मणिपुर: पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह राष्ट्रपति शासन समाप्त करने की मांग को लेकर दिल्ली पहुंचे

हिंसाग्रस्त मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह राज्य में राष्ट्रपति शासन समाप्त कर 'जल्द ही एक लोकप्रिय सरकार के गठन' की कवायद लेकर केंद्र के भाजपा नेताओं पर दबाव बनाने के लिए दिल्ली पहुंचे हैं. हवाई अड्डे पर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी चर्चा आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों के मुद्दों सहित मौजूदा संकट के समाधान पर केंद्रित होगी.

फाइल फोटो: मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह 19 सितंबर, 2025 को घात लगाकर किए गए हमले में घायल हुए असम राइफल्स के जवानों से मिलने पहुंचे थे. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: हिंसाग्रस्त मणिपुर के पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह राज्य में राष्ट्रपति शासन समाप्त कर ‘जल्द ही एक लोकप्रिय सरकार के गठन’ की कवायद लेकर केंद्र के भाजपा नेताओं पर दबाव बनाने के लिए दिल्ली पहुंचे हैं.

शनिवार (4 अक्टूबर) को इंफाल रवाना होने से पहले हवाई अड्डे पर मीडिया से बात करते हुए पूर्व सीएम सिंह ने कहा कि उनकी चर्चा आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों के मुद्दे सहित मौजूदा संकट के समाधान पर भी केंद्रित होगी.

मालूम हो कि बीरेन सिंह, जो इंफाल घाटी के तीन विधायकों – टी. रोबिंद्रो, सपाम रंजन और एच. डिंगो सिंह के साथ दिल्ली पहुंचे हैं, भाजपा के पूर्वोत्तर समन्वयक संबित पात्रा से मिलने वाले हैं और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलने का समय मांग रहे हैं.

ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 13 सितंबर को हिंसा प्रभावित राज्य के दौरे के बाद से राज्य के वरिष्ठ भाजपा नेतृत्व का यह पहला दिल्ली दौरा है.

पूर्व सीएम सिंह ने पुष्टि की है कि इंफाल में भारी जन दबाव के बीच निर्वाचित सरकार को बहाल करने की मांग उठ रही है.

भाजपा के सूत्रों ने द वायर को बताया कि महत्वपूर्ण निंगोल चाकोबा उत्सव के नजदीक आने के साथ ही राज्य में राष्ट्रपति शासन समाप्त करने की मांग तेज हो गई है.

इस संबंध में विधानसभा अध्यक्ष सत्यव्रत सिंह और अन्य भाजपा विधायकों के भी रविवार को दिल्ली पहुंचने की उम्मीद है.

मालूम हो कि मणिपुर में 3 मई, 2023 को जातीय हिंसा शुरू होने के 649 दिन बाद 9 फरवरी को एन. बीरेन सिंह ने भारी दबाव के बीच सीएम पद से इस्तीफ़ा दे दिया था, जिसके बाद राज्य में राजनीतिक स्थिति अस्थिर रही है.

बीरेन सिंह के इस्तीफे के तीन दिन बाद मणिपुर मेंं 13 फरवरी को राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था. हालांकि, उस समय राज्य विधानसभा भंग नहीं की गई थी, बल्कि निलंबित अवस्था में रखी गई थी.

उल्लेखनीय है कि मेईतेई इंफाल घाटी की आबादी राज्य में राष्ट्रपति शासन का व्यापक रूप से विरोध कर रही है, जबकि आसपास के कुकी-बहुल पहाड़ी ज़िलों के कई लोग इसे तब तक जारी रखना चाहते हैं जब तक कि एक ‘अलग प्रशासन’ नहीं मिल जाता.

भाजपा का घटता प्रभाव

बता दें कि बीरेन सिंह का दिल्ली दौरा ऐसे समय में हो रहा है जब मणिपुर में भाजपा की राजनीतिक पकड़ कमज़ोर होती दिख रही है. कभी 44 विधायकों के समर्थन का दावा करने वाली पार्टी का आधार काफ़ी कमज़ोर हो गया है.

भाजपा 2024 के लोकसभा चुनावों में आंतरिक और बाहरी मणिपुर दोनों सीटें कांग्रेस के हाथों हार गई.

वहीं, हिंसा भड़कने के बाद भाजपा के सभी सात कुकी विधायकों ने अपना समर्थन वापस ले लिया. जबकि भाजपा के दो पूर्व विधायक एल. राधाकिशोर सिंह और वाई. सुरचंद्र सिंह कांग्रेस में शामिल हो गए.

द वायर से बात करते हुए तीन बार विधायक रहे सुरचंद्र सिंह ने पार्टी पर ‘मणिपुर के लोगों के साथ विश्वासघात’ करने का आरोप लगाया.

उन्होंने अपनी पूर्व पार्टी के अधीन राज्य प्रशासन को केंद्र सरकार की ‘एक कठपुतली’ बताया.

नई दिल्ली की ओर से गहरे अलगाव और कथित उपेक्षा की भावना व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, ‘जैसे-जैसे स्थिति आगे बढ़ती है, और हम विश्लेषण करते हैं, ऐसा लगता है कि मोदी के नेतृत्व वाली सरकार, भाजपा सरकार मणिपुर को भारत का हिस्सा नहीं मानती.’

जब उनसे पूछा गया कि दो साल से ज़्यादा समय तक चली हिंसा के बाद उन्होंने पार्टी क्यों छोड़ी, तो इस पर सिंह ने कहा, ‘मणिपुर के लोगों को उनसे उम्मीद थी, लेकिन अब सबकी उम्मीद टूट चुकी है और ज़मीनी स्तर पर उनके पास अब कोई समर्थन नहीं है. मैंने इस मुद्दे पर अपनी पार्टी के नेताओं से बात करने की कोशिश की, लेकिन ऐसा लगता है कि उन्हें मणिपुर की कोई परवाह नहीं है.’

गौरतलब है कि मणिपुर की जातीय हिंसा में 260 से ज़्यादा लोगों की जान जा चुकी है. हाल ही में पीएम मोदी के मणिपुर दौरे के बाद भी लोग राहत शिविरों में ज़िंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

सुरक्षा बलों द्वारा गश्त किए जाने वाले ‘बफ़र ज़ोन’ के ज़रिए मेईतेई और कुकी एक-दूसरे से लगभग अलग-थलग हैं.

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)