नई दिल्ली: भारत में हर दिन औसतन 4,700 से अधिक लोग सिर्फ सांस लेने की वजह से मर रहे हैं. यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि लांसेट की ताजा रिपोर्ट में सामने आया एक चौंकाने वाला तथ्य है.
‘लांसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज’ की नौवीं रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में भारत में वायु प्रदूषण से जुड़ी 17.18 लाख से अधिक मौतें हुईं, यह संख्या 2010 की तुलना में 38 फीसदी अधिक है.
यह रिपोर्ट उस समय सामने आई है जब दिल्ली-एनसीआर एक बार फिर जहरीली हवा की चपेट में है, और आंकड़े बता रहे हैं कि राजधानी की हवा में सांस लेना रोजाना 10 सिगरेट पीने जितना खतरनाक हो गया है.
मौत का आर्थिक हिसाब: जीडीपी का 9.5 फीसदी नुकसान
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सहयोग से तैयार की गई यह रिपोर्ट केवल मौतों का आंकड़ा नहीं देती, बल्कि एक भयावह आर्थिक तस्वीर भी पेश करती है. 2022 में बाहरी वायु प्रदूषण से हुई असमय मौतों ने भारत को 339.4 अरब डॉलर (लगभग 30 लाख करोड़ रुपये) का आर्थिक नुकसान पहुंचाया, जो देश की जीडीपी का 9.5 फीसदी है.
यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के नेतृत्व में 71 शैक्षणिक संस्थानों और यूएन एजेंसियों के 128 विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई यह रिपोर्ट बताती है कि पीएम2.5 (व्यास में 2.5 माइक्रोमीटर से छोटे कण) प्रदूषण ने भारत में सबसे अधिक तबाही मचाई है. यह कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि सीधे फेफड़ों में प्रवेश कर जाते हैं और रक्तप्रवाह में मिल जाते हैं, जिससे हृदय रोग, फेफड़ों का कैंसर, डायबिटीज और यहां तक कि मनोभ्रंश (डिमेंशिया) जैसी बीमारियां होती हैं.

जीवाश्म ईंधन: आधी मौतों का जिम्मेदार
रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक खुलासा यह है कि इन 17.18 लाख मौतों में से 7.52 लाख (44 फीसदी) मौतें सीधे तौर पर जीवाश्म ईंधन (कोयला और तरल गैस) के जलने से हुईं.
कोयले के इस्तेमाल से अकेले 3.94 लाख मौतें हुईं, जिनमें से अधिकांश (2.98 लाख) थर्मल पावर प्लांट्स में कोयला जलाने से हुई. इसके अलावा, सड़क परिवहन में पेट्रोल के उपयोग ने 2.69 लाख मौतों में योगदान दिया.
भारत में 2022 तक, कोयला कुल ऊर्जा आपूर्ति का लगभग आधा हिस्सा (46 फीसदी) और कुल बिजली का तीन-चौथाई हिस्सा (75 फीसदी) बनाता है, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा केवल 2 फीसदी और 10 फीसदी है. जीवाश्म ईंधन भारत में सड़क परिवहन ऊर्जा का लगभग सभी (96 फीसदी) हिस्सा है, जबकि बिजली केवल 0.3 फीसदी है.
सबूतों के बावजूद सरकार का इनकार
द वायर ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को यह जानने के लिए पत्र लिखा है कि 2022 में भारत में हुई 17.18 लाख मौतों का संबंध वायु प्रदूषण से होने के निष्कर्ष पर उसकी क्या प्रतिक्रिया है. मंत्रालय का जवाब मिलने पर रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.
हालांकि लगातार बढ़ते सबूतों के बावजूद केंद्र सरकार बार-बार यह दावा करती रही है कि ऐसा कोई डेटा नहीं है जिससे यह साबित हो कि वायु प्रदूषण से मौतें होती हैं.
जुलाई 2024 में, पर्यावरण मंत्रालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा था कि ‘ऐसा कोई ठोस डेटा उपलब्ध नहीं है जिससे यह साबित किया जा सके कि मौतों का सीधा कारण सिर्फ वायु प्रदूषण है.’
सरकार ने यह भी कहा था कि वायु प्रदूषण श्वसन संबंधी बीमारियों और अन्य रोगों को प्रभावित करने वाले कई कारकों में से एक है. स्वास्थ्य पर असर व्यक्ति की खानपान की आदतों समेत कई अन्य पर्यावरणीय कारणों से भी पड़ता है.

दिलचस्प बात यह है कि भारत की सरकारी एजेंसियों ने भी वायु प्रदूषण और मौतों के बीच संबंध स्वीकार किया है.
साल 2020 में द लांसेट प्लेनेटरी हेल्थ नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन, जिसे भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) का समर्थन भी प्राप्त था, में बताया गया था कि साल 2019 में भारत में हुई कुल मौतों में से करीब 17.18 लाख मौतें (यानी 18%) वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं.
अध्ययन में यह भी पाया गया कि वायु प्रदूषण से होने वाली असमय मौतों और बीमारियों के कारण उत्पादकता में हुई कमी से भारत की जीडीपी का लगभग 1.4% (करीब 2,60,000 करोड़ रुपये या 36.8 अरब अमेरिकी डॉलर) का आर्थिक नुकसान हुआ.
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) वीके पॉल ने द हिंदू को बताया था कि ‘यह वैज्ञानिक अध्ययन भारत में वायु प्रदूषण पर नवीनतम साक्ष्य प्रस्तुत करता है और स्वास्थ्य हानि को आर्थिक प्रभाव में बदलकर दिखाता है.’
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन स्वास्थ्य सेवाओं के महानिदेशालय (डीजीएचएस) द्वारा अक्टूबर 2023 में जारी ‘हेल्थ एडवाइजरी ऑन एयर पॉल्यूशन’ में भी इसी अध्ययन का हवाला दिया गया है.

दिल्ली-एनसीआर: फिर घुटन भरी हवा
लांसेट की रिपोर्ट 2022 के आंकड़ों पर आधारित है, स्थिति 2025 में और बदतर हो गई है.
30 अक्टूबर 2025 की सुबह दिल्ली-एनसीआर के निवासी एक बार फिर घने धुंए की स्थिति में उठे. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, आनंद विहार में एक्यूआई 409 तक पहुंच गया, जो ‘गंभीर’ श्रेणी में आता है. लोधी रोड और इंडिया गेट ने क्रमशः 325 और 319 का एक्यूआई दर्ज किया.
29 अक्टूबर को दिल्ली का औसत एक्यूआई 275 था, जो ‘खराब’ श्रेणी में था. वजीरपुर ने सबसे खराब हवा की गुणवत्ता दर्ज की, जिसका एक्यूआई 327 था.
पिछले सप्ताह की स्थिति और भी भयावह थी. 21 अक्टूबर को दीपावली के बाद कई स्टेशनों पर एक्यूआई 900 के पार चला गया था. आनंद विहार में यह 627 (रात 11 बजे) से 656 (सुबह 4 बजे) तक पहुंच गया. अशोक विहार में यह 892 तक पहुंच गया, आया नगर में 964, और मथुरा रोड पर 959 – सभी ‘खतरनाक’ श्रेणी में.
नोएडा में 30 अक्टूबर को एक्यूआई 310 दर्ज किया गया, जबकि ग्रेटर नोएडा में यह 289 था.
एक्यूआई स्केल को समझना जरूरी है: 0-50 अच्छा, 51-100 संतोषजनक, 101-200 मध्यम, 201-300 खराब, 301-400 बहुत खराब, और 401-500 गंभीर माना जाता है. 409 जैसी रीडिंग का मतलब है कि हवा स्वस्थ लोगों के लिए भी खतरनाक है.
डब्ल्यूएचओ के 7 सुझाव: आप क्या कर सकते हैं?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने हाल ही में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर सात आसान तरीके सुझाए हैं:
1. पैदल चलें या साइकिल चलाएं: जहां संभव हो, कार या मोटरबाइक के बजाय पैदल चलें या साइकिल का उपयोग करें. यह न केवल ईंधन उत्सर्जन को कम करता है बल्कि आपके स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है.
2. एनर्जी-एफिशिएंट उपकरणों का उपयोग करें: एलईडी बल्ब और एनर्जी-एफिशिएंट उपकरण चुनें. जब कमरे से बाहर जाएं तो बत्तियां बंद कर दें, क्योंकि बिजली उत्पादन में जीवाश्म ईंधन जलाया जाता है.
3. कचरे का जिम्मेदारी से निपटान करें: प्लास्टिक और सिंथेटिक वस्तुओं का उपयोग बंद करें. रीसायकल और पुनः उपयोग की आदत डालें.
4. पेड़ लगाएं: पेड़ हवा को शुद्ध करते हैं. अधिक से अधिक पेड़ लगाएं और हरियाली को बढ़ावा दें.
5. घरेलू ऑडिट करें: अपने घर या कार्यालय के सभी विद्युत उपकरणों की नियमित जांच करवाएं. फफूंदी या जल रिसाव की समस्याओं को ठीक करवाएं जो इनडोर प्रदूषण का कारण बनते हैं.
6. प्रदूषण स्तर से अवगत रहें: उच्च प्रदूषण वाले दिनों में घर के अंदर रहें और एचईपीए (हाई एफिशिएंसी पार्टिकुलेट एयर) फिल्टर वाले एयर प्यूरीफायर का उपयोग करें.
7. शारीरिक परिश्रम सीमित करें: उच्च प्रदूषण के दिनों में, विशेष रूप से बाहर और प्रदूषण स्रोतों के पास शारीरिक परिश्रम को सीमित करें. बच्चों, बुजुर्गों और हृदय या फेफड़ों की बीमारी वाले लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए.
