोकॉल लागू तो हो जाए, लेकिन उसकी ट्रेनिंग प्रक्रिया हर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता तक न पहुंचे, तो इसका उद्देश्य अधूरा ही रह जाएगा. इसलिए यह आवश्यक है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर इस प्रोटोकॉल को ज़मीनी स्तर तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी निभाएं, बाल विकास परियोजना अधिकारी (CDPO) से लेकर आंगनवाड़ी पर्यवेक्षक और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता तक, सभी को इस ट्रेनिंग में शामिल किया जाए.

आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को स्पष्ट रूप से यह बताया जाना चाहिए कि प्रारंभिक पहचान के दौरान किन लक्षणों पर ध्यान देना है, संदेह होने पर किससे संपर्क करना है, अभिभावकों को किस प्रकार की सलाह देनी है, और यदि कोई अक्षमता की पुष्टि होती है, तो दिव्यांगता प्रमाण पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया क्या है. केवल ट्रेनिंग देना ही नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना कि वे इस ज्ञान को अपने काम में कैसे लागू कर रही हैं, यह भी उतना ही ज़रूरी है.

विदिशा के आंगनवाड़ी केंद्र में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं से मिलकर यह साफ़ समझ में आया कि वे वास्तव में बच्चों की मदद करना चाहती हैं और ट्रेनिंग में सिखाई गई बातों को अपने काम में लागू करने का भी पूरा प्रयास करती हैं. उनका मानना था कि यदि उन्हें किसी अक्षमता से जूझ रहे बच्चों के लिए आंगनवाड़ी प्रोटोकॉल के तहत उचित ट्रेनिंग दिया जाए, तो वे निश्चित रूप से उसे अपने काम में अपनाएंगी.

भारत में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के ऊपर वैसे ही पहले से कई ज़िम्मेदारियां होती हैं, जैसे कि कुपोषण से लड़ना, बच्चों की देखभाल, गर्भवती महिलाओं की निगरानी, और कई सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन. इसके अलावा, अधिकतर आंगनवाड़ी केंद्रों की स्थिति भी बेहद खराब रहती है, और इन सबके बीच उन्हें बेहद कम वेतन पर काम करना पड़ता है, जिसे लेकर वे लगातार विरोध भी जताती रही हैं.

ऐसे में यदि उनके कंधों पर और ज़िम्मेदारियां डाली जाएं, लेकिन उन्हें आवश्यक सहयोग और स्पष्ट मार्गदर्शन न मिले, तो यह स्थिति कार्यकर्ताओं और उन बच्चों दोनों के लिए असमानता और उपेक्षा की स्थिति उत्पन्न कर सकती है.

(सौम्या जैन विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में रिसर्च फेलो हैं.)