… जब बिड़हर के किसानों की बगावत ज़मींदारों को घुटनों के बल ले आई थी

ग्यारह जनवरी,1921 वो दिन था जब अवध के किसानों ने तत्कालीन फ़ैज़ाबाद (अब आंबेडकरनगर) ज़िले के नितांत पिछड़े बिड़हर क्षेत्र में ब्रिटिश राज और उसके चहेते ज़मींदारों के ख़िलाफ़ खुला विद्रोह कर दिया था. हालांकि इस विद्रोह का दूसरा पहलू यह रहा कि महात्मा गांधी इसमें हुई हिंसा, लूटपाट व आगजनी से बहुत नाराज़ हुए.

ब्रिटिश सत्ताधीशों को बिड़हर विद्रोह की जानकारी मिली तो उन्होंने पहले तो उसके दमन के लिए सिपाहियों के पैदल व घुड़सवार दस्ते भेजे, फिर टांडा के पूरब स्थित चिंतौरा बाग में फौज का डेरा डाल दिया. इसके चलते फैली दहशत ने किसानों को शांत तो जरूर कर दिया, लेकिन उनकी एकता ऐसी थी कि सत्ताधीश अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी पता नहीं लगा पाए कि उनके विद्रोह का नेतृत्व किस किसने किया था. (प्रतीकात्मक फोटो: Public Domain)

एक सौ पांच साल पहले वह आज का ही दिन था – ग्यारह जनवरी, 1921 का, जब ब्रिटिश साम्राज्य और उसके चहेते जमींदारों के दो पाटों के बीच पिस रहे अवध के किसानों ने तत्कालीन फैजाबाद (अब आंबेडकरनगर) जिले के नितांत पिछड़े बिड़हर क्षेत्र में खुला विद्रोह कर दोनों को घुटनों के बल ला दिया.

इस विद्रोह (इतिहासकारों द्वारा घोर उपेक्षा के बावजूद अपने अंचल में जिसकी यादें सौ साल बाद भी धुंधली नहीं पड़ी हैं) की शुरुआत टांडा तहसील के अंतर्गत स्थित खट्टे गांव के जमींदार दातादीन सिंह के घर व ‘कोर्ट’ पर किसानों के सशस्त्र हमले से हुई.

दरअसल, हमले के समय तक दातादीन को वक्त की नजाकत का अहसास नहीं था. इसका भी नहीं कि अब उसकी जमींदार जमात के लिए ‘मौसम’ इस तरह प्रतिकूल हो गया है कि उससे क्षुब्ध किसान चुपचाप उसकी मनमानियां बर्दाश्त करते रहने को तैयार नहीं हैं.

कारण यह कि अवध किसान सभा द्वारा कुछ ही दिनों पहले (दिसंबर, 1920 में) अयोध्या में किए गए शक्ति प्रदर्शन ने न सिर्फ उन्हें उनकी शक्ति याद दिला दी है, बल्कि इस विश्वास से भर दिया है कि अपनी पर आ जाएं तो वे अत्याचारी जमींदारों को भरपूर सबक सिखा सकते हैं.

बेगार को लेकर भड़के

‘द वायर हिंदी’ के पाठक 22 दिसंबर, 2023 को ‘अयोध्या के मंदिर 1920-21 के किसान विद्रोह से अपना रिश्ता भूल गए‘ शीर्षक से प्रकाशित टिप्पणी में इस शक्ति प्रदर्शन के बारे में विस्तार से पढ़ चुके हैं, जिसमें संकल्प लिया गया था कि अब किसान किसी भी कीमत पर जमींदारों की ‘हरी-बेगारी’ नहीं करने वाले.

दातादीन ने इसके बावजूद एक दलित किसान को बेगार के लिए मजबूर करने की गुस्ताखी कर डाली तो किसानों का गुस्सा बुरी तरह भड़क उठा. फिर क्या था, उन्होंने किसान संगठन समिति के स्थानीय नेता गूदरराम के नेतृत्व में हजारों की संख्या में एकत्र होकर दातादीन के घर व कोर्ट घेर लिए और वहां जो भी मिला, उसी से मारपीट व आगजनी पर उतरकर उसके दांत खट्टे कर दिए.

उनका गुस्सा फिर भी शांत नहीं हुआ तो टांडा तहसील व उसका सरकारी खजाना घेरने भी जा पहुंचे. उनके तेवरों की उग्रता देख वहां तैनात थानेदार एवं तहसीलदार की हिम्मत पस्त हो गई तो उन्होंने अपनी टोपियां उनके नेता गूदरराम के कदमों में रख देने में ही भलाई समझी.
इस पर गूदरराम ने दया दिखाते हुए उन्हें तो बख्श दिया लेकिन अगले ही दिन बीस हजार से ज्यादा उग्र किसानों के साथ बसखारी की तरफ निकल पड़े, जो वहां से सोलह सत्रह किलोमीटर दूर था और जिसके रास्ते में कई अत्याचारी जमींदारों का इलाका पड़ था था.

इस कूच में गूदरराम के साथ रवाना हुए आंदोलित किसानों में ज्यादातर युवा थे, जो अपना लक्ष्य पाने के लिए मरने-मारने पर आमादा थे और हिंसा व अहिंसा को लेकर किसी दुविधा में नहीं पड़ते थे. क्योंकि उनके निकट अहिंसा कोई बड़ा जीवन-मूल्य नहीं थी.

इसलिए उन्होंने अपने रास्ते में पड़ने वाले प्रायः सारे जमींदारों पर हमले किए, उनको घायल या जान बचाकर भागने को मजबूर कर दिया, जीभर कर लूटा, संपत्तियां जलाईं और ‘अपना राज’ स्थापित कर लिया.

और भी उद्वेलन

जानकारों के अनुसार, वे इस बात को लेकर पहले से भी ख़फ़ा थे कि पांच दिन पहले 6 जनवरी को उनमें से लगभग 1,800 अपने भोजन-बिस्तर के साथ रायबरेली के फुरसतगंज बाजार में होने जा रही किसान सभा में भाग लेने रवाना हुए तो गोसाईंगंज में उन्हें बलपूर्वक रोककर वापस लौटा दिया गया था. दूसरी ओर फुरसतगंज में एकत्र किसानों पर गोलियां चलवा दी गई थीं, जिससे कई मौतें हो गई थीं.

इसके अगले दिन रायबरेली के ही मुंशीगंज में भी किसानों पर गोलियां चलाई गई थीं, जिनमें हताहत किसानों की बड़ी संख्या को लेकर उसे ‘दूसरा जलियांवाला बाग कांड’ कहा जाता है.

बहरहाल, ब्रिटिश सत्ताधीशों को बिड़हर विद्रोह की जानकारी मिली तो उन्होंने पहले तो उसके दमन के लिए सिपाहियों के पैदल व घुड़सवार दस्ते भेजे, फिर टांडा के पूरब स्थित चिंतौरा बाग में फौज का डेरा डाल दिया. इसके चलते फैली दहशत ने किसानों को शांत तो जरूर कर दिया, लेकिन उनकी एकता ऐसी थी कि सत्ताधीश अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी पता नहीं लगा पाए कि उनके विद्रोह का नेतृत्व किस किसने किया था.

जवाहरलाल नेहरू पहुंचे

इसका पता उन्हें अगली 27 जनवरी को तब चला, जब कांग्रेस के नेता जवाहरलाल नेहरू अकबरपुर होते हुए टांडा पहुंचे और चिंतौरा बाग में किसानों की सभा की. दूर-दूर से कोई 50-60 हजार किसान सभा में उनको सुनने आए तो उन्होंने आंदोलन में अहिंसक न बने रह पाने और लूटपाट व आगजनी करने को लेकर उनको आड़े हाथों लिया और कहा कि बेहतर होगा कि वे ईमानदारी से अपना गुनाह कुबूल कर उसकी सजा भुगत लें.

इस पर सभा में आए अनेक किसानों ने पुलिस अफसरों के सामने ही हाथ ऊपर उठाकर विद्रोह के दौरान हुए उपद्रवों में अपनी सक्रिय भूमिका स्वीकार कर ली.

जैसा कि बहुत स्वाभाविक था, इस स्वीकार के आधार पर सभा खत्म होते ही ब्रिटिश पुलिस ने उनकी गिरफ्तारियां शुरू कर दीं. थानेदार के साथ 12 अंग्रेज घुड़सवार अकेले गूदरराम को पकड़ने आए और कुल मिलाकर एक हजार से ज्यादा किसान पकड़े गए. मुकदमा चला तो उनमें 60 से ज्यादा को सजाएं हुई, जिनमें सबसे लंबी (पांच वर्ष की) सजा शिवव्रत मौर्य नामक किसान ने भोगी.

इतिहासकारों के अनुसार, किसानों के इस विद्रोह के बीज 1857 के बाद देश का शासन अपने हाथ में ले लेने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने खुद ही बोये थे. चूंकि 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में इन किसानों की बड़ी भूमिका थी, इसलिए उसकी सजा के तौर पर साम्राज्यवाद ने उन पर ज़मींदारी की क्रूर प्रथा थोप दी थी.

इतना ही नहीं, 1886 में कुख्यात अवध रेंट कानून बनाकर अवध के 12 जिलों के जमींदारों को किसानों को उनकी जोत की जमीन से बेदखल करने, उसका लगान मनमाना बढ़ाने तथा इच्छानुसार नजराना लेने के अधिकार दे दिए थे. इससे कुछ मायनों में जमींदार राजे-महाराजाओं जैसे हो गए और ब्रिटिश सत्ता के एजेंट के रूप में काम करने लगे थे.

इन जमींदारों के पृथक न्यायालय व कचेहरियां होती थीं और उनके निजी कानून व दंड विधान भी थे. किसी भी किसान का उनके निर्णयों एवं क्रियाकलापों के विरुद्ध बोलना लगभग असम्भव था, क्योंकि जो भी मुंह खोलता, उनके इशारे पर पुलिस उसे मारपीट शकर अधमरा कर देती. उनके कारिंदे भी तरह-तरह से प्रताड़ित करते.

हरी-बेगारी, मोटराना, हथियाना और नजराना

जमींदार को मोटर खरीदनी होती तो किसानों को भारी-भरकम ‘मोटराना’ और हाथी खरीदना होता तो ‘हथियाना’ नामक कर देना पड़ता था. उसके यहां शादी-ब्याह या कोई और उत्सव होता तो नजराना भी देना पड़ता था. ब्राह्मणों व क्षत्रियों को छोड़ अन्य सभी जातियों के किसानों को साल में दो दिन ‘हरी’ (बिना कुछ लिए जमींदार के खेतों की जुताई) तथा दस दिन बेगार (बिना कुछ लिए मजदूरी) करनी पड़ती थी.

1920-21 में फैले भीषण अकाल व महामारी ने पहले से ही तबाह किसानों को तबाही के अंतिम बिंदु पर पहुंचा दिया तो भी जमींदार व सत्ताधीश उनको रोज अंडा देने वाली मुर्गी ही समझते रहे. फिर वे बागी क्यों नहीं हो जाते?

उनकी बगावत के अंदेशों ने तब और जोर पकड़ लिया, जब बाबा रामचंद्र ने ‘सीताराम’ के नारे के तहत उन्हें एकजुट करना शुरू किया. बाबा उनकी एकजुटता के लिए फैजाबाद, सुल्तानपुर, रायबरेली, प्रतापगढ़, बाराबंकी, लखनऊ आदि जिलों की निरंतर यात्राएं करते और उनको अत्याचारी जमींदारों के विरुद्ध ललकारते रहते.

बिड़हर के विद्रोह से ऐन पहले एक जनवरी, 1921 को उन्होंने टांडा तहसील क्षेत्र के मखदूम नगर में स्थित एक बड़े पोखरे के बाग में किसानों की बड़ी सभा को संबोधित किया था. सभा का मंच एक खटोले (छोटी चारपाई) को रस्सी के सहारे पेड़ से लटकाकर बनाया गया था. बाबा ने उस पर चढ़कर किसानों का आह्वान किया था कि उनमें से किसी के भी ऊपर कोई अत्याचार हो तो वह ‘सीताराम’ का नारा लगाए और जो भी वह नारा सुने, तुरंत सहायता के लिए दौड़े.

इसके अगले ही दिन 2 जनवरी को किसानों ने वाजिदपुर में एक अत्याचारी जमींदार पर धावा बोलकर उसे अज्ञातवास में जाने को मजबूर कर दिया था.

नाराज़ हुए बापू

इस विद्रोह का दूसरा पहलू यह है कि महात्मा गांधी इसमें हुई हिंसा, लूटपाट व आगजनी से बहुत नाराज़ हुए थे. इतने नाराज कि इसके अगले महीने फरवरी में वे वाराणसी की ओर से फैजाबाद आए तो रेलगाड़ी के फ़ैज़ाबाद जिले में प्रवेश करते ही अपने डिब्बे की अपने आसपास की खिड़कियां बंद कर ली थीं और किसी से भी मिलने-जुलने या बातचीत करने से मनाकर दिया था.

अलबत्ता, बाद में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने किसानों को समझाया था कि हिंसा कायरता का लक्षण है और तलवारें कमजोरों का हथियार हैं. द वायर हिंदी के पाठक 30 जनवरी, 2018 को प्रकाशित इस आशय की टिप्पणी में इस बाबत जान चुके हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)