मध्य प्रदेश: केंद्रीय विश्वविद्यालय में असम के छात्र पर ‘नस्लीय’ हमला, केस दर्ज

मध्य प्रदेश के अनूपपुर ज़िले में अमरकंटक स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय के छात्रावास में असम के 22 वर्षीय पोस्ट ग्रेजुएट छात्र के साथ कथित तौर पर नस्लीय भेदभाव के चलते मारपीट की गई. यह घटना ऐसे समय सामने आई है, जब पिछले महीने ही नस्लीय घृणा के कारण उत्तराखंड के देहरादून में त्रिपुरा के छात्र एंजेल चकमा की हत्या कर दी गई थी.

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में असम के एक छात्र पर हुए हमले ने पूर्वोत्तर के छात्रों में दहशत पैदा कर दी है. यह घटना देहरादून में नस्लीय भेदभाव से प्रेरित हमले में त्रिपुरा के एक छात्र की मौत के कुछ ही समय बाद सामने आई है.

द टेलीग्राफ की ख़बर के मुताबिक, 13 जनवरी को अमरकंटक स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (आईजीएनटीयू) के छात्रावास में अर्थशास्त्र के पोस्ट ग्रेजुएट छात्र हिरोस ज्योति दास के साथ पांच छात्रों ने मारपीट की.

विश्वविद्यालय के एक सूत्र ने अखबार को बताया कि आरोपियों ने दास से पूछा कि वह कहां से हैं और विश्वविद्यालय में क्या कर रहे हैं. इसी बात पर कहासुनी हुई, जो मारपीट तक आगे बढ़ गई. इस हमले में  दास की आंखों और नाक पर चोटें आई हैं.

सूत्र के अनुसार, हमले के दौरान दास के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणियां भी की गईं.

शिकायत के आधार पर विश्वविद्यालय ने आरोपी छात्रों – अनुराग पांडे, जतिन सिंह, रजनीश त्रिपाठी, विशाल यादव और उत्कर्ष सिंह को निष्कासित कर दिया है. उनके खिलाफ स्थानीय पुलिस स्टेशन में एफआईआर भी दर्ज की गई है.

इस संबंध में आईजीएनटीयू के जनसंपर्क अधिकारी रजनीश त्रिपाठी ने बताया कि विश्वविद्यालय ने एक जांच समिति गठित की है. उन्होंने इससे ज्यादा कोई भी जानकारी देने से इनकार कर दिया.

दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा: सीएम

वहीं, इस मामले के तूल पकड़ने के बाद मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि असमिया छात्र पर हमले के मामले में दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा.

मुख्यमंत्री यादव ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर पोस्ट में कहा कि पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है और कानून के तहत आवश्यक कार्रवाई की जा रही है.

उन्होंने कहा, ‘विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी अपने स्तर पर आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की है. किसी को भी नहीं बख्शा जाएगा.’

अनूपपुर के पुलिस अधीक्षक मोती उर रहमान ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया कि पीड़ित के मेडिकल प्रमाणपत्र में नाक और आंखों के नीचे चोटें पाई गई हैं, जिसके आधार पर मामले में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 114 (गंभीर चोट पहुंचाना) जोड़ी गई है.

उन्होंने बताया कि एफआईआर दर्ज करते समय आरोपियों पर बीएनएस की धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 296 (अश्लील कृत्य और शब्द), 351(3) (आपराधिक धमकी) और 3(5) (साझा इरादा) के तहत मामला दर्ज किया गया था.

कांग्रेस ने घटना की आलोचना की

इस बीच, मध्य प्रदेश कांग्रेस ने इस घटना को लेकर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की आलोचना की है.

राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने एक बयान में आरोप लगाया कि आईजीएनटीयू छात्रावास में कुछ छात्रों ने दास के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणी की और विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की.

सिंघार ने कहा, ‘सत्तारूढ़ पार्टी से जुड़े कुछ युवक परिसर में नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं और छात्रों के साथ मारपीट करते हैं, जबकि विश्वविद्यालय प्रशासन केवल औपचारिक कार्रवाई कर अपनी जिम्मेदारी से बचता है.’

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उच्च शिक्षा के लिए स्थापित इस विश्वविद्यालय को भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का केंद्र बना दिया गया है, जहां आए दिन अनियमितताएं और घटनाएं सामने आती रहती हैं.

नस्लीय भेदभाव के चलते हुई थी एंजेल चकमा की मौत 

गौरतलब है कि पिछले महीने त्रिपुरा के 24 वर्षीय छात्र एंजेल चकमा की देहरादून के एक बाजार में चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी, क्योंकि उन्होंने नस्लीय टिप्पणी किए जाने पर आपत्ति जताई थी.

इस संबंध में दिल्ली विश्वविद्यालय की पोस्ट ग्रेजुएट छात्रा और मणिपुर छात्र संघ की अध्यक्ष लांचेनबी उरुंगपुरेल ने अखबार से कहा कि उत्तर भारतीय शहरों में पूर्वोत्तर के छात्रों को रोजाना नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ता है.

उरुंगपुरेल ने कहा, ‘जब वे ऐसी टिप्पणियों का विरोध करते हैं, तो उन पर हिंसक हमले होते हैं. पुलिस अक्सर इन हमलों में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती है. कुछ अच्छे पुलिसकर्मी भी हैं, लेकिन आम तौर पर उनका रवैया नस्लीय पहलू को स्वीकार नहीं करता. पूर्वोत्तर के छात्रों पर बढ़ते हमलों और स्थानीय लोगों के प्रति पुलिस के समर्थन के कारण हमें आवाज उठाने में डर लगता है.’

उन्होंने बताया कि दिल्ली के सार्वजनिक स्थानों पर पूर्वोत्तर के छात्रों को अक्सर ‘चिंकी’ और ‘मोमो’ कहकर पुकारा जाता है और उनसे पूछा जाता है कि क्या वे थाईलैंड या वियतनाम से हैं. हमारे प्रति एक तरह का अलगाव का भाव है. दिल्ली में हमें कभी भी सामान्य भारतीयों की तरह स्वीकार नहीं किया गया. कुछ लोग तो हमारे रंग-रूप के कारण हमारे साथ सेल्फी लेने का अनुरोध भी करते हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘मुझे लगता है कि एनसीईआरटी को पाठ्यपुस्तकों में पूर्वोत्तर के लोगों और उनकी भाषा और संस्कृति के बारे में सामग्री शामिल करनी चाहिए ताकि भारत के अन्य हिस्सों के लोगों को उनके बारे में कुछ जानकारी मिल सके.’